श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 7

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 47 मिनट का पठन 131 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः | सोऽविकल्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः || ७||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
एताम्
इस
विभूतिम्
विभूति को
योगम्
योग को
च
और
मम
मेरे
य
जो
वेत्ति
जानता है
तत्त्वतः
तत्व से
स
वह
अविकल्पेन
विकल्परहित (अचल)
योगेन
योग से
युज्यते
युक्त हो जाता है
न
नहीं
अत्र
इसमें
संशयः
संशय।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो पुरुष मेरी इस विभूति और योगशक्ति को तत्व से जान लेता है, वह निश्चल योग से युक्त हो जाता है; इसमें कोई संशय नहीं है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय चेतना

सनातन संस्कृति और वेदान्त दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान केवल एक ग्रंथ के रूप में नहीं, अपितु साक्षात ब्रह्मविद्या और उपनिषदों के सार के रूप में है। महाभारत के युद्धक्षेत्र में कुरुक्षेत्र की पावन भूमि पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश संपूर्ण मानव जाति के लिए मानसिक संताप, जीवन के भ्रम और अस्तित्व संबंधी संकटों से मुक्ति पाने का एकमात्र मार्ग हैं। विशेष रूप से, दशम अध्याय, जिसे 'विभूतियोग' के नाम से जाना जाता है, साधक की चेतना को स्थूल जगत से निकालकर उस सूक्ष्म और अनंत परम सत्य की ओर मोड़ने का कार्य करता है, जो संपूर्ण चराचर जगत का मूल आधार है।

इस अध्याय में अर्जुन के बार-बार अनुरोध करने पर कि वे अपनी किन-किन विभουतिओं (महिमामयी शक्तियों और रूपों) के माध्यम से सर्वत्र व्याप्त हैं, भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अनंत शक्तियों का विस्तार से वर्णन किया है। परंतु, इस संपूर्ण वर्णन का जो चरमोत्कर्ष है, जो निष्कर्ष है, वह ठीक इस श्लोक—"एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः | सोऽविकल्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः || ७||"—में आकर प्रकट होता है। यह श्लोक केवल कुछ शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह उस परम रहस्य की कुंजी है जिसके द्वारा एक सामान्य मानव अपनी सीमित देहाध्यास (शरीर की आसक्ति) की चेतना को पार करके ब्रह्मांडीय चेतना के साथ तादात्म्य स्थापित कर सकता है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, इस श्लोक का महत्व इस बात में निहित है कि यह मनुष्य को 'अपरपरोक्ष ज्ञान' यानी सतही जानकारी से ऊपर उठाकर 'तत्त्वज्ञान' यानी यथार्थ बोध की यात्रा कराता है। जब कोई साधक यह समझ लेता है कि इस संसार में जितनी भी विभूतियाँ—चाहे वह ऐश्वर्य हो, तेज हो, शक्ति हो, ज्ञान हो या सौंदर्य हो—वे सब उस एक ही परम पुरुष के अंश मात्र हैं, तब उसकी दृष्टि में भेद-बुद्धि समाप्त हो जाती है। वह हर कण में परमात्मा के दर्शन करने लगता है। यही वह स्थिति है जिसे भारतीय अध्यात्म में 'समदर्शन' कहा गया है। इस लेख के माध्यम से हम इसी महान श्लोक के शाब्दिक अर्थ, व्याकरणिक संरचना, दार्शनिक गहराई और इसके व्यावहारिक जीवन में अनुप्रयोगों का विस्तृत अध्ययन करेंगे, ताकि हर साधक भक्ति और ज्ञान के इस पावन संगम में गोता लगा सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ श्रीमद्भगवद्गीता अथ दशमोध्यायः (विभूतियोग) ॥

श्लोक संख्या ०७

एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः।
सोऽविकल्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥ ७॥

पदच्छेदः: एताम्, विभूतिम्, योगम्, च, मम, यः, वेत्ति, तत्त्वतः। सः, अविकल्पेन, योगेन, युज्यते, न, अत्र, संशयः॥

