श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 8

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 41 मिनट का पठन 142 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते | इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः || ८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
अहम्
मैं
सर्वस्य
सबका
प्रभव
उद्गम स्थान (स्रोत)
मत्त
मुझसे
सर्वम्
सब कुछ
प्रवर्तते
प्रवृत्त होता है
इति
इस प्रकार
मत्वा
जानकर
भजन्ते
भजते हैं
माम्
मुझे
बुधा
ज्ञानी पुरुष
भाव-समन्विता
भाव से युक्त।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मैं सम्पूर्ण जगत का उद्गम स्थान हूँ; मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है। ऐसा जानकर भावपूर्ण भक्तियुक्त ज्ञानीजन मेरा भजन करते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय 'विभूति योग' का यह आठवां श्लोक मात्र एक मंत्र नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड के सृजन, पालन और लय का आध्यात्मिक घोषणापत्र है। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ स्वयं को 'सर्वस्य प्रभवो' कहकर उस परम सत्य को उद्घाटित करते हैं, जिसे जानने के बाद साधक के मन में कोई संशय शेष नहीं रहता। यह श्लोक 'चतुःश्लोकी गीता' (श्लोक 8 से 11) का प्रथम और आधारभूत स्तंभ है। आध्यात्मिक जगत में इसे 'बीज श्लोक' माना जाता है, क्योंकि इसमें अद्वैत वेदांत और भक्ति मार्ग का वह अद्भुत संगम है, जहाँ ज्ञान और प्रेम एक हो जाते हैं।

सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें यह समझाता है कि इस दृश्यमान जगत में जो कुछ भी गतिशील या स्थिर है, वह उस एक ही चेतना का विस्तार है। जब श्रीकृष्ण कहते हैं 'मत्तः सर्वं प्रवर्तते' (मुझसे ही सब कुछ प्रवर्तित होता है), तो वे केवल भौतिक सृष्टि की बात नहीं कर रहे, बल्कि वे विचारों, भावनाओं, काल की गति और कर्म के सिद्धांतों के मूल स्रोत के रूप में स्वयं को स्थापित कर रहे हैं। इस सत्य को स्वीकार करना ही 'बुध' (ज्ञानी) होने की पहली सीढ़ी है।

आज के आधुनिक युग में, जहाँ मनुष्य स्वयं को प्रकृति से अलग और एकाकी महसूस करता है, यह श्लोक एक महान सांत्वना और शक्ति प्रदान करता है। यह हमें बताता है कि हम उस अनंत सत्ता के अंश हैं। इस श्लोक का अनुशीलन करने से साधक के भीतर 'भावसमन्विताः' यानी श्रद्धा और प्रेम से युक्त भाव का उदय होता है। यह केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं है, बल्कि हृदय की वह अनुभूति है जो भक्त को भगवान के साथ एकाकार कर देती है। इस लेख में हम इस श्लोक की गहराई में उतरेंगे और इसके शास्त्रीय, दार्शनिक और व्यावहारिक पक्षों का अन्वेषण करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ मूल श्लोक ॥

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।

इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ ८॥

पदच्छेद (Word Breakup):

अहम् — सर्वस्य — प्रभवः — मत्तः — सर्वम् — प्रवर्तते ।
इति — मत्वा — भजन्ते — माम् — बुधाः — भाव-समन्विताः ॥

अन्वय (Prose Order):

अहं सर्वस्य प्रभवः, मत्तः सर्वं प्रवर्तते; इति मत्वा भावसमन्विताः बुधाः मां भजन्ते।

सरल हिंदी अनुवाद:

"मैं ही संपूर्ण जगत की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सब कुछ चेष्टा (प्रवृत्त) करता है; ऐसा मानकर अनन्य प्रेम और श्रद्धा से युक्त बुद्धिमान भक्त मेरा ही निरंतर भजन करते हैं।"

पाठ की विधि:

