श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 12 (भक्ति योग (Bhakti Yoga))

अध्याय 12 · श्लोक 18

भक्ति योग (Bhakti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 36 मिनट का पठन 142 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ १८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
सम
equal
शत्रौ
to an enemy
च
and
मित्रे
to a friend
च
and
तथा
also
मान-अपमानयो
in honor and dishonor
शीत-उष्ण-सुख-दुःखेषु
in cold, heat, pleasure, pain
सम
equal
सङ्ग-विवर्जित
free from association.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो शत्रु और मित्र में, तथा मान-अपमान में सम है, जो सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख में सम है, और संग से रहित है,

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व एवं ब्रह्मांडीय चेतना

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भागवतगीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि साक्षात् भगवती श्रुति का जीवंत स्वरूप माना गया है। भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को निमित्त बनाकर दिया गया यह उपदेश संपूर्ण मानवता के लिए मानसिक, आत्मिक और आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग है। प्रस्तुत श्लोक—"समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः..."—श्रीमद्भागवतगीता के बारहवें अध्याय (भक्तियोग) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और जीवन-परिवर्तक मर्म है। इस श्लोक में भगवान ने उस आदर्श साधक, भक्त और ज्ञानी पुरुष के लक्षणों को रेखांकित किया है, जो संसार के द्वंद्वों से ऊपर उठकर परम ब्रह्म की स्थिति में स्थिर हो चुका है।

सांसारिक जीवन में मनुष्य निरंतर राग और द्वेष, सुख और दुःख, मान और अपमान, तथा शीत और उष्ण (सर्दी-गर्मी) के थपेड़ों से जूझता रहता है। मन की यह अस्थिरता ही मनुष्य के दुखों का मूल कारण है। जब तक मनुष्य का अंतःकरण बाहरी परिस्थितियों के अनुकूल या प्रतिकूल होने पर विचलित होता रहता है, तब तक उसे आत्मिक शांति की प्राप्ति नहीं हो सकती। वैदिक महर्षियों और उपनिषदों के ऋषियों ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि मनुष्य की वास्तविक स्वतंत्रता उसकी बाह्य परिस्थितियों पर नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक चेतना के नियंत्रण पर निर्भर करती है।

ब्रह्मांडीय चेतना के दृष्टिकोण से देखा जाए तो संपूर्ण सृष्टि एक ही परमात्मा का विस्तार है। जब साधक इस अद्वैत भाव को अपने जीवन में उतार लेता है, तब उसके लिए शत्रु और मित्र का भेद समाप्त हो जाता है। वह मान और अपमान को एक ही सिक्के के दो पहलू मानता है, और शरीर के स्तर पर आने वाले सुख-दुःख या सर्दी-गर्मी को प्रकृति के नियम के रूप में स्वीकार करता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि किस प्रकार एक साधारण मनुष्य अपनी वासनाओं और आसक्तियों (सङ्ग) का त्याग करके दिव्य गुणों से विभूषित हो सकता है। भवतलोक (Bhaktilok.in) के इस विस्तृत आलेख में हम इसी श्लोक के शाब्दिक अर्थ, दार्शनिक गहराई, पौराणिक संदर्भ और आधुनिक जीवन में इसके व्यावहारिक उपयोग का गहन अध्ययन करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ १८॥


(श्रीमद्भागवतगीता, अध्याय 12, श्लोक 18)

पाठ विधि एवं अनुष्ठानिक नियम:
  • प्रातःकाल ब्रह्म बेला में स्नान कर पवित्र आसन (कुशा या ऊनी आसन) पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • श्रीकृष्ण या भगवद्गीता के समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित करें और मन को शांत करें।
  • इस श्लोक का प्रतिदिन कम से कम 11, 21 या 108 बार मानसिक जप या सस्वर पाठ करें।
  • पाठ के उपरांत अपने इष्टदेव का स्मरण करते हुए संपूर्ण चराचर जगत में समभाव बनाए रखने का संकल्प लें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

