श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 4

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 39 मिनट का पठन 134 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः | सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च || ४||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
बुद्धि
बुद्धि
ज्ञानम्
ज्ञान
असम्मोहः
मोह का अभाव
क्षमा
क्षमा
सत्यम्
सत्य
दमः
दमन (इंद्रिय दमन)
शमः
शम (मन का निग्रह)
सुखम्
सुख
दुःखम्
दुःख
भवः
उत्पत्ति
अभाव
अभाव (विनाश)
भयम्
भय
च
और
अभयम्
अभय
एव
ही
च
तथा।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह (मोह का अभाव), क्षमा, सत्य, इंद्रिय दमन, मनःशमन, सुख, दुःख, उत्पत्ति, विनाश, भय और अभय —

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि साक्षात् भगवान श्री कृष्ण के मुख-कमल से निःसृत अमृत वाणी माना गया है। गीता का प्रत्येक श्लोक मानव जीवन के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ है, जो भौतिकता की अंधी दौड़ में फंसे जीव को आध्यात्मानुभूति और परम शांति की ओर ले जाता है। विशेष रूप से, श्रीमद्भगवद्गीता का दशम अध्याय 'विभूतियोग' के नाम से सुविख्यात है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी अनंत विभूतियों और ऐश्वर्य का विस्तार से परिचय कराते हैं। यह अध्याय साधक के मन में इस अकाट्य सत्य को स्थापित करता है कि इस चराचर जगत में जो कुछ भी श्रेष्ठ, शक्तिशाली, सुंदर, और भावपूर्ण है, वह सब भगवान की ही विभूति का एक अंश मात्र है।

जब हम इस महान श्लोक—"बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः | सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ||"—का गहनता से अध्ययन और मनन करते हैं, तो हमें ज्ञात होता है कि मनुष्य के भीतर प्रकट होने वाले समस्त मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक और शारीरिक गुण-दोष अन्यत्र कहीं से नहीं आते, अपितु वे सब परमपिता परमात्मा की ही संकल्प शक्ति और ऊर्जा के विभिन्न आयाम हैं। लोक-कल्याण की भावना से ओत-प्रोत 'Bhaktilok.in' के इस पावन मंच पर हम इसी दिव्य श्लोक के शाब्दिक सौंदर्य, व्याकरणिक गहराई, दार्शनिक पृष्ठभूमि और दैनिक जीवन में इसके व्यावहारिक उपयोग का अत्यंत सूक्ष्म और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं। यह मार्गदर्शिका आपके जीवन में वैचारिक स्पष्टता, मानसिक संतुलन और भक्ति भाव को जागृत करने में सहायक सिद्ध होगी।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 10, श्लोक 4

बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः|
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ||४||

पदच्छेद: बुद्धिः, ज्ञानम्, असम्मोहः, क्षमा, सत्यम्, दमः, शमः, सुखम्, दुःखम्, भवः, अभावः, भयम्, च, अभयम्, एव, च।