  • प्रातः काल स्नान के पश्चात शुद्ध आसन पर बैठकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करें।
  • भगवान श्रीकृष्ण के 'पार्थसारथी' स्वरूप का ध्यान करें।
  • इस श्लोक का कम से कम 11, 21 या 108 बार स्पष्ट उच्चारण के साथ जप करें।
  • जप के समय यह भाव रखें कि आपके भीतर की चेतना और बाहर का जगत सब कृष्णमय है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अहं (Aham) मैं (परमेश्वर) यहाँ 'मैं' देहधारी कृष्ण नहीं, बल्कि वह 'परब्रह्म' है जो अजन्मा और अविनाशी है। यह अहंकार का नहीं, बल्कि पूर्णता का उद्घोष है।
सर्वस्य (Sarvasya) सबका / संपूर्ण का इसमें जड़ और चेतन, दृश्य और अदृश्य, भूत, भविष्य और वर्तमान—सब कुछ सम्मिलित है। कुछ भी इससे बाहर नहीं है।
प्रभवः (Prabhavah) उत्पत्ति का कारण / स्रोत जैसे स्वर्ण आभूषणों का कारण है, वैसे ही परमात्मा जगत का 'उपादान' और 'निमित्त' दोनों कारण हैं।
मत्तः (Mattah) मुझसे ही यह शब्द स्पष्ट करता है कि परमात्मा के अतिरिक्त कोई दूसरी सत्ता नहीं है जो सृष्टि का संचालन कर सके।
सर्वं (Sarvam) सब कुछ ब्रह्मांड की गति, ग्रहों का भ्रमण, जीवन का स्पंदन और बुद्धि का विचार—सब कुछ इसी 'सर्वं' में समाहित है।
प्रवर्तते (Pravartate) चेष्टा करता है / चलता है सृष्टि केवल उत्पन्न नहीं हुई, बल्कि वह निरंतर गतिशील है। यह गतिशीलता परमात्मा की शक्ति (माया) से ही संभव है।
इति मत्वा (Iti Matva) ऐसा मानकर / जानकर यह केवल सूचना नहीं है, बल्कि 'अनुभवजन्य ज्ञान' है। जब साधक इसे हृदय से स्वीकार कर लेता है, तब उसका दृष्टिकोण बदल जाता है।
बुधाः (Budhah) बुद्धिमान / ज्ञानी ज्ञानी वह नहीं जो केवल शास्त्र रटता है, बल्कि वह है जो सत्य को पहचानकर परमात्मा के चरणों में समर्पित हो जाता है।
भावसमन्विताः (Bhava-samanvitah) प्रेम और श्रद्धा से युक्त भक्ति में केवल क्रिया नहीं, बल्कि 'भाव' प्रधान है। बिना भाव के की गई पूजा केवल एक यांत्रिक प्रक्रिया है।
भजन्ते (Bhajante) भजन करते हैं / सेवा करते हैं भजन का अर्थ है 'भज' धातु, जिसका अर्थ है सेवा करना या तन्मय हो जाना। यह निरंतर स्मरण की अवस्था है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय को 'विभूति योग' कहा जाता है। इस अध्याय की पृष्ठभूमि अत्यंत महत्वपूर्ण है। अर्जुन ने नौवें अध्याय में भगवान की महिमा सुनी थी, लेकिन उसकी जिज्ञासा अभी शांत नहीं हुई थी। वह यह जानना चाहता था कि वह इस संसार के किन-किन भावों में भगवान का दर्शन करे। इसी जिज्ञासा के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों का वर्णन शुरू किया।

चतुःश्लोकी गीता का महत्व: आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और श्रीधर स्वामी जैसे महान टीकाकारों ने श्लोक 8 से 11 को 'चतुःश्लोकी गीता' की संज्ञा दी है। माना जाता है कि यदि कोई व्यक्ति पूरी गीता नहीं पढ़ सकता, तो वह केवल इन चार श्लोकों के अर्थ को समझकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। श्लोक 8 इस श्रृंखला का 'बीज' है। इसमें भगवान अपनी सर्वोपरिता सिद्ध करते हैं।

