भक्ति योग (Bhakti Yoga) – श्लोक 13
भक्त के लक्षण: सबसे द्वेष न करना, मित्रभाव, करुणा, ममतारहित, निरहंकार, दुःख-सुख में सम, क्षमाशील।
संस्कृत श्लोक
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च । निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३॥
adveṣṭā sarva-bhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca | nirmamo nirahaṅkāraḥ sama-duḥkha-sukhaḥ kṣamī ||13||
पदच्छेद / शब्दार्थ
अद्वेष्टा: non-hating; सर्व-भूतानाम्: towards all beings; मैत्र: friendly; करुण: compassionate; एव: certainly; च: and; निर्मम: free from possessiveness; निरहङ्कार: free from ego; सम-दुःख-सुख: equal in sorrow and happiness; क्षमी: forgiving.
हिंदी अनुवाद
जो सब प्राणियों से द्वेष नहीं करता, सबसे मित्रभाव और करुणा रखता है, तथा ममता और अहंकार से रहित है, दुःख-सुख में समान रहता है और क्षमाशील है,
English Translation
He who hates no creature, is friendly and compassionate to all, free from possessiveness and ego, balanced in pleasure and pain, forgiving,
टीका / Commentary
अब भगवान भक्त के लक्षण बताते हैं। यहाँ से लेकर श्लोक 19 तक सात्विक भक्त के गुणों का वर्णन है। पहला गुण है अद्वेष्टा - किसी से द्वेष न करना, सबसे मैत्री और करुणा, ममता और अहंकार का अभाव, दुःख-सुख में समता, और क्षमाशीलता।