इस श्लोक का सस्वर पाठ करने से चित्त में एकाग्रता और सात्विक ऊर्जा का संचार होता है। इसके उच्चारण की विधि यह है कि प्रातःकाल ब्रह्म बेला में स्नान करने के पश्चात शुद्ध वस्त्र धारण कर, भगवान श्रीकृष्ण के विग्रह या उनके चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित करके पूर्ण श्रद्धा और स्पष्ट उच्चारण के साथ इसका पाठ करना चाहिए। प्रत्येक शब्द पर विश्राम देते हुए इसके अर्थ का मन में स्मरण करना ही इसका सच्चा मानसिक अनुष्ठान है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लोक के आंतरिक रहस्यों को समझने के लिए प्रत्येक पद का व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण अत्यंत आवश्यक है। नीचे दी गई सारणी में श्लोक के हर शब्द को तोड़कर उसके सरल अर्थ और उसके गहरे आध्यात्मिक निहितार्थ को स्पष्ट किया गया है:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Spiritual Interpretation)
एताम् (Etām) इस (प्रकार की) भगवान द्वारा पूर्व में वर्णित अनंत और अद्भुत महिमाओं और लक्षणों की ओर संकेत।
विभूतिम् (Vibhūtim) ऐश्वर्य, महिमा, विभूति संसार में दिखाई देने वाली समस्त श्रेष्ठ, उत्तम, शक्तिशाली और कांतिवान वस्तुएं या स्थितियां।
योगम् च (Yogam Cha) और योग शक्ति को वह अचिंत्य शक्ति जिसके द्वारा भगवान अपनी निराकार सत्ता से इस साकार ब्रह्मांड को धारण करते हैं।
मम (Mama) मेरी यह स्पष्ट करना कि यह सारी माया, शक्ति और विभूतियां किसी अन्य स्वतंत्र सत्ता की नहीं, बल्कि स्वयं परमब्रह्म की हैं।
यः (Yaḥ) जो मनुष्य वह जिज्ञासु, भक्त या ज्ञानी पुरुष जो केवल सतही बातों में न रहकर गहराई तक उतरने का साहस रखता है।
वेत्ति (Vetti) जानता है (समझता है) केवल बौद्धिक रूप से रटना नहीं, अपितु प्रत्यक्ष अनुभव और साक्षात अनुभूति के स्तर पर जानना।
तत्त्वतः (Tattvataḥ) यथार्थ रूप से, तत्त्व से भ्रम, संशय और अज्ञान से मुक्त होकर परम सत्य के मूल स्वभाव को पहचानना।
सः (Saḥ) वह पुरुष वही अधिकारी साधक जो इस परम ज्ञान को अपने जीवन का आधार बनाता है।
अविकल्पेन (Avikalpena) अविकल्प योग द्वारा, बिना किसी संदेह के ऐसी मानसिक स्थिति जहाँ कोई दूजा भाव (द्वैत) या विकल्प न बचे, केवल अद्वैत प्रेम और अखंड एकता हो।
योगेन (Yogena) योग के द्वारा (परमात्मा से मिलन) जीवात्मा और परमात्मा के मिलन की वह सहज अवस्था जो कभी खंडित नहीं होती।
युज्यते (Yujyate) जुड़ जाता है / युक्त हो जाता है उसकी चेतना सदा-सर्वदा के लिए उस परम दिव्य चेतना में तल्लीन हो जाती है।
न अत्र संशयः (Na Atra Saṁśayaḥ) इसमें कोई संशय नहीं है भगवान की यह अकाट्य प्रतिज्ञा है कि इस मार्ग पर चलने वाले की सफलता सुनिश्चित है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें श्रीमद्भगवद्गीता के इतिहास और इसके संकलनकर्ता महर्षि वेद व्यास की दृष्टि को समझना होगा। महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत भगवद्गीता के कुल 18 अध्याय आते हैं। जब कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब अर्जुन अपने सगे-संबंधियों को सामने देखकर मोहग्रस्त हो गए और उनके हाथ से गांडीव धनुष छूट गया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन, कर्तव्य, कर्म, ज्ञान और भक्ति का जो उपदेश दिया, वही गीता है।

दशम अध्याय तक पहुंचते-पहुंचते अर्जुन भगवान के विराट रूप और उनकी ऐश्वर्यमयी शक्तियों के बारे में और अधिक जानने के लिए उत्सुक हो उठते हैं। अर्जुन कहते हैं—"वक्तासि हि भूयोऽथ कथय तृप्तिर्हि मेऽश्र्वतः" (हे जनार्दन! आप अपनी योगशक्ति और विभूतियों का विस्तार से वर्णन कीजिए, क्योंकि आपके वचनों को सुनते-सुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है, बल्कि अमृत के समान और अधिक सुनने की इच्छा हो रही है)।

