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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 12 · श्लोक 3

अध्याय 12 · श्लोक 3

भक्ति योग (Bhakti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्यञ्च कूटस्थमचलन्ध्रुवम् ॥ ३॥

ye tv akṣaram anirdeśyam avyaktaṃ paryupāsate | sarvatra-gam acintyañ ca kūṭastham acalan dhruvam ||3||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

ये: who; तु: but; अक्षरम्: the imperishable; अनिर्देश्यम्: indefinable; अव्यक्तम्: unmanifest; पर्युपासते: worship; सर्वत्र-गम्: all-pervading; अचिन्त्यम्: unthinkable; च: and; कूटस्थम्: changeless; अचलम्: immovable; ध्रुवम्: eternal.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

परन्तु जो अक्षर (अविनाशी), अनिर्देश्य (अकथनीय), अव्यक्त (अप्रकट), सर्वव्यापी, अचिन्त्य, कूटस्थ (निर्विकार), अचल और ध्रुव (शाश्वत) की उपासना करते हैं,

English Translation

But those who worship the imperishable, the indefinable, the unmanifest, the all-pervading, the unthinkable, the changeless, the immovable, the eternal,

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

इस श्लोक में भगवान उन साधकों का वर्णन करते हैं जो निर्गुण ब्रह्म की उपासना करते हैं - जो अविनाशी, अकथनीय, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अचिन्त्य, निर्विकार, अचल और शाश्वत है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।