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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 12 · श्लोक 18

अध्याय 12 · श्लोक 18

भक्ति योग (Bhakti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ १८॥

samaḥ śatrau ca mitre ca tathā mānāpamānayoḥ | śītoṣṇa-sukha-duḥkheṣu samaḥ saṅga-vivarjitaḥ ||18||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

सम: equal; शत्रौ: to an enemy; च: and; मित्रे: to a friend; च: and; तथा: also; मान-अपमानयो: in honor and dishonor; शीत-उष्ण-सुख-दुःखेषु: in cold, heat, pleasure, pain; सम: equal; सङ्ग-विवर्जित: free from association.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो शत्रु और मित्र में, तथा मान-अपमान में सम है, जो सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख में सम है, और संग से रहित है,

English Translation

He who is equal to friend and foe, and in honor and dishonor, equal in cold, heat, pleasure, pain, free from attachment,

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

समता का वर्णन: शत्रु-मित्र, मान-अपमान, सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख में समभाव, और संगवर्जित (आसक्ति रहित)।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।