पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदश्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, कीर्ति और अपकीर्ति — इस प्रकार प्राणियों के ये सब भिन्न-भिन्न प्रकार के भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
ब्रह्मांडीय द्वैत और समस्त भावों के परम उद्गम का रहस्य
सनातन संस्कृति और वेदान्त दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता का दसवां अध्याय 'विभूतियोग' के नाम से सुशोभित है। यह अध्याय साधक को उस परम चेतना के साथ जोड़ता है, जो इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड के कण-कण में, प्रत्येक जीव की धड़कन में और मानवीय अनुभवों के हर एक आयाम में व्याप्त है। अर्जुन के मन में भगवान श्रीकृष्ण की ऐश्वर्यमयी विभूतियों को जानने की तीव्र जिज्ञासा जागृत होती है, जिसके उत्तर में जगद्गुरु श्रीकृष्ण अपनी अनन्त और असीम शक्तियों का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं। प्रस्तुत पाँचवाँ श्लोक इस दिव्य श्रृंखला की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी है, जो न केवल सकारात्मक और दैवीय गुणों को बल्कि मानव जीवन में प्रकट होने वाले नकारात्मक एवं विपरीत भावों को भी परमात्मा से ही उद्भूत बताती है।
इस श्लोक का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व इस बात में निहित है कि यह वेदान्त के अद्वैत सिद्धांत को व्यावहारिक जीवन में उतारता है। सामान्य मनुष्य अक्सर यह मान बैठता है कि अच्छे गुण (जैसे करुणा, संतोष, दान) ईश्वर से आते हैं, किंतु अहंकार, अपमान, यश या अपयश जैसी परिस्थितियाँ केवल उसके अपने कर्मों या संयोगवश होती हैं। परंतु भगवान श्रीकृष्ण इस भ्रम को दूर करते हुए यह उद्घाटित करते हैं कि इस सृष्टि में जो कुछ भी घटित होता है—चाहे वह मानसिक स्थिति हो, सामाजिक प्रतिष्ठा हो या आंतरिक संतोष हो—सब कुछ उसी एक परम सत्ता की इच्छा और उसके ही विभिन्नManifestations (विभूतियों) का परिणाम है। यह श्लोक साधक को जीवन के द्वैत (सुख-दुःख, यश-अपयश, मान-अपमान) से ऊपर उठकर समभाव की स्थिति प्राप्त करने की प्रेरणा देता है। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि हर भाव, हर परिस्थिति और हर गुण का मूल स्रोत वही परमब्रह्म है, तब उसके मन से राग और द्वेष का स्वतः ही शमन होने लगता है।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
गीता के इस पवित्र श्लोक का उच्चारण शुद्ध उच्चारण (उच्चारण स्थान) के साथ करना साधक के मानसिक संतापों को दूर करने वाला माना गया है। यहाँ इसका प्रामाणिक संस्कृत पाठ और उसका पदच्छेद दिया जा रहा है:
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ ५ ॥
पदच्छेद (शब्दों को अलग-अलग करना):
अहिंसा / समता / तुष्टिः / तपः / दानम् / यशः / अयशः / भवन्ति / भावाः / भूतानाम् / मत् / एव / पृथग्विधाः
पाठ करने की सरल विधि एवं अनुष्ठानिक नियम:
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)
वैदिक संस्कृत व्याकरण और दार्शनिक दृष्टिकोण से इस श्लोक के प्रत्येक शब्द का गहरा अर्थ है। आइए, इसे सारणीबद्ध रूप में समझें:
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)
श्रीमद्भगवद्गीता के इस दसवें अध्याय की पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के मैदान में रची गई थी, जहाँ महाभारत युद्ध के प्रारंभिक क्षणों में अर्जुन अपने महान कर्तव्यों के प्रति मोहग्रस्त और संशयित हो गए थे। कौरवों और पांडवों के बीच का यह महासंग्राम केवल दो पक्षों का युद्ध नहीं था, बल्कि यह धर्म और अधर्म, ज्ञान और अज्ञान, तथा दैवीय और आसुरी प्रवृत्तियों का एक विराट द्वंद्व था। ऐसे संकटपूर्ण समय में, जब अर्जुन के शस्त्र नीचे गिरने लगे थे और उनका अंतःकरण विषाद से भर गया था, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें योगेश्वर के रूप में उपदेश देना आरंभ किया।
