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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 12 · श्लोक 2

अध्याय 12 · श्लोक 2

भक्ति योग (Bhakti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रीभगवानुवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ २॥

śrī-bhagavān uvāca mayy āveśya mano ye māṃ nitya-yuktā upāsate | śraddhayā parayopetās te me yuktatamā matāḥ ||2||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रीभगवान्: the Supreme Lord; उवाच: said; मयि: in Me; आवेश्य: fixing; मनः: mind; ये: who; माम्: Me; नित्य-युक्ता: ever united; उपासते: worship; श्रद्धया: with faith; परया: supreme; उपेताः: endowed; ते: they; मे: by Me; युक्ततमा: most perfect in yoga; मताः: considered.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

श्रीभगवान् ने कहा: जो मन को मुझमें लगाकर, नित्य युक्त होकर, परम श्रद्धा सहित मेरी उपासना करते हैं, वे मेरी दृष्टि में योगियों में सबसे श्रेष्ठ हैं।

English Translation

The Supreme Lord said: Those who fix their minds on Me and worship Me, ever steadfast and endowed with supreme faith, are considered by Me to be most perfect in yoga.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि सगुण भक्ति मार्ग श्रेष्ठ है क्योंकि यह सरल और प्रेममय है। श्रद्धा और निष्ठा से मुझमें मन लगाने वाले भक्त सबसे उत्तम योगी हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।