श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 12 (भक्ति योग (Bhakti Yoga))

अध्याय 12 · श्लोक 13

भक्ति योग (Bhakti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 37 मिनट का पठन 161 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च । निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
अद्वेष्टा
non-hating
सर्व-भूतानाम्
towards all beings
मैत्र
friendly
करुण
compassionate
एव
certainly
च
and
निर्मम
free from possessiveness
निरहङ्कार
free from ego
सम-दुःख-सुख
equal in sorrow and happiness
क्षमी
forgiving.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो सब प्राणियों से द्वेष नहीं करता, सबसे मित्रभाव और करुणा रखता है, तथा ममता और अहंकार से रहित है, दुःख-सुख में समान रहता है और क्षमाशील है,

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सनातन सनातन धर्म के पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भागवतगीता के बारहवें अध्याय, जिसे 'भक्तियोग' के नाम से जाना जाता है, में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को उस परम आध्यात्मिक स्थिति का दर्शन कराते हैं जो एक सच्चे भक्त के जीवन का प्राण होती है। भगवद्गीता का यह तेरहवां श्लोक—"अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च । निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३॥"—केवल कुछ शब्दों का संग्रह मात्र नहीं है, बल्कि यह अध्यात्म की महागाथा और मोक्ष के मार्ग का वह स्वर्णिम मानचित्र है जिस पर चलकर कोई भी साधक अपने जीवन को पावन और कृतकृत्य कर सकता है। भक्तियोग के इस विशिष्ट खंड में (श्लोक 13 से 19 तक) भगवान श्रीकृष्ण ने उन दैवीय गुणों, आचरणों और मानसिक अवस्थाओं का अत्यंत सूक्ष्म और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है जो एक सात्विक भक्त के भीतर स्वतः स्फूर्त रूप से प्रकट होते हैं।

सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से यह श्लोक भारतीय मनीषा के उस मूल मंत्र को रेखांकित करता है जिसमें 'वसुधैव कुटुंबकम्' की भावना केवल एक नारा न रहकर व्यक्ति के आंतरिक चरित्र का अनिवार्य अंग बन जाती है। जब एक मनुष्य अपनी संकुचित अहंता (Ego) की दीवारों को गिराकर संपूर्ण चराचर जगत में एक ही परमात्मा की ज्योति के दर्शन करता है, तब उसके हृदय में समस्त प्राणियों के प्रति अद्वेष (द्वेष का अभाव), अहैतुक मैत्री (मित्रता का भाव), अकारण करुणा (दया) और क्षमाशीलता का अनंत सागर उमड़ पड़ता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि भक्ति केवल मंदिर की चारदीवारी के भीतर घंटी बजाने या धूप-दीप जलाने तक सीमित नहीं है, अपितु यह जीवन जीने की एक ऐसी कला है जहाँ प्रत्येक श्वास में भगवान के गुणों का साक्षात् प्रकटीकरण होता है। इस लेख के माध्यम से हम Bhaktilok.in के इस विशेष आध्यात्मिक मंच पर इसी महान श्लोक के अंतरंग रहस्यों, व्याकरणिक संरचना, पौराणिक पृष्ठभूमि और व्यावहारिक जीवन में इसके अनुप्रयोगों का अत्यंत गंभीर एवं शास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे साधकों को आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त हो सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता के बारहवें अध्याय (भक्तियोग) के इस दिव्य श्लोक को श्रद्धा, पवित्रता और सही उच्चारण के साथ सस्वर पाठ करना चाहिए। यहां श्लोक का प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत है:

