श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 5

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 39 मिनट का पठन 145 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः | भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः || ५||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
अहिंसा
अहिंसा
समता
समता
तुष्टि
संतोष
तप
तप
दानम्
दान
यश
कीर्ति
अयश
अपकीर्ति
भवन्ति
होते हैं
भावा
भाव
भूतानाम्
प्राणियों के
मत्त
मुझसे
एव
ही
पृथग्विधा
अनेक प्रकार के।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, कीर्ति और अपकीर्ति — इस प्रकार प्राणियों के ये सब भिन्न-भिन्न प्रकार के भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

ब्रह्मांडीय द्वैत और समस्त भावों के परम उद्गम का रहस्य

सनातन संस्कृति और वेदान्त दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता का दसवां अध्याय 'विभूतियोग' के नाम से सुशोभित है। यह अध्याय साधक को उस परम चेतना के साथ जोड़ता है, जो इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड के कण-कण में, प्रत्येक जीव की धड़कन में और मानवीय अनुभवों के हर एक आयाम में व्याप्त है। अर्जुन के मन में भगवान श्रीकृष्ण की ऐश्वर्यमयी विभूतियों को जानने की तीव्र जिज्ञासा जागृत होती है, जिसके उत्तर में जगद्गुरु श्रीकृष्ण अपनी अनन्त और असीम शक्तियों का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं। प्रस्तुत पाँचवाँ श्लोक इस दिव्य श्रृंखला की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी है, जो न केवल सकारात्मक और दैवीय गुणों को बल्कि मानव जीवन में प्रकट होने वाले नकारात्मक एवं विपरीत भावों को भी परमात्मा से ही उद्भूत बताती है।

इस श्लोक का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व इस बात में निहित है कि यह वेदान्त के अद्वैत सिद्धांत को व्यावहारिक जीवन में उतारता है। सामान्य मनुष्य अक्सर यह मान बैठता है कि अच्छे गुण (जैसे करुणा, संतोष, दान) ईश्वर से आते हैं, किंतु अहंकार, अपमान, यश या अपयश जैसी परिस्थितियाँ केवल उसके अपने कर्मों या संयोगवश होती हैं। परंतु भगवान श्रीकृष्ण इस भ्रम को दूर करते हुए यह उद्घाटित करते हैं कि इस सृष्टि में जो कुछ भी घटित होता है—चाहे वह मानसिक स्थिति हो, सामाजिक प्रतिष्ठा हो या आंतरिक संतोष हो—सब कुछ उसी एक परम सत्ता की इच्छा और उसके ही विभिन्नManifestations (विभूतियों) का परिणाम है। यह श्लोक साधक को जीवन के द्वैत (सुख-दुःख, यश-अपयश, मान-अपमान) से ऊपर उठकर समभाव की स्थिति प्राप्त करने की प्रेरणा देता है। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि हर भाव, हर परिस्थिति और हर गुण का मूल स्रोत वही परमब्रह्म है, तब उसके मन से राग और द्वेष का स्वतः ही शमन होने लगता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

गीता के इस पवित्र श्लोक का उच्चारण शुद्ध उच्चारण (उच्चारण स्थान) के साथ करना साधक के मानसिक संतापों को दूर करने वाला माना गया है। यहाँ इसका प्रामाणिक संस्कृत पाठ और उसका पदच्छेद दिया जा रहा है:

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ ५ ॥

पदच्छेद (शब्दों को अलग-अलग करना):

अहिंसा / समता / तुष्टिः / तपः / दानम् / यशः / अयशः / भवन्ति / भावाः / भूतानाम् / मत् / एव / पृथग्विधाः

पाठ करने की सरल विधि एवं अनुष्ठानिक नियम:
  • १. पवित्रता: प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ, हल्के पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें।
  • २. आसन: कुशा या ऊन के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके सुखासन में बैठें।
  • ३. मानसिक संकल्प: भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप का ध्यान करते हुए अपने मन को द्वैत भाव से मुक्त करने का मानसिक संकल्प लें।
  • ४. आवृत्ति: इस श्लोक का कम से कम 108 बार (एक माला) जप करें या विभूतियोग का नियमित पाठ करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

वैदिक संस्कृत व्याकरण और दार्शनिक दृष्टिकोण से इस श्लोक के प्रत्येक शब्द का गहरा अर्थ है। आइए, इसे सारणीबद्ध रूप में समझें:

