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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 10 · श्लोक 19

अध्याय 10 · श्लोक 19

विभूति योग (Vibhuti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रीभगवानुवाच | हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः | प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे || १९||

śrī-bhagavān uvāca | hanta te kathayiṣyāmi divyā hy ātma-vibhūtayaḥ | prādhānyataḥ kuru-śreṣṭha nāsty anto vistarasya me ||19||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रीभगवान् उवाच: श्रीभगवान् बोले; हन्त: अच्छा; ते: तुमसे; कथयिष्यामि: कहूँगा; दिव्या: दिव्य; हि: ही; आत्म-विभूतय: अपनी विभूतियाँ; प्राधान्यतः: प्रधान रूप से; कुरु-श्रेष्ठ: हे कुरुश्रेष्ठ; न अस्ति: नहीं है; अन्त: अंत; विस्तरस्य: विस्तार का; मे: मेरा।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

श्रीभगवान् बोले: हे कुरुश्रेष्ठ! अच्छा, अब मैं तुमसे अपनी प्रधान दिव्य विभूतियाँ कहूँगा, क्योंकि मेरे विभूतियों के विस्तार का अन्त नहीं है।

English Translation

The Blessed Lord said: Very well! Now I will declare to you My divine glories in their prominence, O Arjuna; there is no end to their detailed description.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

Krishna responds positively to Arjuna's request. He agrees to describe His divine glories, but with the caveat that only the prominent ones can be mentioned, as His manifestations are endless. This humility in the face of infinity is characteristic of divine revelation.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।