आइए इस दिव्य श्लोक के प्रत्येक शब्द का गहराई से विश्लेषण करें और समझें कि इसके मर्म में कौन सा आध्यात्मिक दर्शन छिपा है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
समः समान रहने वाला, समभाव रखने वाला जिसकी चेतना में उतार-चढ़ाव नहीं आते, जो हर परिस्थिति में शांत रहता है।
शत्रौ च और शत्रु में भी जो व्यक्ति हमें हानि पहुँचाना चाहता है, उसके प्रति भी मन में द्वेष न रखना।
मित्रे च तथा मित्र में प्रिय व्यक्ति के प्रति अत्यधिक मोह या पक्षपात न रखना, तटस्थ रहना।
तथा और उसी प्रकार सभी द्वंद्वों में एक जैसी मानसिक स्थिति का निरंतर बना रहना।
मानापमानयोः मान और अपमान में प्रशंसा मिलने पर अहंकार न होना और निंदा या अपमान होने पर क्रोधित न होना।
शीतोष्ण सर्दी और गर्मी (शीत और उष्ण) शरीर को लगने वाले जलवायुगत या भौतिक कष्टों से मानसिक रूप से अप्रभावित रहना।
सुखदुःखेषु सुख और दुःख में अनुकूलता में हर्षित न होना और प्रतिकूलता में विषाद से ग्रस्त न होना।
सङ्गविवर्जितः आसक्ति से रहित, संग से दूर धन, पद, व्यक्ति और वस्तुओं से किसी प्रकार की मानसिक गांठ या मोह न रखना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भागवतगीता का यह बारहवां अध्याय 'भक्तियोग' के नाम से सुविख्यात है। महाभारत के युद्ध के ठीक पूर्व, जब कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन भयंकर मोह और विषाद से घिर गए थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन के परम सत्यों से अवगत कराया। अर्जुन ने भगवान से प्रश्न किया था कि—"जो भक्त निरंतर आपकी उपासना करते हैं और जो उस अव्यक्त अक्षर ब्रह्म की उपासना करते हैं, उनमें से योग को सबसे अच्छी प्रकार जानने वाले कौन हैं?"

इस प्रश्न के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण ने सगुण भक्ति की श्रेष्ठता और उसके स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया। भगवान ने स्पष्ट किया कि सच्चा भक्त वह नहीं है जो केवल बाह्य अनुष्ठान करे, बल्कि सच्चा भक्त वह है जिसके अंतःकरण में भगवद्भाव कूट-कूट कर भरा हो। इसी क्रम में भगवान ने बारहवें अध्याय के श्लोक 13 से लेकर 19 तक उन दिव्य गुणों का संकलन किया है जो भगवान को अत्यंत प्रिय हैं। श्लोक 18 उसी श्रृंखला की पराकाष्ठा है।

पौराणिक कथाओं और ऐतिहासिक प्रसंगों में महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत में ऐसे कई महापुरुषों के चरित्र मिलते हैं जिन्होंने इस समभाव को अपने जीवन में चरितार्थ किया। उदाहरणार्थ, पितामह भीष्म जब शरशर्लिन पर लेटे हुए थे, तब कौरव और पांडव दोनों पक्षों के प्रति उनके मन में कोई द्वेष नहीं था। इसी प्रकार भगवान राम का चरित्र हमें सिखाता है कि राज्याभिषेक की घोषणा होने पर प्रसन्न न होना और वनवास मिलने पर दुःखी न होना ही 'मानापमानयोः समः' का वास्तविक जीवंत रूप है। महर्षि याज्ञवल्क्य, राजा जनक और शुकदेव जैसे महामुनि इस समभाव के जीवंत प्रतीक रहे हैं। उन्होंने कभी भी शत्रु और मित्र में भेद नहीं किया और हमेशा आत्म-स्वरूप में स्थित रहे।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस महान श्लोक का स्मरण, मनन और इसके मर्म को जीवन में उतारने से साधक को अनेकानेक आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता (Mental Equanimity)

नियमित रूप से इस श्लोक का पाठ और मनन करने से मन के संशय समाप्त होते हैं। व्यक्ति बाहरी उथल-पुथल के बीच भी भीतर से शांत और स्थिर रहता है, जिससे अवसाद और तनाव से मुक्ति मिलती है।

2. सकारात्मक ऊर्जा और औरा का विस्तार

जब मनुष्य मान-अपमान और राग-द्वेष से मुक्त हो जाता है, तो उसकी प्राण ऊर्जा व्यर्थ नष्ट नहीं होती। इससे उसके चारों ओर एक दिव्य सकारात्मक ऊर्जा (Aura) का निर्माण होता है जो दूसरों को भी प्रभावित करती है।

3. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

आसक्ति और प्रतिक्रियात्मक कर्मों से ही नए कर्म-बंधन बनते हैं। 'सङ्गविवर्जित' होने पर यानी कर्मों में फल की आसक्ति छोड़ने पर पुराने कर्मों का क्षय होता है और नए कर्म-बंधन नहीं बनते, जिससे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