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥ १३॥

श्लोक पाठ की विधि एवं आंतरिक शुद्धि:
  • प्रातःकालीन स्मरण: नित्य प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नानादि से निवृत्त होकर पवित्र आसन पर बैठकर इस श्लोक का कम से कम 11 या 108 बार मानसिक जप करना चाहिए।
  • भावना: पाठ करते समय यह विचार करना चाहिए कि भगवान श्रीकृष्ण के ये गुण मेरे जीवन का भी अभिन्न हिस्सा बनें और मेरे मन से सभी प्रकार के द्वेष, ईर्ष्या, ममता और अहंकार का शमन हो।
  • सस्वर उच्चारण: इसका उच्चारण वेदों और उपनिषदों की पारंपरिक स्वर लहरियों के अनुसार करना चाहिए जिससे मानसिक एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो सके।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक पद का संस्कृत व्याकरण और अद्वैत वेदांत के दृष्टिकोण से गहरा अर्थ है। आइए इसे विस्तृत तालिका के माध्यम से समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अद्वेष्टा (Adveshta) जो किसी से द्वेष नहीं करता। साधक किसी भी प्राणी से वैर, ईर्ष्या या दुर्भावना नहीं रखता, चाहे सामने वाला उसे हानि ही क्यों न पहुँचाए।
सर्वभूतानाम् (Sarvabhutaanam) समस्त जीवों या प्राणियों के प्रति। यह भाव केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि चींटी से लेकर हाथी और समस्त चराचर जगत पर लागू होता है।
मैत्रः (Maitrah) मित्रता रखने वाला, सुहृद। सबके प्रति आत्मीयता का भाव रखना, बिना किसी स्वार्थ या अपेक्षा के प्रत्येक प्राणी का हित चाहना।
करुणः एव च (Karunah Eva Cha) और जो दयालु स्वभाव का है। दूसरों के दुखों को देखकर जिसका हृदय द्रवित हो जाए और जो उनके कष्टों को दूर करने के लिए तत्पर रहे।
निर्ममः (Nirmamah) ममता से रहित। शरीर, घर, परिवार, धन और संसार की किसी भी वस्तु या व्यक्ति में 'यह मेरा है' (ममत्व) की आसक्ति का सर्वथा अभाव।
निरहङ्कारः (Nirahankaarah) अंककार से रहित। 'मैं शरीर हूँ' या 'मैंने यह महान कार्य किया है' इस प्रकार के कर्तापन और घमंड का पूर्णतः विसर्जन।
समदुःखसुखः (Samaduhkhasukhah) सुख और दुःख में समान रहने वाला। अनुकूल परिस्थिति में अत्यधिक हर्षित न होना और प्रतिकूल परिस्थिति में विचलित या शोकग्रस्त न होना (स्थितप्रज्ञता)।
क्षमी (Kshami) क्षमाशील, सहनशील। अपराध करने वाले को भी क्षमा कर देने की विशाल हृदयता और अंतःकरण की अद्भुत सहनशक्ति।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भागवतगीता का यह बारहवां अध्याय उस ऐतिहासिक और दार्शनिक संवाद की पृष्ठभूमि में प्रकट हुआ है, जो कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण और पांडव श्रेष्ठ अर्जुन के मध्य घटित हुआ था। ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन ने भगवान के विराट रूप का दर्शन किया, जो अत्यंत तेजोमय, भयानक और अद्भुत था। उस विराट रूप को देखकर अर्जुन चकित भी हुए और भयभीत भी। तत्पश्चात, बारहवें अध्याय के आरंभ में अर्जुन ने भगवान के समक्ष एक अत्यंत तार्किक और गंभीर प्रश्न रखा: "एवं सततयुक्ता ये भक्त्या त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमः॥"—हे प्रभु! जो निरंतर आपके सगुण रूप की पूजा करते हैं और जो उस अविनाशी, अव्यक्त ब्रह्म की उपासना करते हैं, उनमें से योग को सबसे अच्छी प्रकार जानने वाले कौन हैं?

