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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 12 · श्लोक 10

अध्याय 12 · श्लोक 10

भक्ति योग (Bhakti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १०॥

abhyāse 'py asamartho 'si mat-karma-paramo bhava | mad-artham api karmāṇi kurvan siddhim avāpsyasi ||10||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अभ्यासे: in practice; अपि: even; असमर्थ: unable; असि: you are; मत्-कर्म-परम: intent on working for Me; भव: become; मत्-अर्थम्: for My sake; अपि: even; कर्माणि: actions; कुर्वन्: doing; सिद्धिम्: perfection; अवाप्स्यसि: you will attain.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

यदि तुम अभ्यास करने में भी असमर्थ हो, तो मेरे लिए कर्म करने में तत्पर हो जाओ। मेरे लिए कर्म करते हुए भी तुम सिद्धि को प्राप्त करोगे।

English Translation

If you are unable even to practice, then be intent on working for Me. Even by doing actions for My sake, you will attain perfection.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यदि अभ्यास भी न कर सको तो मेरे लिए कर्म करो। फल की इच्छा छोड़कर मुझे समर्पित भाव से कर्म करना भी सिद्धि देगा।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।