इसके उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण अपनी विभूतियों का वर्णन प्रारंभ करते हैं—वे कहते हैं कि समस्त भूतों की उत्पत्ति का बीज मैं ही हूँ, देवताओं में मैं इन्द्र हूँ, वेदों में सामवेद हूँ, और ऋषियों में मरीचि हूँ। परंतु इन हजारों रूपों और नामों के गिनाने के बाद, भगवान इस सातवें श्लोक में एक दार्शनिक विराम लगाते हैं। वे समझाते हैं कि नाम और रूप अनंत हो सकते हैं, लेकिन उन सबका मूल आधार और उनकी योग-शक्ति को जो मनुष्य 'तत्त्वतः' (यानी उसकी आत्मा और मूल भाव के साथ) जान लेता है, उसके जीवन की समस्त उलझनें समाप्त हो जाती हैं। पौराणिक कथाओं और उपनिषदों—जैसे छांदोग्य और बृहदारण्यक उपनिषद—में भी इसी प्रकार के ब्रह्म-ज्ञान का प्रतिपादन मिलता है जहाँ संपूर्ण जगत को 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (यह सब कुछ ब्रह्म ही है) के रूप में देखा गया है। महर्षि व्यास ने इस श्लोक के माध्यम से वेदों के उसी गूढ़ रहस्य को अत्यंत सरल और ग्राह्य संस्कृत में प्रवाहित किया है, ताकि सामान्य गृहस्थ से लेकर संन्यासी तक सभी इसका लाभ उठा सकें.

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस सातवें श्लोक का नियमित पाठ, मनन और इसके अर्थ पर ध्यान केंद्रित करना मनुष्य के जीवन में क्रांतिकारी सकारात्मक परिवर्तन लाता है। इसके प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मानसिक शांति और संशय मुक्ति

जीवन में आने वाले अनिश्चितता के दौर और मानसिक द्वंद्वों (संशयों) का नाश होता है। श्लोक के अंत में भगवान स्वयं कहते हैं "नात्र संशयः", जिससे साधक का मन अचल विश्वास से भर जाता है।

2. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

इस श्लोक के नियमित जप से चित्त में सात्विक गुणों का उदय होता है, जिससे व्यक्ति के आसपास एक सकारात्मक ऊर्जा का सुरक्षा कवच बनता है और नकारात्मक विचार दूर होते हैं।

3. कर्मों की शुद्धि और निष्काम भाव

जब यह बोध हो जाता है कि सब कुछ उसी परम शक्ति की विभूति है, तब व्यक्ति अहंत्व और ममत्व (अहम और मेरा-तेरा) से ऊपर उठकर निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करता है।

4. अद्वैत दृष्टि और समभाव की प्राप्ति

साधक सभी प्राणियों, मित्रों और शत्रुओं में एक ही परमात्मा की झलक देखने लगता है, जिससे उसके भीतर करुणा, प्रेम और क्षमा जैसे दैवी गुणों का स्वतः विकास होता है।

5. अविकल्प योग की प्राप्ति

मन की भटकन समाप्त होती है और एकाग्रता इतनी गहरी हो जाती है कि ध्यान स्वतः समाधि की अवस्था की ओर अग्रसर होने लगता है, जिससे ईश्वर के साथ सीधा योग सिद्ध होता है।

6. भय और चिंता से मुक्ति

मृत्यु, भविष्य और असफलता का भय उस व्यक्ति को स्पर्श नहीं कर पाता जो यह जानता है कि इस ब्रह्मांड का हर एक अणु उस परम शक्तिशाली भगवान के नियंत्रण और संरक्षण में है।

7. भगवद्कृपा की प्राप्ति

भगवान के ऐश्वर्य और योग को तत्त्व से जानने वाला भक्त भगवान को अत्यंत प्रिय होता है, और उसे सहज ही भगवान की अहेतुकी कृपा (अनुग्रह) प्राप्त हो जाती है।

8. आध्यात्मिक उत्थान और मुक्ति (मोक्ष)