इस प्रश्न के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण ने सगुण भक्ति की श्रेष्ठता को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि निराकार ब्रह्म की उपासना का मार्ग अत्यंत कठिन है और शरीर-धारी मनुष्यों के लिए वह मार्ग सहज नहीं है। इसके तुरंत बाद, भगवान ने उस सच्चे भक्त के लक्षणों का बखान करना शुरू किया जो उन्हें अत्यंत प्रिय है। श्लोक 13 से 19 तक की यह श्रृंखला वास्तव में महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व का हिस्सा है। इस प्रसंग में यह दर्शाया गया है कि भगवान को न तो केवल बाहरी आडंबर प्रिय हैं और न ही लंबे-चौड़े कर्मकांड, बल्कि उन्हें वह मनुष्य सबसे अधिक प्रिय है जिसके भीतर आंतरिक पवित्रता, क्षमा, करुणा और समता का भाव स्थायी रूप से निवास करता है।

पुराणों और वेदों के इतिहास में ऐसे कई ऋषियों और भक्तों के उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने इन गुणों को अपने जीवन में चरितार्थ किया। उदाहरणस्वरूप, प्रह्लाद महाराज ने अपने ही पिता हिरण्यकशिपु द्वारा दिए गए असीम कष्टों और अत्याचारों के बावजूद कभी उनके प्रति द्वेष या दुर्भावना नहीं रखी। उनके हृदय में केवल और केवल भगवान के प्रति प्रेम और संपूर्ण चराचर के प्रति करुणा व क्षमा का ही वास था। इसी प्रकार महर्षि वशिष्ठ, शांतनु, और राजा परीक्षित जैसे महान पात्रों के जीवनचरित में भी इन सात्विक गुणों का साक्षात दर्शन होता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाते हैं कि जो व्यक्ति इन गुणों को अपने भीतर आत्मसात कर लेता है, वह संसार में रहते हुए भी संसार के बंधनों से पूरी तरह मुक्त रहता है और साक्षात् ईश्वर का जीवंत मंदिर बन जाता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

इस महान श्लोक का स्मरण, मनन और इसके अर्थ को जीवन में उतारने से साधक को अनेकों आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और संतापों से मुक्ति

अद्वेष और ममता का त्याग करने से मन की उद्विग्नता समाप्त होती है। जब व्यक्ति किसी से ईर्ष्या नहीं करता, तो उसका आंतरिक संघर्ष स्वतः समाप्त हो जाता है और परम शांति की प्राप्ति होती है।

2. सकारात्मक ऊर्जा औरा (Aura) का विकास

करुणा, मैत्री और क्षमाशीलता जैसे उच्च सात्विक भाव व्यक्ति के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और सकारात्मक ऊर्जा का आवरण तैयार करते हैं, जिससे नकारात्मक शक्तियां और विचार दूर रहते हैं।

3. कार्मिक शुद्धि (कर्म बंधनों से मुक्ति)

जब साधक अहंकार और ममत्व से मुक्त होकर कार्य करता है, तो उसके नए कर्मों का बंधन नहीं बनता। पुराने संचित कर्म भी भगवत्कृपा और समता के भाव से शीघ्र क्षीण होने लगते हैं।

4. भगवान श्रीकृष्ण की अहैतुक कृपा

श्रीमद्भागवतगीता में भगवान स्वयं कहते हैं कि ऐसा भक्त उन्हें अतिप्रिय है। जो गुण भगवान को प्रिय हैं, उन्हें धारण करने वाले पर भगवान की कृपा का अमृत स्वतः बरसने लगता है।

5. उच्च आत्म-नियंत्रण और सहनशक्ति

'क्षमी' और 'समदुःखसुखः' के अभ्यास से व्यक्ति की सहनशक्ति और संकटों से लड़ने की मानसिक क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि होती है, जिससे वह हर परिस्थिति में अडिग रहता है।

6. सामाजिक सद्भाव और संबंधों में मधुरता

जिस व्यक्ति के हृदय में सबके लिए मैत्री और करुणा होती है, उसके संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को आत्मीयता का अनुभव होता है, जिससे समाज में प्रेम और सद्भाव फैलता है।

