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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 12 · श्लोक 1

अध्याय 12 · श्लोक 1

भक्ति योग (Bhakti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अर्जुन उवाच एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १॥

arjuna uvāca evaṃ satata-yuktā ye bhaktās tvāṃ paryupāsate | ye cāpy akṣaram avyaktaṃ teṣāṃ ke yoga-vittamāḥ ||1||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अर्जुन: Arjuna; उवाच: said; एवम्: thus; सतत-युक्ता: constantly devoted; ये: who; भक्ता: devotees; त्वाम्: You; पर्युपासते: worship; ये: who; च: and; अपि: also; अक्षरम्: the imperishable; अव्यक्तम्: the unmanifest; तेषाम्: among them; के: who; योग-वित्तमाः: the best knowers of yoga.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

अर्जुन ने कहा: जो भक्त इस प्रकार निरन्तर आपकी उपासना करते हैं और जो अव्यक्त अक्षर (ब्रह्म) की उपासना करते हैं, उनमें योगवेत्ताओं में श्रेष्ठ कौन हैं?

English Translation

Arjuna said: Those devotees who, ever steadfast, thus worship You, and those who worship the imperishable, unmanifest, which of them are better versed in yoga?

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन का यह प्रश्न भक्ति और ज्ञान मार्ग की तुलना के लिए है। वह जानना चाहते हैं कि कौन सा मार्ग श्रेष्ठ है। Arjuna's question sets the stage for Krishna to explain the superiority of devotion.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।