यह ज्ञान जन्म-मृत्यु के चक्र से छुड़ाने वाला महामंत्र है। इसके मनन से आत्मा अपने मूल स्वरूप (सच्चिदानंद) को पहचानकर अंततः परम गति को प्राप्त होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों—विशेषकर श्रीमद्भगवद्गीता (शंकराचार्य भाष्य, रामानंद टीका और श्रीधर स्वामी कृत भावार्थ दीपिका के संदर्भों सहित)—के गहन अध्ययन के उपरांत तैयार किया गया है। हमारा मुख्य उद्देश्य आधुनिक पीढ़ी और आध्यात्मिक पिपासुओं तक वेदों, पुराणों और उपनिषदों के शाश्वत ज्ञान को अत्यंत सरल, प्रामाणिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ पहुंचाना है।

इस आलेख को तैयार करते समय भाषा की शुद्धता, शास्त्रीय मर्यादा और दार्शनिक गहराई का पूर्ण ध्यान रखा गया है ताकि पाठकों को किसी भी प्रकार की भ्रमित करने वाली जानकारी न मिले। यदि आपके मन में इस विषय से जुड़ा कोई भी प्रश्न या जिज्ञासा है, तो आप नीचे दिए गए अनुभाग (FAQs) की सहायता ले सकते हैं या हमसे संपर्क कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: इस श्लोक में 'विभूति' का अर्थ भगवान की वे महिमामयी अभिव्यक्तियाँ हैं जो इस संसार में ऐश्वर्य, शक्ति, तेज और सुंदरता के रूप में दिखाई देती हैं। वहीं 'योग' का अर्थ भगवान की वह अचिंत्य और अकल्पनीय शक्ति है जिसके द्वारा वे अपनी निराकार और निर्विकार अवस्था में रहते हुए भी इस संपूर्ण चराचर जगत को धारण और संचालित करते हैं। इन दोनों को तत्त्व से जानना ही परम ज्ञान है।

उत्तर: 'अविकल्पेन योगेन' का अर्थ है—ऐसी योग साधना जिसमें कोई विकल्प (द्वैत, संदेह, भेद-बुद्धि या अन्य कामना) न हो। जब साधक के मन में यह पक्का विश्वास हो जाता है कि सब कुछ भगवान का ही स्वरूप है, तब उसके मन में कोई दूसरा विचार या विकल्प नहीं बचता। उसकी भक्ति अखंड और अनन्य हो जाती है, जिसे ही अविकल्प योग कहा गया है।

उत्तर: इस श्लोक का स्मरण करने से व्यक्ति के भीतर की हीनभावना, तनाव, चिंता और स्वार्थ की भावना समाप्त होने लगती है। जब इंसान यह देखने लगता है कि हर श्रेष्ठ वस्तु और हर जीव में ईश्वर की ही ऊर्जा काम कर रही है, तो उसका दूसरों के प्रति व्यवहार प्रेमपूर्ण, सहनशील और न्यायसंगत हो जाता है, जिससे उसका पारिवारिक और सामाजिक जीवन अत्यंत सुखद और शांतिपूर्ण बन जाता है।

उत्तर: हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता के किसी भी श्लोक का पाठ करने के लिए किसी विशेष जाति, योनि या संन्यास की आवश्यकता नहीं है। यह ग्रंथ संपूर्ण मानवता के लिए है। कोई भी गृहस्थ, विद्यार्थी, वृद्ध या युवा व्यक्ति पूरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ इसका पाठ और मनन कर सकता है।

उत्तर: 'नात्र संशयः' (इसमें कोई संशय नहीं है) कहकर भगवान श्रीकृष्ण साधक के मन में अटूट विश्वास और दृढ़ता भरते हैं। मनुष्य का मन स्वाभाविक रूप से शंकालु होता है—उन्हें यह विश्वास दिलाने के लिए कि यह मार्ग शत-प्रतिशत अचूक और फलदायी है, भगवान ने स्वयं अपनी गारंटी दी है कि इस ज्ञान को प्राप्त करने वाला व्यक्ति कभी विफल नहीं होता।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति मेरी इस विभूति (दिव्य ऐश्वर्य) और योगशक्ति (अद्भुत सामर्थ्य) को यथार्थ रूप से जान लेता है, वह अविकल्प (अचल) योग से युक्त हो जाता है। इसमें कोई संशय नहीं है।

Lord Krishna declares that true knowledge of His divine opulences and mystic power leads to unshakable union with Him. Such a person becomes firmly established in devotion, free from all doubts and uncertainties.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 7 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 7/42 17% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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पंचांग
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