मुझसे ही (केवल मेरे द्वारा ही)।
पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अहिंसा मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट न पहुँचाना। यह सर्वोच्च मानवीय मूल्य है, जो सभी भूतों में परमात्मा के दर्शन का प्रत्यक्ष परिणाम है।
समता सुख-दुःख, मान-अपमान और मित्रों-शत्रुओं में समान भाव रखना। यह चित्त की वह स्थिर अवस्था है जहाँ साधक द्वैत के बंधनों से मुक्त हो जाता है।
तुष्टिः परम संतोष, जो बिना किसी बाहरी भौतिक वस्तु के भीतर से प्रकट होता है। ईश्वर की रजा में राजी रहना और अनावश्यक इच्छाओं का त्याग ही सच्ची तुष्टि है।
तपः धर्म की पालना करते हुए शारीरिक, मानसिक और वाचिक सहनशीलता। इंद्रियों का संयम और अपने कर्तव्यों का निष्काम भाव से निर्वाह करना ही वास्तविक तपस्या है।
दानम् अपनी कमाई या योग्यताओं का बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के वितरण। संपत्ति और ऊर्जा को ब्रह्मांड की सेवा में समर्पित करने की उदारता।
यशः कीर्ति, ख्याति और समाज में उत्तम कर्मों के कारण मिलने वाला सम्मान। सत्कर्मों के माध्यम से परमात्मा के ऐश्वर्य का लोक-कल्याणकारी विस्तार।
अयशः अपकीर्ति, बदनामी या समाज में नकारात्मक ख्याति। यह भी भगवान की ही एक शक्ति है, जो अहंकार को तोड़ने और पाठ सिखाने के लिए प्रकट होती है।
भवन्ति उत्पन्न होते हैं, प्रकट होते हैं। यह निरंतर गतिशील सृष्टि चक्र और ऊर्जा के प्रवाह को दर्शाता है।
भावाः मानसिक वृत्तियाँ, स्वभाव, प्रवृत्तियाँ और स्थितियाँ। मानव मन के सभी प्रकार के विचार और संवेग।
भूतानाम् समस्त जीवों के, प्राणियों के। चराचर जगत के सभी जीव और उनकी चेतना के स्तर।
मत्तः एव यह स्पष्ट उद्घोषणा कि भगवान ही समस्त प्रपंच और भावों के मूल निर्माता हैं।
पृथग्विधाः भांति-भांति के, अनेक प्रकार के, विभिन्न रूपों में। सृष्टि की विविधता जो उस एक अद्वैत परमात्मा की ही अनन्त अभिव्यक्तियाँ हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस दसवें अध्याय की पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के मैदान में रची गई थी, जहाँ महाभारत युद्ध के प्रारंभिक क्षणों में अर्जुन अपने महान कर्तव्यों के प्रति मोहग्रस्त और संशयित हो गए थे। कौरवों और पांडवों के बीच का यह महासंग्राम केवल दो पक्षों का युद्ध नहीं था, बल्कि यह धर्म और अधर्म, ज्ञान और अज्ञान, तथा दैवीय और आसुरी प्रवृत्तियों का एक विराट द्वंद्व था। ऐसे संकटपूर्ण समय में, जब अर्जुन के शस्त्र नीचे गिरने लगे थे और उनका अंतःकरण विषाद से भर गया था, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें योगेश्वर के रूप में उपदेश देना आरंभ किया।

अध्याय १० में पहुँचते-पहुंचते अर्जुन का चित्त काफी हद तक शांत और ग्रहणशील हो चुका था। उन्होंने श्रीकृष्ण से प्रार्थना की कि वे अपनी उन दिव्य विभूतियों का विस्तार से वर्णन करें, जिनके माध्यम से वे इस समस्त ब्रह्मांड में लगातार चिंतन और ध्यान करने योग्य हैं। अर्जुन की इस जिज्ञासा के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट करना शुरू किया कि संसार की हर महान वस्तु, हर उत्कृष्ट गुण और यहाँ तक कि इसके विपरीत दिखने वाले दुर्गुण या अपयश भी स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रखते।

महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली गीता के इस प्रसंग में यह दार्शनिक सत्य स्थापित किया गया है कि संसार में कुछ भी परमात्मा की मर्जी के बिना नहीं होता। जब भगवान यह कहते हैं कि "यश और अयश दोनों मुझ से ही हैं", तो इसके पीछे एक बहुत ही गहरा पौराणिक और आध्यात्मिक रहस्य छिपा है। पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय अमृत के साथ-साथ विष (हलाहल) भी निकला था। भगवान शिव ने उस विष को ग्रहण किया और नारायण ने मोहिनी रूप धारण कर अमृत बाँटा। इसी प्रकार, सृष्टि के संचालन में सकारात्मक ऊर्जा (देवता) और नकारात्मक ऊर्जा (असुर/विपरीत भाव) दोनों की आवश्यकता होती है। नकारात्मकता या अयश मनुष्य के अहंकार को नष्ट करने और उसे पुनः आत्ममंथन की ओर मोड़ने का कार्य करती है। इस प्रकार, शास्त्र यह सिखाते हैं कि साधक को न केवल सफलता और यश में प्रसन्न होना चाहिए, बल्कि संकट और अपयश के समय भी इसे ईश्वर की लीला मानकर धैर्य रखना चाहिए।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

विभूतियोग के इस विशिष्ट श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ का गहराई से स्मरण करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं:

१. मानसिक शांति और स्थिरता

मन की चंचलता और अनावश्यक चिंताओं का शमन होता है। साधक समझ जाता है कि जीवन की हर परिस्थिति एक उच्चतर विधान के अंतर्गत चल रही है, जिससे आंतरिक शांति मिलती है।

