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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 12 · श्लोक 7

अध्याय 12 · श्लोक 7

भक्ति योग (Bhakti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७॥

teṣām ahaṃ samuddhartā mṛtyu-saṃsāra-sāgarāt | bhavāmi nacirāt pārtha mayy āveśita-cetasām ||7||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

तेषाम्: of them; अहम्: I; समुद्धर्ता: the deliverer; मृत्यु-संसार-सागरात्: from the ocean of death and transmigration; भवामि: become; न चिरात्: soon; पार्थ: O Partha; मयि: in Me; आवेशित-चेतसाम्: whose minds are absorbed.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे पार्थ, जिनका चित्त मुझमें लगा हुआ है, उनके लिए मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार-सागर से उद्धार करने वाला हो जाता हूँ।

English Translation

For those whose minds are absorbed in Me, O Partha, I soon become the deliverer from the ocean of death and transmigration.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान वादा करते हैं कि जो अनन्य भक्त मुझमें चित्त लगाते हैं, उन्हें मैं शीघ्र ही जन्म-मृत्यु के सागर से पार करा देता हूँ। यह भक्तियोग की कृपा है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।