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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 12 · श्लोक 15

अध्याय 12 · श्लोक 15

भक्ति योग (Bhakti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५॥

yasmān nodvijate loko lokān nodvijate ca yaḥ | harṣāmarsa-bhayodvegair mukto yaḥ sa ca me priyaḥ ||15||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यस्मात्: from whom; न: not; उद्विजते: is agitated; लोक: people; लोकात्: by people; न: not; उद्विजते: is agitated; च: and; य: who; हर्ष: by joy; अमर्ष: intolerance; भय: fear; उद्वेगै: by anxiety; मुक्त: freed; य: who; स: he; च: also; मे: to Me; प्रिय: dear.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जिससे लोग उद्विग्न नहीं होते और जो लोगों से उद्विग्न नहीं होता, तथा जो हर्ष, अमर्ष (क्रोध), भय और उद्वेग से मुक्त है, वह भी मुझे प्रिय है।

English Translation

He by whom the world is not agitated and who is not agitated by the world, who is freed from joy, impatience, fear, and anxiety, he is dear to Me.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भक्त का यह गुण है कि वह न किसी को उद्वेलित करता है, न स्वयं किसी से उद्वेलित होता है। वह सांसारिक भावनाओं - हर्ष, क्रोध, भय, चिंता - से मुक्त रहता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।