श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 2

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 48 मिनट का पठन 123 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः | अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः || २||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
न
नहीं
मे
मेरे
विदुः
जानते
सुर-गणाः
देवता
प्रभवम्
उद्भव (ऐश्वर्य)
न
नहीं
महर्षयः
महर्षि
अहम्
मैं
आदि
आदि कारण
हि
निश्चय ही
देवानाम्
देवताओं के
महर्षीणाम्
महर्षियों के
च
और
सर्वशः
सब प्रकार से।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

न देवता समूह और न ही महर्षि लोग मेरी उत्पत्ति (ऐश्वर्य) को जानते हैं, क्योंकि सब प्रकार से मैं ही देवताओं और महर्षियों का आदि कारण हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः - श्रीमद्भगवद्गीता ज्ञानकोश | Bhaktilok.in

भक्तिकुल की प्रस्तावना: भगवान श्रीकृष्ण के अचिंत्य प्रभाव और परम ऐश्वर्य का रहस्य

सनातन धर्म के आध्यात्मिक गगन में श्रीमद्भगवद्गीता एक ऐसा सूर्य है, जिसकी प्रभा से मानव जीवन के समस्त अज्ञान रूपी अंधकार का नाश हो जाता है। गीता के दसवें अध्याय, जिसे 'विभूतियोग' कहा जाता है, में भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों को अपनी असीम और अनंत विभूतियों का साक्षात्कार कराते हैं। इसी क्रम का यह अत्यंत महत्वपूर्ण दूसरा श्लोक—"न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः..."—जीव मात्र की बुद्धि की सीमा और परमात्मा की अनंतता के बीच के अद्भुत अंतर को स्पष्ट करता है। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं यह उद्घोषित किया है कि न तो देवता और न ही बड़े-बड़े महर्षि उनके प्राकट्य, उत्पत्ति या प्रभाव के मूल को जानते हैं, क्योंकि वे स्वयं समस्त देवताओं और महर्षियों के आदिकारण हैं।

भारतीय मनीषी और वेदव्यास रचित महाभारत के इस अंश का सांस्कृतिक और दार्शनिक महत्व अत्यंत गहरा है। सामान्य मनुष्य अपनी सीमित इंद्रियों और बौद्धिक क्षमताओं के आधार पर उस परम शक्ति को मापने का असफल प्रयास करता है, जो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त होने के साथ-साथ इस ब्रह्मांड की सीमाओं से परे भी स्थित है। यह श्लोक हमें नम्रता का पाठ पढ़ाता है और अहंकार का त्याग कर शरणागति का मार्ग दिखाता है। जब तक जीव यह समझ नहीं लेता कि उसका रचयिता कौन है और वह स्वयं कितना लघु है, तब तक उसे आत्मकल्याण का मार्ग नहीं मिल सकता। Bhaktilok.in के इस विस्तृत आलेख में हम इसी गूढ़ श्लोक के शाब्दिक अर्थ, दार्शनिक पक्षों, पौराणिक कथाओं और दैनिक जीवन में इसके प्रासंगिक लाभों का अत्यंत सूक्ष्मता से विश्लेषण करेंगे।

इस श्लोक का पठन और मनन न केवल मानसिक शांति प्रदान करता है, बल्कि साधक को यह बोध कराता है कि इस संसार में जो कुछ भी महान, तेजस्वी या ऐश्वर्ययुक्त दिखाई देता है, वह सब उसी एक महाविष्णु, वासुदेव श्रीकृष्ण का ही अंश मात्र है। यह आध्यात्मिक चेतना मनुष्य को भौतिक मोह-माया से ऊपर उठाकर परमात्मा के चरण कमलों में गाढ़ा अनुराग उत्पन्न करने में सहायक सिद्ध होती है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

गीता के पाठ और मनन से पूर्व इसकी पवित्रता और विधि का ध्यान रखना आवश्यक है। एकाग्रचित्त होकर स्नान करने के पश्चात शुद्ध वस्त्र धारण कर इस श्लोक का सस्वर पाठ करना चाहिए।

॥ अथ श्रीमद्भगवद्गीता अथ दशमोध्यायः विभूतियोगः (श्लोक २) ॥

न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः |
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः || २||


