भक्ति योग (Bhakti Yoga) – श्लोक 5

निर्गुण ब्रह्म की उपासना का मार्ग अधिक कठिन है, क्योंकि देहधारी के लिए अव्यक्त पर ध्यान लगाना दुष्कर है।

संस्कृत श्लोक

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ ५॥

kleśo 'dhikataras teṣām avyaktāsakta-cetasām | avyaktā hi gatir duḥkhaṃ dehavadbhir avāpyate ||5||

पदच्छेद / शब्दार्थ

क्लेश: difficulty; अधिकतर: greater; तेषाम्: for those; अव्यक्त-आसक्त-चेतसाम्: whose minds are attached to the unmanifest; अव्यक्ता: the unmanifest; हि: indeed; गति: goal; दुःखम्: with difficulty; देहवद्भि: by the embodied; अवाप्यते: is attained.

हिंदी अनुवाद

जिनका चित्त अव्यक्त (निर्गुण ब्रह्म) में आसक्त है, उनके लिए क्लेश अधिक है, क्योंकि अव्यक्त गति (लक्ष्य) को देहधारी (साधक) बड़े कष्ट से प्राप्त करते हैं।

English Translation

Greater is the difficulty of those whose minds are attached to the unmanifest, for the goal of the unmanifest is very hard for the embodied beings to attain.

टीका / Commentary

भगवान अब स्पष्ट करते हैं कि निर्गुण ब्रह्म की उपासना का मार्ग अधिक कठिन है क्योंकि इन्द्रियों से परे उस निराकार तत्व पर मन को एकाग्र करना देहाभिमानी जीव के लिए अत्यंत दुष्कर है।