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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 12 · श्लोक 17

अध्याय 12 · श्लोक 17

भक्ति योग (Bhakti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति । शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥ १७॥

yo na hṛṣyati na dveṣṭi na śocati na kāṅkṣati | śubhāśubha-parityāgī bhaktimān yaḥ sa me priyaḥ ||17||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

य: who; न: not; हृष्यति: rejoices; न: not; द्वेष्टि: hates; न: not; शोचति: grieves; न: not; काङ्क्षति: desires; शुभ-अशुभ-परित्यागी: renouncing good and evil; भक्तिमान: full of devotion; य: who; स: he; मे: to Me; प्रिय: dear.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है, तथा शुभ-अशुभ कर्मों का त्यागी है, वह भक्तिमान मुझे प्रिय है।

English Translation

He who neither rejoices nor hates, neither grieves nor desires, renouncing good and evil, and full of devotion, he is dear to Me.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यहाँ भक्त के और गुण - न हर्ष, न द्वेष, न शोक, न कामना, तथा शुभाशुभ का त्यागी। ऐसा भक्त पूर्णतः समर्पित है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।