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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 12 · श्लोक 4

अध्याय 12 · श्लोक 4

भक्ति योग (Bhakti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ ४॥

sanniyamyendriya-grāmaṃ sarvatra sama-buddhayaḥ | te prāpnuvanti mām eva sarva-bhūta-hite ratāḥ ||4||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

सन्नियम्य: having fully controlled; इन्द्रिय-ग्रामम्: the group of senses; सर्वत्र: everywhere; सम-बुद्धयः: even-minded; ते: they; प्राप्नुवन्ति: attain; माम्: Me; एव: certainly; सर्व-भूत-हिते: in the welfare of all beings; रताः: engaged.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

सम्पूर्ण रूप से इन्द्रियों के समूह को वश में करके, सर्वत्र समान बुद्धि वाले, सब प्राणियों के हित में लगे हुए वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।

English Translation

Having fully controlled the senses, and being even-minded everywhere, they, engaged in the welfare of all beings, attain Me alone.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

निर्गुण उपासक इन्द्रियों को वश में करके, समदर्शी होकर और सबके हित में लगे रहकर अंततः मुझे ही प्राप्त होते हैं। यद्यपि मार्ग कठिन है, फिर भी लक्ष्य वही है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।