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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 10 · श्लोक 1

अध्याय 10 · श्लोक 1

विभूति योग (Vibhuti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रीभगवानुवाच | भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः | यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया || १||

śrī-bhagavān uvāca | bhūya eva mahā-bāho śṛṇu me paramaṃ vacaḥ | yat te ’haṃ prīyamāṇāya vakṣyāmi hita-kāmyayā ||1||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रीभगवान् उवाच: भगवान् ने कहा; भूय: फिर; एव: ही; महाबाहो: हे महाबाहो; शृणु: सुन; मे: मेरे; परमम्: परम; वचः: वचन; यत्: जो; ते: तुमसे; अहम्: मैं; प्रीयमाणाय: प्रिय होने के कारण; वक्ष्यामि: कहूँगा; हितकाम्यया: हित की इच्छा से।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

श्रीभगवान् बोले: हे महाबाहो! तुम मेरे परम प्रिय हो, इसलिये तुम्हारे हित की इच्छा से मैं फिर से कहता हूँ, मेरे इन परम रहस्यमय वचनों को सुनो।

English Translation

The Supreme Lord said: O mighty-armed Arjuna, listen further to My supreme words, which I shall impart to you, who are dear to Me, out of a desire for your welfare.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

Lord Krishna begins this chapter by addressing Arjuna as Mahabaho (mighty-armed), indicating his capability to receive this knowledge. He says He will speak again (bhūya eva) because Arjuna is dear to Him and He wishes his welfare. This sets the tone for the vibhuti yoga, where the Lord will describe His divine opulences.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।