पाठ करने की विधि एवं नियम: इस श्लोक का पाठ करने से पूर्व साधक को चाहिए कि वह प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नानादि से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण करे। तत्पश्चात अपने इष्टदेव भगवान श्री कृष्ण या अपने गुरु का ध्यान करते हुए इस श्लोक का कम से कम 11, 21 या 108 बार मानसिक अथवा वाचिक जप करें। इसका नियमित पाठ बुद्धि को तीव्र करता है, संशयों का शमन करता है और चित्त में अद्भुत स्थिरता प्रदान करता है। जप के अंत में भगवान को प्रणाम कर इस संपूर्ण चराचर जगत में उनकी ही ऊर्जा का दर्शन करने का भाव अपने हृदय में दृढ़ करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने मानवीय चेतना के पंद्रह विभिन्न भावों और अवस्थाओं का उल्लेख किया है। आइए, तालिका के माध्यम से प्रत्येक पद के सरल अर्थ और उनके गहन दार्शनिक मर्म को समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
बुद्धिः (Buddhiḥ) निर्णय शक्ति, विवेक, समझ यह वह अंतःकरण की वृत्ति है जो उचित और अनुचित, सत्य और असत्य के बीच भेद करती है। यह भगवती महाशक्ति का साक्षात् प्रसाद है।
ज्ञानम् (Jnanam) तथ्यों की जानकारी, आत्मानुभूति मात्र किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि स्वयं को देह से परे आत्मा के रूप में जानने और परमात्मा के साथ अपनी एकता का अनुभव करने की दिव्य दृष्टि।
असम्मोहः (Asammohaḥ) मोह का अभाव, भ्रममुक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी कर्तव्य-विमूढ़ न होना, मानसिक स्पष्टता और मोह-माया के जाल से पूरी तरह मुक्त रहने की पवित्र स्थिति।
क्षमा (Kshama) सहनशीलता, क्षमाशीलता सामर्थ्य होने पर भी दूसरों के अपराधों को माफ कर देना। यह दुर्बलता नहीं, बल्कि एक उच्च कोटि की आध्यात्मिक शक्ति और विशाल हृदय का प्रतीक है।
सत्यम् (Satyam) यथार्थ भाषण, सच्चाई मन, वचन और कर्म से त्रिकाल में सत्य का आचरण करना। जो जैसा है, उसे वैसा ही देखना और बोलना, जो ब्रह्म का ही एक स्वरूप है।
दमः (Damaḥ) बाह्य इंद्रियों का संयम नेत्र, कर्ण, त्वचा, जिह्वा और नासिका आदि पांचों बाह्य ज्ञानेंद्रियों को विषयों की ओर भटकने से रोकना और उन्हें नियंत्रण में रखना।
शमः (Shamaḥ) अंतःकरण या मन का शमन मन और बुद्धि की वृत्तियों को शांत रखना। आंतरिक उद्वेगों, इच्छाओं और चिंताओं को त्यागकर चित्त को परम शांति की स्थिति में स्थित करना।
सुखम् (Sukham) आनंद, प्रसन्नता की अनुभूति पुण्य कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त होने वाला मानसिक और शारीरिक संतोष, जो मूलतः आनंदस्वरूप परमात्मा की ऊर्जा का ही एक प्रतिबिम्ब है।
दुःखम् (Dukham) कष्ट, पीड़ा, संताप कर्मों के फलवश या प्रकृति के नियमों के अधीन मिलने वाली प्रतिकूलता। यह आत्मा को जगाने और उसे संसार से विरक्त करने का माध्यम बनती है।
भवः (Bhavaḥ) उत्पत्ति, जन्म, अस्तित्व किसी भी वस्तु, विचार या जीव का प्रकट होना या अस्तित्व में आना। यह सृष्टि की सर्जन शक्ति (ब्रह्मा जी की ऊर्जा) का प्रतीक है।
अभावः (Abhavaḥ) विनाश, मृत्यु, प्रलय उत्पन्न हुई वस्तु का समाप्त होना या दृश्य जगत से छिप जाना। यह भगवान की संहारक शक्ति (भगवान शिव की ऊर्जा) का परिचायक है।
भयम् (Bhayam) भय, डर, आशंका अज्ञानता या अज्ञात भविष्य के प्रति उत्पन्न होने वाली आशंका। यह भी जीव को सचेत करने और आत्मरक्षा के लिए परमात्मा द्वारा रची गई व्यवस्था है।
अभयम् (Abhayam) निर्भयता, अहीति भगवान की शरणागति से प्राप्त होने वाली परम निर्भयता, जहां मृत्यु का भी भय समाप्त हो जाता है। यह साधक का सर्वोच्च आध्यात्मिक आभूषण है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के पावन रणक्षेत्र से जुड़ी हुई है, जहां कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। महाभारत के युद्ध के ठीक आरंभ में, जब वीर अर्जुन अपने स्वजनों को देखकर अत्यंत विषाद और मोह से घिर गए और उन्होंने अपने गांधिव धनुष को नीचे रख दिया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन और कर्तव्य का वास्तविक पाठ पढ़ाने के लिए गीता का उपदेश दिया।

आरंभिक अध्यायों में आत्मा की अमरता, कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग का विस्तृत विवेचन करने के बाद, अर्जुन के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि हे केशव! इस संपूर्ण चराचर जगत में आपकी उपस्थिति किस-किस रूप में है? मैं आपको किन-किन रूपों में और कहां-कहां स्मरण करूँ? अर्जुन के इसी प्रश्न से प्रेरित होकर भगवान श्री कृष्ण ने दशम अध्याय 'विभूतियोग' का आरंभ किया।

महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली श्रीमद्भगवद्गीता का यह चौथा श्लोक विशेष महत्व रखता है। इसमें भगवान ने यह स्पष्ट किया कि मनुष्यों में पाई जाने वाली प्रवृत्तियां—चाहे वे हमें सकारात्मक (जैसे बुद्धि, ज्ञान, सत्य, क्षमा) प्रतीत हों या नकारात्मक/प्रतिकूल (जैसे दुःख, भय, अभाव)—ये सभी वास्तव में अलग-अलग स्रोतों से नहीं आतीं। इन सबका उद्गम स्थल एकमात्र परम ब्रह्म परमात्मा ही है। वैदिक ऋषियों और पुराणों के अनुसार, द्वंद्वों से भरी यह सृष्टि भगवान की माया का ही खेल है, और इन सभी भावों को समझकर इनसे ऊपर उठना ही मोक्ष का मार्ग है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस महान श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ को जीवन में उतारने से साधक को अनेकों अलौकिक और व्यावहारिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

इस श्लोक में वर्णित 'शम' और 'दम' के भावों का चिंतन करने से चंचल मन शांत होता है और जीवन की उथल-पुथल के बीच भी आंतरिक स्थिरता बनी रहती है।

2. बौद्धिक तीक्ष्णता और विवेक

'बुद्धि' और 'ज्ञान' शब्दों के निरंतर स्मरण से साधक की निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है और वह जीवन के जटिल निर्णयों में सही मार्ग चुन पाता है।

3. मोह और भ्रम से मुक्ति

'असम्मोहः' की स्थिति प्राप्त होने से मनुष्य सांसारिक प्रलोभनों, झूठे बंधनों और मानसिक भ्रमों के जाल में नहीं फंसता, जिससे दुखों का स्वतः शमन हो जाता है।