अध्याय १० में पहुँचते-पहुंचते अर्जुन का चित्त काफी हद तक शांत और ग्रहणशील हो चुका था। उन्होंने श्रीकृष्ण से प्रार्थना की कि वे अपनी उन दिव्य विभूतियों का विस्तार से वर्णन करें, जिनके माध्यम से वे इस समस्त ब्रह्मांड में लगातार चिंतन और ध्यान करने योग्य हैं। अर्जुन की इस जिज्ञासा के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट करना शुरू किया कि संसार की हर महान वस्तु, हर उत्कृष्ट गुण और यहाँ तक कि इसके विपरीत दिखने वाले दुर्गुण या अपयश भी स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रखते।
महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली गीता के इस प्रसंग में यह दार्शनिक सत्य स्थापित किया गया है कि संसार में कुछ भी परमात्मा की मर्जी के बिना नहीं होता। जब भगवान यह कहते हैं कि "यश और अयश दोनों मुझ से ही हैं", तो इसके पीछे एक बहुत ही गहरा पौराणिक और आध्यात्मिक रहस्य छिपा है। पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय अमृत के साथ-साथ विष (हलाहल) भी निकला था। भगवान शिव ने उस विष को ग्रहण किया और नारायण ने मोहिनी रूप धारण कर अमृत बाँटा। इसी प्रकार, सृष्टि के संचालन में सकारात्मक ऊर्जा (देवता) और नकारात्मक ऊर्जा (असुर/विपरीत भाव) दोनों की आवश्यकता होती है। नकारात्मकता या अयश मनुष्य के अहंकार को नष्ट करने और उसे पुनः आत्ममंथन की ओर मोड़ने का कार्य करती है। इस प्रकार, शास्त्र यह सिखाते हैं कि साधक को न केवल सफलता और यश में प्रसन्न होना चाहिए, बल्कि संकट और अपयश के समय भी इसे ईश्वर की लीला मानकर धैर्य रखना चाहिए।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)
विभूतियोग के इस विशिष्ट श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ का गहराई से स्मरण करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं:
१. मानसिक शांति और स्थिरता
मन की चंचलता और अनावश्यक चिंताओं का शमन होता है। साधक समझ जाता है कि जीवन की हर परिस्थिति एक उच्चतर विधान के अंतर्गत चल रही है, जिससे आंतरिक शांति मिलती है।
२. अहंकार का शमन (Ego Dissolution)
जब व्यक्ति यह स्वीकार कर लेता है कि उसके अच्छे गुण (जैसे दान, तप, अहिंसा) और यहाँ तक कि उसकी उपलब्धियां भी उसी परमात्मा की कृपा हैं, तो उसका अहंकार स्वतः गल जाता है।
३. द्वैत भाव से मुक्ति
यश और अपयश, सुख और दुःख को समान भाव से स्वीकार करने की अद्भुत मानसिक शक्ति प्राप्त होती है, जो भगवद्गीता का मूल संदेश है।
४. सकारात्मक आभा (Aura) का विकास
अहिंसा, समता और तुष्टि जैसे दैवीय गुणों का श्लोक के माध्यम से मनन करने से साधक के चारों ओर एक उच्च कोटि की आध्यात्मिक और सात्विक ऊर्जा का निर्माण होता है।
५. कर्म शुद्धि (Karmic Purification)
यह श्लोक हमें अनैतिक और हिंसक प्रवृत्तियों से दूर रहने की प्रेरणा देता है, जिससे धीरे-धीरे संचित कर्मों का शुद्धिकरण होने लगता है।
६. भगवद्कृपा की प्राप्ति
परमात्मा की विभूतियों का प्रतिदिन स्मरण करने से भक्त का चित्त निरंतर भगवान के चरणों में संलग्न रहता है, जिससे अतुनीय भक्ति रस की प्राप्ति होती है।
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस प्रतिष्ठित अनुभाग के अंतर्गत प्रस्तुत श्लोक विश्लेषण को सनातन धर्म के प्राचीन वेदान्त ग्रंथों, महर्षि वेद व्यास रचित श्रीमद्भगवद्गीता के मूल श्लोकों, और महान आचार्यों (जैसे आदि शंकराचार्य और स्वामी रामानुज) के टीका-ग्रंथों के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों तक जो भी आध्यात्मिक और धार्मिक सामग्री पहुँचे, वह पूरी तरह से प्रामाणिक, शास्त्रीय मर्यादाओं के अनुकूल और सरल हिंदी भाषा में हो, ताकि आधुनिक युग के पाठक भी वेदों और उपनिषदों के गूढ़ रहस्यों को सहजता से आत्मसात कर सकें।
संदर्भ ग्रंथ: श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय १०, विभूतियोग, श्लोक ५), महाभारत (भीष्म पर्व), और सनातन संस्कृति के अन्य मूल प्रामाणिक स्रोत।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, कीर्ति और अपकीर्ति — ये सभी भाव प्राणियों में उन्हीं से प्रकट होते हैं। इस प्रकार वे समस्त द्वंद्वों के परम स्रोत हैं।
Lord Krishna explains that all qualities, whether considered virtuous or not, originate from Him alone. He is the ultimate source of the entire spectrum of human experiences and attributes.