भक्ति योग (Bhakti Yoga) – श्लोक 16
अनपेक्ष, शुद्ध, दक्ष, उदासीन, व्यथारहित, कर्मारम्भ त्यागी भक्त प्रिय है।
संस्कृत श्लोक
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः । सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६॥
anapekṣaḥ śucir dakṣa udāsīno gata-vyathaḥ | sarvārambha-parityāgī yo mad-bhaktaḥ sa me priyaḥ ||16||
पदच्छेद / शब्दार्थ
अनपेक्ष: indifferent; शुचि: pure; दक्ष: dexterous; उदासीन: neutral; गत-व्यथ: free from distress; सर्व-आरम्भ-परित्यागी: renouncing all undertakings; य: who; मत्-भक्त: My devotee; स: he; मे: to Me; प्रिय: dear.
हिंदी अनुवाद
जो आशा-आकांक्षा से रहित, शुद्ध, चतुर, उदासीन, व्यथा से रहित और समस्त आरम्भों (कर्मों) का त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।
English Translation
He who is indifferent, pure, capable, neutral, free from distress, renouncing all undertakings, such a devotee of Mine is dear to Me.
टीका / Commentary
अनपेक्षः - किसी की अपेक्षा न रखना; शुचिः - बाहर-भीतर से शुद्ध; दक्षः - समर्थ; उदासीनः - तटस्थ; गतव्यथः - खेद रहित; सर्वारम्भपरित्यागी - नए कर्मों के आरम्भ का त्यागी। ऐसा भक्त प्रिय है।