२. अहंकार का शमन (Ego Dissolution)

जब व्यक्ति यह स्वीकार कर लेता है कि उसके अच्छे गुण (जैसे दान, तप, अहिंसा) और यहाँ तक कि उसकी उपलब्धियां भी उसी परमात्मा की कृपा हैं, तो उसका अहंकार स्वतः गल जाता है।

३. द्वैत भाव से मुक्ति

यश और अपयश, सुख और दुःख को समान भाव से स्वीकार करने की अद्भुत मानसिक शक्ति प्राप्त होती है, जो भगवद्गीता का मूल संदेश है।

४. सकारात्मक आभा (Aura) का विकास

अहिंसा, समता और तुष्टि जैसे दैवीय गुणों का श्लोक के माध्यम से मनन करने से साधक के चारों ओर एक उच्च कोटि की आध्यात्मिक और सात्विक ऊर्जा का निर्माण होता है।

५. कर्म शुद्धि (Karmic Purification)

यह श्लोक हमें अनैतिक और हिंसक प्रवृत्तियों से दूर रहने की प्रेरणा देता है, जिससे धीरे-धीरे संचित कर्मों का शुद्धिकरण होने लगता है।

६. भगवद्कृपा की प्राप्ति

परमात्मा की विभूतियों का प्रतिदिन स्मरण करने से भक्त का चित्त निरंतर भगवान के चरणों में संलग्न रहता है, जिससे अतुनीय भक्ति रस की प्राप्ति होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस प्रतिष्ठित अनुभाग के अंतर्गत प्रस्तुत श्लोक विश्लेषण को सनातन धर्म के प्राचीन वेदान्त ग्रंथों, महर्षि वेद व्यास रचित श्रीमद्भगवद्गीता के मूल श्लोकों, और महान आचार्यों (जैसे आदि शंकराचार्य और स्वामी रामानुज) के टीका-ग्रंथों के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों तक जो भी आध्यात्मिक और धार्मिक सामग्री पहुँचे, वह पूरी तरह से प्रामाणिक, शास्त्रीय मर्यादाओं के अनुकूल और सरल हिंदी भाषा में हो, ताकि आधुनिक युग के पाठक भी वेदों और उपनिषदों के गूढ़ रहस्यों को सहजता से आत्मसात कर सकें।

संदर्भ ग्रंथ: श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय १०, विभूतियोग, श्लोक ५), महाभारत (भीष्म पर्व), और सनातन संस्कृति के अन्य मूल प्रामाणिक स्रोत।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: वेदान्त दर्शन के अनुसार, इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी है, वह सब उस परम ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति है। यश की तरह 'अयश' या अपकीर्ति भी मानव जीवन का एक ऐसा अनुभव है जो अक्सर व्यक्ति के अहंकार को तोड़ने, उसे आत्ममंथन करने और अपनी गलतियों से सीखकर पुनः सही मार्ग पर लौटने के लिए प्रेरित करता है। इसलिए, समग्र सृष्टि के संतुलन के लिए यह भी उसी सर्वोच्च सत्ता के नियंत्रण में है।

उत्तर: इस श्लोक का व्यावहारिक उपयोग यह है कि यह हमें जीवन की हर परिस्थिति—चाहे वह मान हो या अपमान, सफलता हो या विफलता—में समभाव (समानता) रखना सिखाता है। जब हम यह समझ जाते हैं कि सभी स्थितियाँ और भाव एक ही divine source से आ रहे हैं, तो हम अत्यधिक हर्ष या शोक के चक्र से बाहर निकल आते हैं।

उत्तर: साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए अहिंसा (मन-कर्म-वचन से अहानिकर होना), समता (मन की स्थिरता) और तुष्टि (परम संतोष) नींव के पत्थरों के समान हैं। इनके बिना चित्त एकाग्र नहीं हो सकता और परमात्मा के वास्तविक स्वरूप का अनुभव करना कठिन हो जाता है।

उत्तर: हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक मानवता के कल्याण के लिए है। इसे कोई भी व्यक्ति जाति, उम्र या लिंग के बंधन से मुक्त होकर श्रद्धापूर्वक पढ़ सकता है और इसके अर्थ पर मनन कर सकता है।

उत्तर: विभूतियोग का अध्ययन करने से साधक की दृष्टि में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आता है। वह हर वस्तु, व्यक्ति और घटना में भगवान की उपस्थिति देखने लगता है, जिससे उसका संपूर्ण जीवन एक सतत ध्यान (Meditation) और भक्तिमय यात्रा बन जाता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, कीर्ति और अपकीर्ति — ये सभी भाव प्राणियों में उन्हीं से प्रकट होते हैं। इस प्रकार वे समस्त द्वंद्वों के परम स्रोत हैं।

Lord Krishna explains that all qualities, whether considered virtuous or not, originate from Him alone. He is the ultimate source of the entire spectrum of human experiences and attributes.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 5 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 5/42 12% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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