श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 12 (भक्ति योग (Bhakti Yoga))

अध्याय 12 · श्लोक 15

भक्ति योग (Bhakti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 36 मिनट का पठन 145 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

19 पद
यस्मात्
from whom
न
not
उद्विजते
is agitated
लोक
people
लोकात्
by people
न
not
उद्विजते
is agitated
च
and
य
who
हर्ष
by joy
अमर्ष
intolerance
भय
fear
उद्वेगै
by anxiety
मुक्त
freed
य
who
स
he
च
also
मे
to Me
प्रिय
dear.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जिससे लोग उद्विग्न नहीं होते और जो लोगों से उद्विग्न नहीं होता, तथा जो हर्ष, अमर्ष (क्रोध), भय और उद्वेग से मुक्त है, वह भी मुझे प्रिय है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय प्रासंगिकता

वैदिक सनातन संस्कृति में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ मात्र नहीं, बल्कि साक्षात भगवान श्रीकृष्णे की वाणी—ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र के रूप में मान्यता प्राप्त है। महाभारत के युद्ध के मैदान में कुरुक्षेत्र की गूंज के बीच, अर्जुन को निमित्त बनाकर भगवान श्रीकृष्ण ने संपूर्ण मानव जाति को जीवन जीने की कला, कर्म के मर्म और परम आध्यात्मिक सत्य का बोध कराया है। गीता का प्रत्येक श्लोक मानव चेतना को जागृत करने वाली एक दिव्य कुंजी है। इसी श्रृंखला में, द्वादश अध्याय (भक्तियोग) का पंद्रहवां श्लोक ("यस्मान्नोद्विजते लोको...") उस साधक और अनन्य भक्त के आंतरिक और बाह्य स्वरूप का अत्यंत सूक्ष्म, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक चित्रण करता है, जो भगवान को सबसे अधिक प्रिय है।

वर्तमान आधुनिक युग में, जहाँ भौतिकता की अंधी दौड़ ने मनुष्य को मानसिक तनाव, अवसाद, ईर्ष्या, भय और असुरक्षा की आग में झुलसा दिया है, यह श्लोक एक शीतल छांव और अचूक औषधि के समान कार्य करता है। सांस्कृतिक दृष्टिकोण से, यह श्लोक उन सनातन मूल्यों को स्थापित करता है जहाँ एक व्यक्ति का समाज के प्रति आचरण अहिंसा, करुणा, संतुलन और आंतरिक शांति पर आधारित होता है। यह ब्रह्मांडीय सत्य को रेखांकित करता है कि जो व्यक्ति समस्त प्राणियों के साथ सामंजस्य बिठाते हुए अपनी चेतना को द्वैतभाव से मुक्त कर लेता है, वह ब्रह्मांड की मूल ऊर्जा यानी परमेश्वर के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है। भक्तिकुल.इन के इस शोध-आधारित आलेख में हम इसी दिव्य श्लोक के हर एक पक्ष का अत्यंत सूक्ष्म और प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे साधक अपने जीवन को उन्नत बना सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५॥

श्लोक का उच्चारण एवं पठन विधि:

संधि विच्छेद: यस्मात् न उद्विजते लोकः लोकात् न उद्विजते च यः। हर्ष-अर्ष-भय-उद्वेगैः मुक्तः यः सः च मे प्रियः॥

इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान के पश्चात शुद्ध मन से करना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप का मानसिक ध्यान करते हुए यदि इसका नियमित पाठ किया जाए, तो मन की चंचलता शांत होती है और व्यक्ति के भीतर समत्व भाव की नींव मजबूत होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

