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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 12 · श्लोक 19

अध्याय 12 · श्लोक 19

भक्ति योग (Bhakti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् । अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १९॥

tulya-nindā-stutir maunī santuṣṭo yena kenacit | aniketaḥ sthira-matir bhaktimān me priyo naraḥ ||19||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

तुल्य-निन्दा-स्तुति: to whom censure and praise are equal; मौनी: silent; सन्तुष्ट: content; येन केनचित्: with anything; अनिकेत: homeless; स्थिर-मति: steady-minded; भक्तिमान: full of devotion; मे: to Me; प्रिय: dear; नर: person.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जिसके लिए निन्दा और स्तुति समान है, मौनी है, जो किसी भी प्रकार से संतुष्ट रहता है, बिना घर का (आश्रम रहित), स्थिर बुद्धि वाला, ऐसा भक्तिमान पुरुष मुझे प्रिय है।

English Translation

He to whom censure and praise are equal, silent, content with anything, homeless, steady-minded, full of devotion, that person is dear to Me.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

तुल्यनिन्दास्तुति - निंदा और स्तुति में समान; मौनी - मौन रहने वाला (वाणी पर नियंत्रण); सन्तुष्टः येन केनचित् - जो कुछ भी मिले उसी में संतुष्ट; अनिकेतः - बिना निश्चित आवास (घर-गृहस्थी से आसक्ति रहित); स्थिरमतिः - स्थिर बुद्धि।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।