4. भगवद्कृपा और अद्वैत प्रेम की प्राप्ति

भगवान श्रीकृष्ण स्वयं गीता में कहते हैं कि जो भक्त सभी भूतों में समभाव रखता है, वह उन्हें अतिप्रिय है। ऐसे साधक पर भगवान की अहेतुकी कृपा सदैव बनी रहती है और उसे सर्वत्र ईश्वर के दर्शन होते हैं।

5. अहंकार का शमन

मान और अपमान में समान रहने से 'अहंकार' (Ego) की जड़ें कमजोर होती हैं। अहंकार के नष्ट होते ही साधक के भीतर विनम्रता और करुणा का अनायास ही प्रादुर्भाव हो जाता है।

6. निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि

भावनाओं के ज्वार-भाटे में बहकर लिए गए निर्णय अक्सर गलत होते हैं। समभाव से युक्त बुद्धि हमेशा विवेकपूर्ण, न्यायसंगत और सत्य के अनुकूल निर्णय लेती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री (Editorial Note): भवतलोक (Bhaktilok.in) पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भागवतगीता और महर्षि वेदव्यास तथा आद्य शंकराचार्य के भाष्यों के गहन अध्ययन के उपरांत तैयार किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि सनातन धर्म के मूल ग्रंथों (जैसे श्रीमद्गीता प्रेस गोरखपुर संस्करण और अन्य प्रामाणिक टीकाओं) के सिद्धांतों के साथ किसी भी प्रकार का समझौता न हो।

इस शلت के माध्यम से हमारा उद्देश्य आधुनिक पीढ़ी को मानसिक स्वास्थ्य, आंतरिक शांति और सनातन मूल्यों से जोड़ना है। यदि आपके मन में इस विषय से जुड़ा कोई भी प्रश्न या जिज्ञासा है, तो आप हमारे विशेषज्ञ पैनल से संपर्क कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

शत्रु और मित्र में सम रहने का अर्थ यह नहीं है कि आप शत्रु को गले लगाएं या अन्याय का विरोध न करें। इसका आध्यात्मिक अर्थ यह है कि बाहरी व्यक्ति के व्यवहार से आपके अंतःकरण की शांति और प्रेम का भाव दूषित न हो। आप कर्तव्य के रूप में अनुचित का विरोध कर सकते हैं, किंतु मन में शत्रु के प्रति घृणा, प्रतिशोध या राग-द्वेष की भावना नहीं रखनी चाहिए।

समाज में प्रतिष्ठा का संबंध शरीर और नाम से है, जबकि आपकी वास्तविक पहचान आत्मा है। जब साधक यह समझ लेता है कि मान और अपमान केवल शरीर की स्थिति पर प्रहार या प्रशंसा हैं, और आत्मा इनसे अछूती है, तब वह प्रशंसा से फूलता नहीं है और अपमान से पिघलता नहीं है। यह स्थिति आत्म-ज्ञान से ही प्राप्त होती है।

'सङ्गविवर्जितः' का अर्थ पलायनवाद या परिवार त्यागना नहीं है। इसका अर्थ है—कर्तव्य का पालन पूरी निष्ठा से करना, किंतु मन में यह भाव रखना कि "यह सब कुछ नश्वर है और अंततः ईश्वर का ही है।" वस्तुओं या व्यक्तियों से मानसिक मोह या पकड़ का छूट जाना ही वास्तविक संगवर्जित होना है। कमल के पत्ते की तरह जल में रहकर भी जल से अछूता रहना ही गीता का संदेश है।

निश्चित रूप से। जब आप इस श्लोक का नियमित पाठ और इसके अर्थ पर मनन करते हैं, तो आपका दृष्टिकोण व्यापक हो जाता है। आप छोटी-छोटी बातों पर परेशान होना छोड़ देते हैं, जिससे आपका मन शांत होता है और तनाव स्वतः ही समाप्त होने लगता है।

इसकी शुरुआत आत्म-अवलोकन (Self-introspection) से होती है। जब भी दिनभर में कोई सुखद या दुःखद घटना घटे, या कोई आपकी प्रशंसा या निंदा करे, तो तुरंत सचेत हो जाएं और अपने मन के स्पंदनों को देखें। भगवान का स्मरण करते हुए तटस्थ रहने का अभ्यास करें। धीरे-धीरे यह आपका स्वभाव बन जाएगा।

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संकलन एवं प्रस्तुति: भवतलोक संपादकीय विभाग

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो शत्रु और मित्र में समान है, मान और अपमान में समान है, सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख में समान है, और आसक्ति से रहित है,

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भक्ति की परिपक्वता में समता का भाव आता है। सभी परिस्थितियों में मन समान रहता है, क्योंकि वह ईश्वर में स्थित है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 12: भक्ति योग (Bhakti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 18 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 18/20 90% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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