भक्ति योग (Bhakti Yoga) – श्लोक 6
जो सब कर्म मुझमें समर्पित करके, अनन्य भाव से मेरा ध्यान करते हैं, वे सगुण भक्त हैं।
संस्कृत श्लोक
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ ६॥
ye tu sarvāṇi karmāṇi mayi sannyasya mat-parāḥ | ananyenaiva yogena māṃ dhyāyanta upāsate ||6||
पदच्छेद / शब्दार्थ
ये: who; तु: but; सर्वाणि: all; कर्माणि: actions; मयि: unto Me; संन्यस्य: renouncing; मत्-पराः: intent on Me; अनन्येन: exclusive; एव: certainly; योगेन: by yoga; माम्: Me; ध्यायन्त: meditating; उपासते: worship.
हिंदी अनुवाद
परन्तु जो सब कर्मों को मुझमें समर्पित करके, मेरे परायण होकर, अनन्य योग से मेरा ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं,
English Translation
But those who worship Me, renouncing all actions in Me, intent on Me, meditating on Me with exclusive devotion,
टीका / Commentary
अब भगवान सगुण भक्तों का वर्णन करते हैं जो सब कर्म मुझे समर्पित करके, मेरे परायण होकर, अनन्य भाव से मेरा ध्यान करते हैं।