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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 10 · श्लोक 2

अध्याय 10 · श्लोक 2

विभूति योग (Vibhuti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः | अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः || २||

na me viduḥ sura-gaṇāḥ prabhavaṃ na maharṣayaḥ | aham ādir hi devānāṃ maharṣīṇāṃ ca sarvaśaḥ ||2||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; मे: मेरे; विदुः: जानते; सुर-गणाः: देवता; प्रभवम्: उद्भव (ऐश्वर्य); न: नहीं; महर्षयः: महर्षि; अहम्: मैं; आदि: आदि कारण; हि: निश्चय ही; देवानाम्: देवताओं के; महर्षीणाम्: महर्षियों के; च: और; सर्वशः: सब प्रकार से।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

न देवता समूह और न ही महर्षि लोग मेरी उत्पत्ति (ऐश्वर्य) को जानते हैं, क्योंकि सब प्रकार से मैं ही देवताओं और महर्षियों का आदि कारण हूँ।

English Translation

Neither the hosts of gods nor the great sages know My origin, for I am the source of all the gods and the great sages in every way.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

Krishna states that even the celestial beings and great sages do not comprehend His divine origin. He is the source of all, including those who are considered creators or seers. This establishes His supreme transcendental position.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।