7. जीवन के अंतिम लक्ष्य (मोक्ष) की प्राप्ति

भक्ति के इन सोपानों को पार करते हुए साधक क्रमशः अद्वैत चेतना में स्थित हो जाता है, जहाँ जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति यानी मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।

8. अहंकार और तनाव से पूर्ण स्वतंत्रता

अहंकार और ममत्व ही समस्त मानसिक रोगों और तनावों की जड़ हैं। 'निर्ममो निरहङ्कारः' का अभ्यास इन मानसिक विकारों को जड़ से उखाड़ फेंकने में समर्थ है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन संस्कृति के मूल ग्रंथों, विशेषकर महर्षि वेदव्यास विरचित श्रीमद्भागवतगीता (अध्याय 12, श्लोक 13), उपनिषदों और वैष्णव आचार्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज और स्वामी प्रभुपाद) की टीकाओं के गहन अध्ययन पर आधारित है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि प्रत्येक विषय का प्रस्तुतीकरण शास्त्रीय शुद्धता, भाषाई गरिमा और आधुनिक पाठकों की समझ को ध्यान में रखते हुए किया जाए। यह आलेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत आता है, जिसका उद्देश्य पाठकों को वेदों और पुराणों के शाश्वत ज्ञान से जोड़ना और उनके आध्यात्मिक विकास में मार्गदर्शक की भूमिका निभाना है। यदि इस लेख से संबंधित आपके कोई प्रश्न या सुझाव हैं, तो आप नीचे दिए गए अनुभाग में टिप्पणी कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

इसका अर्थ है कि मनुष्य को किसी भी जीव—चाहे वह मनुष्य हो या पशु-पक्षी—के प्रति अपने मन में द्वेष, ईर्ष्या या दुर्भावना नहीं रखनी चाहिए। सांसारिक संघर्षों के बीच भी सभी के प्रति सद्भाव रखना ही इस पद का मूल संदेश है।

यह स्थिति निरंतर आत्मचिंतन, निष्काम कर्म और यह समझने से प्राप्त होती है कि यह शरीर और संसार की वस्तुएं नश्वर हैं तथा हम सब केवल निमित्त मात्र हैं। हर कार्य को भगवान को समर्पित करने से अहंकार और ममता स्वतः क्षीण हो जाते हैं।

यह श्लोक श्रीमद्भागवतगीता के बारहवें अध्याय (जिसे 'भक्तियोग' कहा जाता है) का तेरहवां श्लोक है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने सात्विक भक्त के विशिष्ट लक्षणों का विस्तार से वर्णन किया है।

इसका अर्थ भावनाओं का शून्य होना नहीं है, बल्कि सुख और दुःख दोनों ही परिस्थितियों में अपनी मानसिक स्थिरता (स्थितप्रज्ञता) को बनाए रखना है। अनुकूलता में अत्यधिक हर्षित न होना और प्रतिकूलता में विचलित न होना ही समता है।

हाँ, इस श्लोक का नियमित पाठ और इसके अर्थ पर मनन करने से अहंकार, ईर्ष्या और मोह जैसी मानसिक उलझनें दूर होती हैं, जिससे आधुनिक जीवन के तनाव से मुक्ति मिलती है और आंतरिक आनंद की अनुभूति होती है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं: जो सब प्राणियों से द्वेष नहीं करता, सबसे मित्रवत् और करुणामय है, ममता और अहंकार से रहित है, सुख-दुःख में समान रहता है, और क्षमाशील है, वह भक्त मुझे प्रिय है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भक्ति का वास्तविक लक्षण बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि अन्तःकरण की पवित्रता और सबके प्रति प्रेमभाव है। ये गुण साधक को ईश्वर के समीप ले जाते हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 12: भक्ति योग (Bhakti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 13 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 13/20 65% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!