भक्ति योग (Bhakti Yoga) – श्लोक 4
निर्गुण उपासक इन्द्रियों को वश में कर, समदर्शी बनकर और सबके हित में लगकर मुझे प्राप्त करते हैं।
संस्कृत श्लोक
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ ४॥
sanniyamyendriya-grāmaṃ sarvatra sama-buddhayaḥ | te prāpnuvanti mām eva sarva-bhūta-hite ratāḥ ||4||
पदच्छेद / शब्दार्थ
सन्नियम्य: having fully controlled; इन्द्रिय-ग्रामम्: the group of senses; सर्वत्र: everywhere; सम-बुद्धयः: even-minded; ते: they; प्राप्नुवन्ति: attain; माम्: Me; एव: certainly; सर्व-भूत-हिते: in the welfare of all beings; रताः: engaged.
हिंदी अनुवाद
सम्पूर्ण रूप से इन्द्रियों के समूह को वश में करके, सर्वत्र समान बुद्धि वाले, सब प्राणियों के हित में लगे हुए वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।
English Translation
Having fully controlled the senses, and being even-minded everywhere, they, engaged in the welfare of all beings, attain Me alone.
टीका / Commentary
निर्गुण उपासक इन्द्रियों को वश में करके, समदर्शी होकर और सबके हित में लगे रहकर अंततः मुझे ही प्राप्त होते हैं। यद्यपि मार्ग कठिन है, फिर भी लक्ष्य वही है।