आइए श्लोक के प्रत्येक शब्द की गहराई में उतरकर उसके शाब्दिक, दार्शनिक और व्यावहारिक अर्थ को समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यस्मात् (Yasmaat) जिससे वह उच्च कोटि का साधक या भक्त, जिसके व्यक्तित्व से कोई नकारात्मक ऊर्जा उत्सर्जित न हो।
न उद्विजते (Na Udvijate) उद्विग्न या भयभीत नहीं होता जिसके व्यवहार, वाणी या आचरण से समाज या अन्य जीवमात्र को किसी प्रकार का कष्ट या भय न पहुचे।
लोकः (Lokah) संसार / लोग संपूर्ण जीव-जगत, मनुष्य, पशु-पक्षी और सांसारिक प्राणी।
लोकात् (Lokaat) संसार से सांसारिक परिस्थितियों, आलोचनाओं, विरोधियों या अन्य मनुष्यों से।
च यः (Cha Yah) और जो जो व्यक्ति स्वयं भी बाह्य परिस्थितियों से विचलित नहीं होता।
हर्ष (Harsha) अत्यधिक प्रसन्नता / उल्लास अनुकूल परिस्थितियों या लाभ मिलने पर जो अहंकार या अत्यधिक हर्ष से पागल न हो।
अमर्ष (Amarsha) ईर्ष्या / रोष / असहिष्णुता दूसरों की उन्नति देखकर जलने की भावना या क्रोध से पूरी तरह मुक्त मन।
भय (Bhaya) डर / असुरक्षा भविष्य की अनिश्चितताओं या मृत्यु का भय जिसके मन में तनिक भी न बचा हो।
उद्वेगैः (Udvęgaih) मानसिक उद्विग्नता / चिंता अनावश्यक चिंता, मानसिक तनाव और बेचैनी से पूर्णतः रहित अवस्था।
मुक्तः यः स च मे प्रियः (Muktaḥ Yah Sa Cha Me Priyaḥ) जो इन सबसे मुक्त है, वह मुझे प्रिय है भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि ऐसा संतुलित चेतना वाला भक्त उन्हें अत्यंत प्रिय है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के द्वादश अध्याय का नाम 'भक्तियोग' है। इस अध्याय के आरंभ में अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से एक बहुत ही सुंदर और व्यावहारिक प्रश्न पूछा था—हे कृष्ण! जो भक्त अनन्य भाव से आपकी निरंतर उपासना करते हैं और जो केवल निराकार ब्रह्म की उपासना करते हैं, उनमें से योग को सबसे अच्छी प्रकार जानने वाले कौन हैं? इस प्रश्न के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण ने सगुण भक्ति के मार्ग को सुगम बताते हुए भक्तों के विशिष्ट लक्षणों की विस्तार से चर्चा की है।

पौराणिक और ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, कुरुक्षेत्र के मैदान में जब अर्जुन का मोहभंग हुआ और वे अपने सगे-संबंधियों को सामने पाकर शस्त्र त्यागने लगे, तब भगवान ने उन्हें ज्ञान, कर्म और भक्तियोग का समन्वित पाठ पढ़ाया। इस प्रसंग में महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत गीता का यह संवाद दर्ज है। भगवान श्रीकृष्ण ने यह भली-भांति समझाया कि सच्चा भक्त वह नहीं है जो केवल माला फेरे या वन में जाकर बैठ जाए, बल्कि सच्चा भक्त वह है जो समाज के बीच रहते हुए भी लोक-कल्याण की भावना से ओत-प्रोत हो और किसी को भी अपनी वाणी या कर्म से आहत न करे।

महर्षि वेद व्यास और बाद में आदि शंकराचार्य, रामानुजचार्य तथा स्वामी विवेकानंद जैसे महान संतों और टीकाकारों ने इस श्लोक की व्याख्या करते हुए बार-बार इस बात पर बल दिया है कि 'समत्वं योग उच्यते' (समता ही योग है)। जब कोई मनुष्य संसार के द्वंद्वों (सुख-दुःख, मान-अपमान, हर्ष-शोक) से ऊपर उठ जाता है, तब उसके भीतर का अहंकार गल जाता है और ईश्वर की अहैतुषी कृपा स्वतः ही उस पर बरसने लगती है। यही इस श्लोक की मूल ऐतिहासिक और दार्शनिक आत्मा है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

मानसिक शांति और स्थिरता

इस श्लोक के नियमित मनन और स्मरण से मस्तिष्क की अत्यधिक सक्रियता और अनावश्यक चिंताएं शांत होती हैं। यह आधुनिक जीवन में 'एंजाइटी' और डिप्रेशन से लड़ने की असीम मानसिक शक्ति प्रदान करता है।

सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह (Positive Aura)

