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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 12 · श्लोक 14

अध्याय 12 · श्लोक 14

भक्ति योग (Bhakti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १४॥

santuṣṭaḥ satataṃ yogī yatātmā dṛḍha-niścayaḥ | mayy arpita-mano-buddhir yo mad-bhaktaḥ sa me priyaḥ ||14||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

सन्तुष्ट: content; सततम्: always; योगी: the yogi; यत-आत्मा: self-controlled; दृढ-निश्चय: of firm resolve; मयि: in Me; अर्पित-मनः-बुद्धि: with mind and intellect offered; य: who; मत्-भक्त: My devotee; स: he; मे: to Me; प्रिय: dear.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

सदा संतुष्ट रहने वाला, आत्मवश, दृढ़ निश्चय वाला, मन और बुद्धि को मुझमें अर्पित करने वाला जो योगी-भक्त है, वह मुझे प्रिय है।

English Translation

Ever content, self-controlled, firm in resolve, with mind and intellect offered to Me, such a devotee of Mine is dear to Me.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यहाँ भक्त के और गुण बताए गए हैं - सदा संतुष्ट, आत्मवश (इन्द्रियों पर नियंत्रण), दृढ़ निश्चय, और मन-बुद्धि से ईश्वर में अर्पित। ऐसा भक्त प्रिय है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।