संसार में उच्चारण विधि:
न मे विदुः सुर-गणाः प्रभवं न महर्षयः।
अहम्-आदिः हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥

पाठ करने की शास्त्रीय विधि:

  • प्रातः काल ब्रह्म बेला में या संध्या के समय पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें।
  • भगवान श्रीकृष्ण के विग्रह या चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित करें और गंध-पुष्प अर्पित करें।
  • आचमन और पवित्रिकरण के पश्चात श्रद्धापूर्वक इस श्लोक का न्यूनतम 108 बार मानसिक अथवा वाचिक जप करें।
  • पाठ के अंत में भगवान को मिश्री अथवा मक्खन का भोग लगाकर अपनी भूलों के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

संस्कृत व्याकरण और वेदान्त के सिद्धांतों के अनुसार इस श्लोक के प्रत्येक पद का गहरा दार्शनिक अर्थ है, जिसे नीचे सारणीबद्ध किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
न नहीं अज्ञान या असमर्थता का द्योतक, यह बताता है कि मानवीय बुद्धि की एक सीमा है।
मे मेरे स्वयं सच्चिदानंद भगवान श्रीकृष्ण (परम ब्रह्म) के लिए प्रयुक्त सर्वनाम।
विदुः जानते हैं यथार्थ रूप से समझना, अनुभव करना या बोध प्राप्त करना।
सुरगणाः देवतागण (जैसे इंद्र, वरुण आदि) स्वर्ग के वे शक्तिशाली शासक जो भौतिक प्रकृति के संचालक हैं, वे भी भगवान को सीमित रूप में ही जानते हैं।
प्रभवम् उत्पत्ति, प्राकट्य या मूल कारण वह बिंदु जहाँ से किसी का उद्गम होता है; भगवान का आदि या उद्गम स्थान किसी को ज्ञात नहीं।
न और नहीं निषेधवाचक पद जो देवताओं के साथ-साथ महर्षियों पर भी लागू होता है।
महर्षयः बड़े-बड़े महर्षि (जैसे भृगु, वशिष्ठ, नारद आदि) वे महान तपस्वी और दृष्टा जिन्होंने वेदों का दर्शन किया, वे भी पूर्णतः भगवान के रहस्य को नहीं पा सके।
अहम् मैं ही अद्वैत और विशिष्टाद्वैत का मूल आधार, भगवान स्वयं अपनी सर्वोच्च सत्ता की घोषणा कर रहे हैं।
आदिः आदिकारण, मूल स्रोत सबका प्रारंभ, जिसके पूर्व कुछ भी नहीं था, वही परम कारण सत-चित्त-आनंद है।
हि निश्चय ही (For/Indeed) यह एक अटल और अकाट्य सत्य को प्रमाणित करने वाला अव्यय है।
देवानाम् देवताओं का समस्त आधिदैविक शक्तियों के भी जनक और नियंत्रक भगवान ही हैं।
महर्षीणाम् च और महर्षियों का भी तपस्वियों, ज्ञानियों और ऋषियों के ज्ञान का स्रोत भी भगवान की कृपा ही है।
सर्वशः सब प्रकार से, पूर्ण रूप से हर दृष्टि से, हर काल में और हर स्थिति में भगवान ही सबके मूल आधार हैं।

व्याख्यात्मक निष्कर्ष: इस सारणी से यह स्पष्ट होता है कि जब देवता और महर्षि भी भगवान के मूल को नहीं जानते, तो सामान्य मनुष्यों का अपनी बुद्धि के बल पर उन्हें समझ पाना असंभव है। केवल भक्ति और भगवान की अनुकंपा ही उन्हें जानने एकमात्र उपाय है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र के मैदान से जुड़ी हुई है, जहाँ अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ होकर अपने स्वजनों के विरुद्ध युद्ध करने से मना कर देते हैं। तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें सांत्वना देने और उनके मोह को दूर करने के लिए गीता का यह दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं। दसवें अध्याय के आरंभ में अर्जुन भगवान के ऐश्वर्य को जानने की इच्छा व्यक्त करते हैं, और भगवान अपने उत्तर में यह स्पष्ट करते हैं कि उनकी योगमाया इतनी प्रबल है कि देवता और ऋषि भी भ्रमित हो जाते हैं।