पौराणिक संदर्भ: उपनिषदों में 'एकोऽहं बहुस्यामि' (मैं एक हूँ, बहुत हो जाऊं) का जो संकल्प वर्णित है, उसी का सरल और स्पष्ट रूप इस श्लोक में झलकता है। महाभारत के युद्ध क्षेत्र में, जहाँ विनाश सामने खड़ा था, श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बता रहे हैं कि विनाश भी मुझसे है और सृजन भी। यह ज्ञान अर्जुन के मोह को नष्ट करने के लिए आवश्यक था। जब अर्जुन को यह समझ आया कि उसके सामने खड़े भीष्म, द्रोण और स्वयं वह भी कृष्ण की ही शक्ति से संचालित हैं, तब उसका 'कर्तृत्व' का अहंकार समाप्त हुआ।

दार्शनिक गहराई: सांख्य दर्शन प्रकृति और पुरुष को अलग मानता है, लेकिन गीता यहाँ समन्वय करती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि प्रकृति (जड़) और पुरुष (चेतन) दोनों का मूल 'मैं' ही हूँ। यह अद्वैत की पराकाष्ठा है। यहाँ 'बुध' शब्द का प्रयोग विशेष है। सामान्यतः बुद्धिमान उसे कहा जाता है जो संसार में चतुर हो, लेकिन गीता के अनुसार बुद्धिमान वह है जो संसार की विविधता के पीछे छिपी 'एकता' (परमात्मा) को देख सके।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक शांति: यह बोध कि सब कुछ ईश्वर से संचालित है, अनावश्यक चिंता और तनाव को समाप्त करता है।
  • अहंकार का नाश: जब हम स्वीकार करते हैं कि 'मत्तः सर्वं प्रवर्तते', तो हमारे भीतर का 'मैं कर्ता हूँ' वाला भाव मिटने लगता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): इस श्लोक के निरंतर जप से साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है।
  • एकाग्रता में वृद्धि: 'बुध' बनने की प्रक्रिया में बुद्धि सूक्ष्म और तीक्ष्ण होती है, जिससे निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
  • भय से मुक्ति: मृत्यु और हानि का भय तब समाप्त हो जाता है जब हम स्रोत (Source) से जुड़ जाते हैं।
  • कर्म शुद्धि: यह श्लोक हमें सिखाता है कि प्रत्येक कर्म ईश्वर को समर्पित होना चाहिए, जिससे कर्म बंधन नहीं बनते।
  • दिव्य प्रेम का उदय: 'भावसमन्विताः' होने से हृदय में प्राणी मात्र के प्रति करुणा और प्रेम जागृत होता है।
  • प्रारब्ध का क्षय: अनन्य भक्ति से संचित कर्मों का प्रभाव कम होने लगता है और साधक भगवद-कृपा का पात्र बनता है।
  • आत्म-साक्षात्कार: यह श्लोक साधक को उसकी वास्तविक पहचान (आत्मा) की ओर ले जाता है।
  • सृष्टि से जुड़ाव: हम प्रकृति को संसाधन नहीं, बल्कि ईश्वर का रूप मानकर उसका सम्मान करना सीखते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह विश्लेषण श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों (यथा शांकरभाष्य, रामानुजभाष्य और साधक संजीवनी) के गहन अध्ययन पर आधारित है। भक्तिलोक के विद्वानों द्वारा तैयार इस मार्गदर्शिका का उद्देश्य प्राचीन संस्कृत ज्ञान को आधुनिक संदर्भ में सुलभ बनाना है। इस श्लोक की व्याख्या में 'प्रभवः' और 'प्रवर्तते' शब्दों पर विशेष बल दिया गया है, जो क्रमशः 'कारण' और 'कार्य' के सिद्धांत को स्पष्ट करते हैं। यह सामग्री आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए एक विश्वसनीय स्रोत के रूप में प्रस्तुत की गई है, ताकि वे गीता के मर्म को आत्मसात कर सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