जो व्यक्ति दूसरों को उद्वेलित नहीं करता और स्वयं भी विचलित नहीं होता, उसके चारों ओर एक दिव्य सकारात्मक ऊर्जा का आवरण बन जाता है, जो संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति को शांति देता है।

कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

क्रोध, ईर्ष्या और अमर्ष (असंतोष) से मुक्त रहने पर नए नकारात्मक कर्मों का संचय रुक जाता है। साधक पुराने कर्म बंधनों से मुक्त होने लगता है और उसकी चेतना उच्च लोकों की ओर अग्रसर होती है।

दैवीय कृपा की प्राप्ति (Divine Grace)

भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं इस श्लोक के अंत में घोषणा की है कि ऐसा भक्त उन्हें 'प्रिय' है। जिसे परमपिता का स्नेह और प्रियत्व प्राप्त हो जाए, उसके जीवन का हर संकट स्वतः ही टल जाता है।

उत्कृष्ट सामाजिक संबंध

जब आप किसी को आहत नहीं करते और खुद भी छोटी-छोटी बातों पर बुरा नहीं मानते, तो आपके पारिवारिक और सामाजिक संबंध अत्यंत मधुर और प्रगाढ़ बन जाते हैं।

भय और असुरक्षा का नाश

भय और उद्वेग मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी हैं। इस श्लोक के आत्मसात करने से भीतर एक निर्भीकता उत्पन्न होती है, जो हर परिस्थिति का डटकर सामना करने का संबल देती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: भक्तिकुल.इन (Bhaktilok.in) के संपादकीय मंडल और संस्कृत भाषाविदों द्वारा इस आलेख को तैयार करते समय श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न प्रामाणिक संस्करणों (जैसे गीता प्रेस गोरखपुर, शंकराचार्य भाष्य और स्वामी रामसुखदास जी की टीका) का गहन अध्ययन किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन धर्म के गूढ़ सत्यों को अत्यंत सरल, स्पष्ट और तथ्यात्मक रूप से पहुंचाना है। प्रस्तुत सामग्री अनुभव, पारंपरिक ज्ञान और शास्त्रीय प्रमाणों की कसौटी पर खरी उतरती है, ताकि हर साधक को प्रामाणिक आध्यात्मिक मार्गदर्शन मिल सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के द्वादश अध्याय (भक्तियोग) का पंद्रहवां श्लोक है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उस अनन्य भक्त के लक्षण बता रहे हैं जो उन्हें सबसे अधिक प्रिय है।

इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि आपके बोलचाल, व्यवहार, कार्य और विचारों से किसी भी जीव को कष्ट या मानसिक पीड़ा नहीं पहुँचनी चाहिए। आप समाज के लिए अशांति का नहीं, बल्कि शांति और सहयोग का केंद्र बनें।

हर्ष का अर्थ अत्यधिक प्रसन्नता या अहंकार है और अमर्ष का अर्थ ईर्ष्या या रोष है। इनसे मुक्त होने का अर्थ है कि सफलता मिलने पर घमंड न हो और दूसरों की उन्नति देखकर ईर्ष्या न हो—मन हमेशा संतुलित रहे।

जब हम इस श्लोक का पाठ और मनन करते हैं, तो हमें यह बोध होता है कि भय, चिंता और उद्वेग व्यर्थ हैं। यह हमें परिस्थितियों से ऊपर उठकर साक्षी भाव से जीना सिखाता है, जिससे मानसिक तनाव स्वतः समाप्त हो जाता है।

यह श्लोक प्रत्येक मनुष्य के लिए है—चाहे वह गृहस्थ हो, विद्यार्थी हो या संन्यासी। गीता का संदेश कर्मक्षेत्र में रहते हुए समत्व भाव अपनाने का है, इसलिए गृहस्थ जीवन में भी इसका पूर्ण रूप से पालन किया जा सकता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जिससे संसार उद्विग्न नहीं होता और जो संसार से उद्विग्न नहीं होता, तथा जो हर्ष, क्रोध, भय और चिंता से मुक्त है, वह मुझे प्रिय है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

संतुलित मन वाला भक्त दूसरों के लिए कभी कष्ट का कारण नहीं बनता और न ही दूसरों से कष्ट पाता है। वह स्थिरचित्त होता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 12: भक्ति योग (Bhakti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 15 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 15/20 75% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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