4. भय का नाश और निर्भयता

जब साधक यह समझ जाता है कि भय और अभय दोनों भगवान की ही व्यवस्था का अंग हैं और वह भक्त की रक्षा करते हैं, तो उसके भीतर से मृत्यु और अनिष्ट का भय समाप्त हो जाता है।

5. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

इस श्लोक के कंपन (Vibrations) से शरीर और मन के चारों ओर एक दिव्य सकारात्मक ऊर्जा (Aura) का निर्माण होता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखती है।

6. क्षमाशीलता और उच्च मानवीय मूल्य

'क्षमा' और 'सत्य' के गुणों को अंगीकार करने से समाज में आदर बढ़ता है और व्यक्ति के अंतःकरण का अत्यंत तीव्र गति से आध्यात्मिक शुद्धिकरण होता है।

7. सुख और दुःख में समता

सुख और दुःख दोनों को भगवान की ही लीला मानकर स्वीकार करने से साधक हर्ष और विषाद दोनों ही परिस्थितियों में समान भाव (समता योग) में स्थित रहता है।

8. भगवत्कृपा की प्राप्ति

जब मनुष्य समस्त गुणों और अवस्थाओं में भगवान का दर्शन करने लगता है, तो उसे भगवान श्री कृष्ण की अहैतुकी कृपा और अनन्य भक्ति स्वतः प्राप्त हो जाती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, श्रीमद्भगवद्गीता (वेद व्यास कृत महाभारत), और पारंपरिक संस्कृत आचार्यों के भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज और स्वामी गीतानंद जी महाराज के दृष्टिकोण) के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों, पुराणों और उपनिषदों के शाश्वत ज्ञान को अत्यंत सरल, प्रामाणिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ पहुंचाना है। इस सामग्री को तैयार करते समय भाषा की शुद्धता, दार्शनिक गहराई और प्रामाणिक तथ्यों का विशेष ध्यान रखा गया है, ताकि आधुनिक पीढ़ी अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जुड़ सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

इस श्लोक का मुख्य सार यह है कि मनुष्य जीवन के सभी गुण और अवस्थाएं—चाहे वे बुद्धि, ज्ञान, सत्य, क्षमा जैसी सकारात्मक प्रवृत्तियां हों, अथवा सुख, दुःख, जन्म, मृत्यु और भय जैसी प्रतिकूल या सामान्य अवस्थाएं हों—इन सबका मूल स्रोत एकमात्र भगवान श्री कृष्ण ही हैं। यह श्लोक बताता है कि इस सृष्टि में जो कुछ भी घटित होता है, वह सब परमेश्वर की ही ऊर्जा का विस्तार है।

वेदांत दर्शन और गीता के अनुसार, 'दम' का अर्थ बाह्य इंद्रियों (जैसे आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा) को संयमित करना और उन्हें गलत विषयों से रोकना है। वहीं, 'शम' का अर्थ अंतःकरण यानी मन और बुद्धि की वृत्तियों को शांत रखना तथा आंतरिक इच्छाओं व उद्वेगों पर नियंत्रण पाना है।

हाँ, भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि भूत (उत्पत्ति), अभाव (विनाश), सुख, दुःख, भय और अभय—ये सभी जीवों के कर्मों और प्रकृति के नियमों के अनुसार भगवान की ही शक्ति से संचालित होते हैं। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से दुःख और भय भी जीव को मोह की नींद से जगाने और उसे आत्मानुभूति की ओर मोड़ने के लिए दिव्य व्यवस्था का हिस्सा हैं।

आप प्रतिदिन प्रातःकाल पूजा के समय इस श्लोक का उच्चारण कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, जब भी जीवन में निर्णय लेने में दुविधा (मोह) हो, मन अशांत हो, या भय की स्थिति बने, तब इस श्लोक का मानसिक स्मरण करने से चित्त में अद्भुत स्थिरता, स्पष्टता और निर्भयता प्राप्त होती है।

विभूतियोग के अध्ययन से साधक की संकीर्ण दृष्टि समाप्त हो जाती है और उसे कण-कण में परमात्मा के दर्शन होने लगते हैं। इससे मनुष्य का अहंकार मिट जाता है, वह हर परिस्थिति में भगवान का आभार मानता है और उसकी अनन्य भक्ति पुष्ट होती है, जिससे वह अंततः परम शांति को प्राप्त करता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान श्रीकृष्ण अब अपनी विभूतियों का वर्णन आरम्भ करते हैं। वे कहते हैं कि बुद्धि, ज्ञान, क्षमा, सत्य, इंद्रिय दमन, मनःशमन, सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु, भय-अभय आदि सभी उन्हीं से प्रकट होते हैं। इसका तात्पर्य है कि समस्त चेतन और अचेतन गुणों का स्रोत एकमात्र परमात्मा हैं।

The Lord lists various qualities and states of existence, indicating that all of them originate from Him. This establishes that everything we experience is a manifestation of the divine energy.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 4 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 4/42 10% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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