पौराणिक ग्रंथों, विशेषकर श्रीमद्भागवत महापुराण और पद्मपुराण में इस प्रसंग के अनेक संदर्भ मिलते हैं। एक बार ब्रह्माजी और देवर्षि नारद के मन में यह अहंकार उत्पन्न हो गया कि वे सृष्टि के सृजन और वेदों के ज्ञान के कारण ब्रह्मांड के सबसे ज्ञानी प्राणी हैं। तब भगवान श्रीकृष्ण (अथवा महाविष्णु) ने अपनी लीला से उन्हें यह अहसास कराया कि उनका ज्ञान समुद्र में एक बूँद के समान है। ब्रह्माजी जब भगवान के मूल को खोजने निकले, तो वे वर्षों तक उनकी नाभि से निकले कमलनाल के नीचे की ओर यात्रा करते रहे, परंतु उन्हें भगवान के आदि (मूल) का पता नहीं चल सका। थक-हारकर जब वे लौटे, तब उन्हें समझ आया कि भगवान की उत्पत्ति का ज्ञान किसी को नहीं है, क्योंकि वे स्वयं 'अनादि' और 'अनंत' हैं।

इसी ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भ को ध्यान में रखते हुए, महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में इस श्लोक को सहेजा है। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि अहंकार चाहे कितना भी बड़ा ज्ञानी या देवता क्यों न हो, भगवान की महानता के आगे उसकी कोई महत्ता नहीं टिकती। जो साधक इस ऐतिहासिक और दार्शनिक सत्य को स्वीकार कर लेता है, उसके जीवन से सारे भ्रम और संशय हमेशा के लिए समाप्त हो जाते हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन श्लोक का नियमित पठन, मनन और श्रवण करने से साधक को अनेकानेक मानसिक, आध्यात्मिक और कार्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

इस श्लोक के जप से मन में चल रहे उद्वेग, तनाव और अनावश्यक चिंताएँ शांत होती हैं। यह बोध कि सब कुछ एक सर्वोच्च शक्ति के नियंत्रण में है, चित्त को अगाध शांति देता है।

2. अहंकार का शमन और विनम्रता

जब देवता और महर्षि भी भगवान के प्रभाव को पूरी तरह नहीं जान सकते, तो मनुष्य का अहंकार स्वतः गल जाता है। इससे जीवन में विनय और सादिता का गुण विकसित होता है।

3. सकारात्मक ऊर्जा और औरा का निर्माण

श्लोक के संस्कृत वर्णों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाले कंपन (Vibrations) शरीर के चक्रों को जाग्रत करते हैं, जिससे साधक के चारों ओर एक शक्तिशाली सकारात्मक ऊर्जा का आवरण बनता है।

4. कार्मिक शुद्धि (पाप कर्मों का नाश)

गीता के वचनों का स्मरण करने मात्र से पूर्व जन्मों और वर्तमान जीवन के पाप कर्मों का क्षय होता है। साधक का अंतःकरण शुद्ध होकर मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होता है।

5. भगवत्कृपा और शरणागति की प्राप्ति

यह श्लोक साधक को पूर्ण शरणागति (Surrender) सिखाता है। जब व्यक्ति भगवान को ही सबका आदि मान लेता है, तो उसे भगवान की विशेष कृपा और सुरक्षा प्राप्त होती है।

6. निर्णय क्षमता और बौद्धिक विकास

भगवान को समस्त ज्ञान का स्रोत मानने से साधक की बुद्धि में दिव्यता आती है। कठिन परिस्थितियों में भी सही और धर्मसम्मत निर्णय लेने की शक्ति प्राप्त होती है।

7. भय और मृत्यु के संशय से मुक्ति

जो यह जान लेता है कि भगवान ही सब के आदि और अंत हैं, उसके मन से मृत्यु और भविष्य का भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है क्योंकि वह अमर आत्मा के स्वरूप को समझ जाता है।

8. आध्यात्मिक एकाग्रता (ध्यान में प्रगति)

