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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 12 · श्लोक 13

अध्याय 12 · श्लोक 13

भक्ति योग (Bhakti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च । निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३॥

adveṣṭā sarva-bhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca | nirmamo nirahaṅkāraḥ sama-duḥkha-sukhaḥ kṣamī ||13||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अद्वेष्टा: non-hating; सर्व-भूतानाम्: towards all beings; मैत्र: friendly; करुण: compassionate; एव: certainly; च: and; निर्मम: free from possessiveness; निरहङ्कार: free from ego; सम-दुःख-सुख: equal in sorrow and happiness; क्षमी: forgiving.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो सब प्राणियों से द्वेष नहीं करता, सबसे मित्रभाव और करुणा रखता है, तथा ममता और अहंकार से रहित है, दुःख-सुख में समान रहता है और क्षमाशील है,

English Translation

He who hates no creature, is friendly and compassionate to all, free from possessiveness and ego, balanced in pleasure and pain, forgiving,

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अब भगवान भक्त के लक्षण बताते हैं। यहाँ से लेकर श्लोक 19 तक सात्विक भक्त के गुणों का वर्णन है। पहला गुण है अद्वेष्टा - किसी से द्वेष न करना, सबसे मैत्री और करुणा, ममता और अहंकार का अभाव, दुःख-सुख में समता, और क्षमाशीलता।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।