भक्ति योग (Bhakti Yoga) – श्लोक 19
निंदा-स्तुति में सम, मौनी, जो मिले उसमें संतुष्ट, अनिकेत, स्थिरमति भक्त प्रिय है।
संस्कृत श्लोक
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् । अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १९॥
tulya-nindā-stutir maunī santuṣṭo yena kenacit | aniketaḥ sthira-matir bhaktimān me priyo naraḥ ||19||
पदच्छेद / शब्दार्थ
तुल्य-निन्दा-स्तुति: to whom censure and praise are equal; मौनी: silent; सन्तुष्ट: content; येन केनचित्: with anything; अनिकेत: homeless; स्थिर-मति: steady-minded; भक्तिमान: full of devotion; मे: to Me; प्रिय: dear; नर: person.
हिंदी अनुवाद
जिसके लिए निन्दा और स्तुति समान है, मौनी है, जो किसी भी प्रकार से संतुष्ट रहता है, बिना घर का (आश्रम रहित), स्थिर बुद्धि वाला, ऐसा भक्तिमान पुरुष मुझे प्रिय है।
English Translation
He to whom censure and praise are equal, silent, content with anything, homeless, steady-minded, full of devotion, that person is dear to Me.
टीका / Commentary
तुल्यनिन्दास्तुति - निंदा और स्तुति में समान; मौनी - मौन रहने वाला (वाणी पर नियंत्रण); सन्तुष्टः येन केनचित् - जो कुछ भी मिले उसी में संतुष्ट; अनिकेतः - बिना निश्चित आवास (घर-गृहस्थी से आसक्ति रहित); स्थिरमतिः - स्थिर बुद्धि।