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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 10 · श्लोक 8

अध्याय 10 · श्लोक 8

विभूति योग (Vibhuti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते | इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः || ८||

ahaṃ sarvasya prabhavo mattaḥ sarvaṃ pravartate | iti matvā bhajante māṃ budhā bhāva-samanvitāḥ ||8||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अहम्: मैं; सर्वस्य: सबका; प्रभव: उद्गम स्थान (स्रोत); मत्त: मुझसे; सर्वम्: सब कुछ; प्रवर्तते: प्रवृत्त होता है; इति: इस प्रकार; मत्वा: जानकर; भजन्ते: भजते हैं; माम्: मुझे; बुधा: ज्ञानी पुरुष; भाव-समन्विता: भाव से युक्त।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

मैं सम्पूर्ण जगत का उद्गम स्थान हूँ; मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है। ऐसा जानकर भावपूर्ण भक्तियुक्त ज्ञानीजन मेरा भजन करते हैं।

English Translation

I am the source of all; from Me everything evolves. Understanding thus, the wise, endowed with meditation, worship Me.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

This is one of the most important verses of the Gita. Krishna declares Himself to be the source of everything — both material and spiritual. The wise, understanding this fundamental truth, worship Him with full devotion and love. Verses 8-11 are considered the four essential verses of the Gita by many commentators [citation:7].
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।