ध्यान और योग साधना करने वालों के लिए यह श्लोक एक महान संबल है। यह ध्यान को भटकाव से बचाकर सीधे परमेश्वर के अनंत स्वरूप पर केंद्रित करने में मदद करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस लेख को सनातन धर्म के प्रकांड विद्वानों, संस्कृत भाषाविदों और वेदव्यास रचित श्रीमद्भगवद्गीता के पारंपरिक टीकाकारों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज और स्वामी गीतानंद) के ग्रंथों का गहन अध्ययन करके तैयार किया गया है। हमारा यह प्रयास रहा है कि आधुनिक पाठकों और साधकों तक वेदों और पुराणों का मूल और शुद्ध संदेश बिना किसी मिलावट के पहुँचे।

इस आलेख में प्रस्तुत किए गए शब्दार्थ, पौराणिक प्रसंग और दार्शनिक व्याख्याएँ पूरी तरह से शास्त्रसम्मत हैं। हम पाठकों से अनुरोध करते हैं कि वे किसी भी श्लोक का अध्ययन करते समय उसके शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ उसके आन्तरिक भाव को भी समझें। यदि आपके पास इस विषय से संबंधित कोई प्रश्न या सुझाव है, तो आप Bhaktilok.in के माध्यम से हमारे विद्वान मंडल से संपर्क कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय (विभूतियोग) का दूसरा श्लोक है। इस प्रसंग में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण की अनंत विभूतियों को जानने की इच्छा व्यक्त करते हैं, और भगवान उत्तर में यह समझाते हैं कि उनका वास्तविक रूप और प्रभाव देवताओं और महर्षियों के लिए भी अज्ञात है क्योंकि वे ही सबके आदिकारण हैं।

यद्यपि बौद्धिक ज्ञान या इंद्रियों के बल पर भगवान को पूरी तरह जानना असंभव है, किंतु अनन्य भक्ति, पूर्ण शरणागति और गुरु की कृपा के माध्यम से मनुष्य भगवान के प्रेम और उनके साक्षात स्वरूप का अनुभव कर सकता है। गीता के ही अन्य अध्यायों में भगवान ने स्पष्ट किया है कि 'भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहम्...' यानी केवल अनन्य भक्ति से ही मुझे जाना जा सकता है।

'सुरगणाः' का अर्थ स्वर्ग के देवता (जैसे इंद्र, अग्नि, वरुण आदि) हैं जो भौतिक ब्रह्मांड के संचालन में विशेष शक्तियां रखते हैं। 'महर्षयः' का अर्थ भृगु, वशिष्ठ, नारद जैसे महान ऋषि हैं जिन्होंने वेदों का दर्शन किया है। इन दोनों वर्गों को ब्रह्मांड में सबसे ज्ञानी और शक्तिशाली माना जाता है, फिर भी वे भगवान के आदि और अंत को नहीं जानते।

इस श्लोक का नित्य जप करने से मनुष्य के भीतर का अहंकार समाप्त होता है, मानसिक तनाव और अवसाद दूर होते हैं, तथा जीवन के प्रति दृष्टिकोण सकारात्मक बनता है। साधक को यह अगाध विश्वास हो जाता है कि उसका जीवन और इस संपूर्ण ब्रह्मांड की व्यवस्था एक सर्वोच्च न्यायकारी शक्ति के हाथ में सुरक्षित है।

नहीं, श्रीमद्भगवद्गीता का कोई भी श्लोक पवित्र और सार्वभौमिक है। इसके पाठ के लिए किसी कठोर दीक्षा की आवश्यकता नहीं है। इसे कोई भी श्रद्धावान व्यक्ति शुद्धता और पवित्रता के साथ प्रतिदिन अपने घर पर सस्वर पाठ या स्मरण कर सकता है।

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"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" — सर्वे भवन्तु सुखिनः

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि देवता और महर्षि भी उनके वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते। क्योंकि वे स्वयं सभी के आदि कारण हैं। यह उनकी सर्वोच्च सत्ता को स्थापित करता है।

Lord Krishna emphasizes His supremacy by stating that even the celestial beings and great sages are unaware of His divine nature, as He is the very source of their existence.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 2 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 2/42 5% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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