श्रीमद्भगवद्गीता के 10वें अध्याय के श्लोक 8, 9, 10 और 11 को 'चतुःश्लोकी गीता' कहा जाता है। ये चार श्लोक पूरी गीता का सार हैं। श्लोक 8 में भगवान के स्वरूप का ज्ञान है, 9 में भक्तों के लक्षण हैं, 10 में भगवान द्वारा दी जाने वाली बुद्धि (बुद्धियोग) का वर्णन है, और 11 में अज्ञान के नाश का फल बताया गया है। इसलिए, यह श्लोक आध्यात्मिक यात्रा की नींव है।

यहाँ 'बुधाः' का अर्थ केवल वह व्यक्ति नहीं है जिसके पास बहुत सारी जानकारी या डिग्रियां हैं। गीता के अनुसार, असली बुद्धिमान वह है जिसने यह जान लिया है कि संसार की हर वस्तु, घटना और जीव का मूल स्रोत परमात्मा है। जो इस सत्य को जानकर अहंकार त्याग देता है और भक्ति में लग जाता है, वही वास्तव में 'बुध' है।

'भाव' का अर्थ है आंतरिक भावना, श्रद्धा और प्रेम। भगवान केवल क्रिया (जैसे फूल चढ़ाना या मंत्र बोलना) नहीं देखते, वे उस क्रिया के पीछे का भाव देखते हैं। 'भावसमन्विताः' का अर्थ है कि भक्त का हृदय पूरी तरह से ईश्वर के प्रति अनुराग से भरा हुआ है। बिना भाव के ज्ञान शुष्क होता है और बिना ज्ञान के भाव अंधविश्वास बन सकता है; यह श्लोक दोनों के संतुलन पर जोर देता है।

यह श्लोक पूर्णतः सार्वभौमिक (Universal) है। यह किसी विशेष मजहब की बात नहीं करता, बल्कि 'परम सत्य' (Absolute Truth) की बात करता है। विज्ञान भी मानता है कि पूरे ब्रह्मांड की ऊर्जा का एक ही स्रोत है। श्रीकृष्ण उसी स्रोत को 'अहं' (मैं) कह रहे हैं। यह सत्य हर उस व्यक्ति के लिए है जो जीवन के मूल कारण की खोज कर रहा है।

दैनिक जीवन में इसका अर्थ है 'समर्पण'। जब हम कोई कार्य करते हैं और उसमें बाधा आती है, तो हम परेशान हो जाते हैं। लेकिन यह याद रखने पर कि 'सब कुछ उन्हीं से प्रवर्तित हो रहा है', हम सफलता और विफलता दोनों को प्रसाद रूप में स्वीकार करना सीख जाते हैं। यह हमें धैर्यवान बनाता है और हमारे भीतर के 'कंट्रोल' करने की इच्छा को कम करता है, जिससे मानसिक शांति मिलती है।

निष्कर्ष: भक्ति और ज्ञान का संगम

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक हमें एक ऐसी दृष्टि प्रदान करता है जिससे संसार बोझ नहीं, बल्कि परमात्मा की लीला प्रतीत होने लगता है। जब हम 'अहं सर्वस्य प्रभवो' को आत्मसात कर लेते हैं, तब हमारा जीवन एक उत्सव बन जाता है। आइए, हम भी उन 'बुध' जनों की श्रेणी में शामिल हों जो प्रेम और ज्ञान के साथ उस परम सत्ता का निरंतर स्मरण करते हैं।


जय श्री कृष्णा! आपकी आध्यात्मिक यात्रा मंगलमय हो।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: "मैं समस्त सृष्टि का उद्गम स्रोत हूँ; मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है।" यह गीता का एक मूल मंत्र है। जो ज्ञानीजन इस सत्य को हृदयंगम कर लेते हैं, वे भावपूर्ण होकर मेरा भजन करते हैं।

This verse establishes Krishna as the Supreme Cause of all causes. He is not merely a teacher or an avatar but the very source from which everything emanates. Wise devotees, recognizing this truth, worship Him with deep feeling and devotion.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 8 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 8/42 19% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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