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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 10 · श्लोक 9

अध्याय 10 · श्लोक 9

विभूति योग (Vibhuti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् | कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च || ९||

mac-cittā mad-gata-prāṇā bodhayantaḥ parasparam | kathayantaś ca māṃ nityaṃ tuṣyanti ca ramanti ca ||9||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

मच्चित्ता: मुझमें चित्त लगाने वाले; मद्गतप्राणा: मुझमें प्राण अर्पण करने वाले; बोधयन्तः: समझाते हुए; परस्परम्: परस्पर; कथयन्तः: कहते हुए; च: और; माम्: मुझे; नित्यम्: निरन्तर; तुष्यन्ति: संतुष्ट होते हैं; च: और; रमन्ति: रमण करते हैं; च: भी।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

मेरे भक्तजन मुझमें चित्त लगाकर और मुझमें प्राणों को अर्पण करके, परस्पर मुझे समझाते और निरन्तर मेरा कथन करते हुए संतुष्ट होते हैं और मुझमें ही रमण करते हैं।

English Translation

With their minds and lives entirely absorbed in Me, enlightening each other and always speaking of Me, they remain satisfied and delighted.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

Krishna describes the beautiful interactions of His devotees. They constantly think of Him, their lives are dedicated to Him, and they find joy in discussing His divine qualities with each other. This mutual enlightenment and shared devotion brings them supreme satisfaction and bliss.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।