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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 12 · श्लोक 16

अध्याय 12 · श्लोक 16

भक्ति योग (Bhakti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः । सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६॥

anapekṣaḥ śucir dakṣa udāsīno gata-vyathaḥ | sarvārambha-parityāgī yo mad-bhaktaḥ sa me priyaḥ ||16||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अनपेक्ष: indifferent; शुचि: pure; दक्ष: dexterous; उदासीन: neutral; गत-व्यथ: free from distress; सर्व-आरम्भ-परित्यागी: renouncing all undertakings; य: who; मत्-भक्त: My devotee; स: he; मे: to Me; प्रिय: dear.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो आशा-आकांक्षा से रहित, शुद्ध, चतुर, उदासीन, व्यथा से रहित और समस्त आरम्भों (कर्मों) का त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

English Translation

He who is indifferent, pure, capable, neutral, free from distress, renouncing all undertakings, such a devotee of Mine is dear to Me.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अनपेक्षः - किसी की अपेक्षा न रखना; शुचिः - बाहर-भीतर से शुद्ध; दक्षः - समर्थ; उदासीनः - तटस्थ; गतव्यथः - खेद रहित; सर्वारम्भपरित्यागी - नए कर्मों के आरम्भ का त्यागी। ऐसा भक्त प्रिय है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।