श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 19

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 42 मिनट का पठन 138 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच | हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः | प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे || १९||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवान् बोले
हन्त
अच्छा
ते
तुमसे
कथयिष्यामि
कहूँगा
दिव्या
दिव्य
हि
ही
आत्म-विभूतय
अपनी विभूतियाँ
प्राधान्यतः
प्रधान रूप से
कुरु-श्रेष्ठ
हे कुरुश्रेष्ठ
न अस्ति
नहीं है
अन्त
अंत
विस्तरस्य
विस्तार का
मे
मेरा।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

श्रीभगवान् बोले: हे कुरुश्रेष्ठ! अच्छा, अब मैं तुमसे अपनी प्रधान दिव्य विभूतियाँ कहूँगा, क्योंकि मेरे विभूतियों के विस्तार का अन्त नहीं है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय व्यापकता

सनातन संस्कृति और वेदान्त दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान केवल एक धार्मिक ग्रंथ मात्र का नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के प्रत्येक संशय को चीरने वाली वह दिव्य प्रज्ञा है, जो जीव को उसके मूल स्वरूप यानी ब्रह्म से साक्षात्कार कराती है। महाभारत के भीषण रणक्षेत्र में कुरुक्षेत्र की पावन भूमि पर जब अर्जुन विषाद से घिरकर अपने कर्तव्य पथ से विचलित हो जाते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें गीता के रूप में अमृतोपम उपदेश प्रदान करते हैं। इसी श्रृंखला का दशम अध्याय 'विभूतियोग' के नाम से विख्यात है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपनी अगाध, अनंत और सर्वव्यापक शक्तियों—जिन्हें 'विभूतियाँ' कहा जाता है—का दिग्दर्शन कराते हैं।

प्रस्तुत श्लोक "श्रीभगवानुवाच | हन्त ते कथयिष्यामि..." उस महान संवाद की पराकाष्ठा है जहाँ अर्जुन के बार-बार आग्रह करने पर कि वे अपनी विभूतियों का विस्तार से वर्णन करें, स्वयं पराब्रह्म परमेश्वर अपनी अनंतता को स्वीकार करते हुए भी भक्त की जिज्ञासा को शांत करने के लिए सहर्ष तैयार होते हैं। यहाँ भगवान का 'हन्त' शब्द उनकी अहैतुकी कृपा, वात्सल्य और परम आनंद का सूचक है। यह श्लोक न केवल भगवान की असीम महिमा को उजागर करता है, बल्कि यह भी सिखाता है कि किस प्रकार अनंत परमात्मा अपनी योगमाया के बल पर इस संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त रहते हुए भी अपनी प्रधान और श्रेष्ठ शक्तियों के माध्यम से साधक के चित्त को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक साधकों के लिए एक मार्गदर्शक स्तंभ है। यह हमें सिखाता है कि भौतिक जगत की प्रत्येक उत्कृष्ट, सुंदर, बलशाली और सत्य वस्तु में उस परमपिता की ही ऊर्जा प्रवाहित हो रही है। जब एक साधक इस भाव से जगत को देखता है, तो उसका अंतःकरण ईर्ष्या, द्वेष और मोह से मुक्त होकर विशुद्ध भक्ति और विस्मय से भर जाता है। Bhaktilok.in के इस विस्तृत आलेख में हम इसी महामंत्र के पद-दर-पद अर्थ, उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि, नियमित पाठ के लाभ और शास्त्रीय रहस्यों का गहन अन्वेषण करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं संदर्भ

श्रीकृष्णार्जुनसंवाद — श्रीमद्भगवद्गीता (दशम अध्याय - विभूतियोग, श्लोक 19)

श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥ १९॥

श्लोकान्वय एवं उच्चारण विधि

इस श्लोक का उच्चारण करते समय दीर्घ स्वरों (जैसे- दी-व्याः, ते, कथिष्यामि) पर उचित बल देना चाहिए। 'हन्त' पद भगवान के संबोधन और प्रसन्नता को प्रकट करता है। 'कुरुश्रेष्ठ' कहकर भगवान अर्जुन के महान कुल और उनके पराक्रम का स्मरण कराते हुए उन्हें इस गुह्य ज्ञान को धारण करने के लिए पात्र सिद्ध करते हैं। गीता के अध्ययन में इस श्लोक का पठन चित्त में एकाग्रता और भक्ति भाव का संचार करता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान बोले स्वयं पूर्णब्रह्म पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण अपने श्रीमुख से भक्तों के संशय का निवारण कर रहे हैं।
हन्त हर्ष, प्रसन्नता या 'अच्छा!' (सहमति सूचक) भक्त के प्रेमपूर्ण आग्रह को देखकर भगवान के हृदय में उत्पन्न वात्सल्य और आनंद का प्रतीक।
ते तुझसे (अर्जुन के लिए) भगवान और भक्त के बीच का अत्यंत अंतरंग, गोपनीय और प्रेममय संवाद।
कथयिष्यामि मैं कहूँगा / वर्णन करूँगा अगम्य और अचिंत्य रहस्यों को अपनी कृपा से वाणी के माध्यम से सुलभ करना।
दिव्याः दिव्य, अलौकिक, प्रकाशमय ऐसी शक्तियाँ जो प्राकृत या भौतिक सीमाओं से परे, शुद्ध सत्त्वगुणमयी और भगवत्स्वरूप हैं।
हि निश्चय ही, क्योंकि यह इस अकाट्य सत्य को पुष्ट करता है कि ईश्वर की विभूतियाँ अनंत और वास्तविक हैं।
आत्मविभूतयः अपनी (स्वयं की) विभूतियाँ (ऐश्वर्य, महिमा, विशेषताएँ) संपूर्ण ब्रह्मांड में जहाँ कहीं भी श्रेष्ठता, तेज या आकर्षण है, वह सब भगवान की ही शक्ति है।
प्राधान्यतः मुख्य-मुख्य रूप से, प्रधानता के आधार पर चूँकि अनंत का विस्तार असंभव है, अतः बोधगम्य और मुख्य रूपों का ही चयन किया गया है।
कुरुश्रेष्ठ हे कुरुवंशियों में श्रेष्ठ (अर्जुन) अर्जुन की श्रेष्ठता का आदर करते हुए उन्हें इस ज्ञान को धारण करने योग्य बताना।
न अस्ति नहीं है भगवान की अनंतता की कोई अंतिम सीमा या अंत नहीं है।
अन्तः अंत, समाप्ति, सीमा परमात्मा की शक्तियों का कोई छोर या समापन बिंदु नहीं है।
विस्तरस्य मे मेरे इस विस्तार (महिमा या फैलाव) का परमात्मा का यह विराट स्वरूप समय और स्थान की सीमाओं से परे सर्वव्यापक है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय की पृष्ठभूमि महाभारत के महासमर से जुड़ी है। कौरवों और पांडवों की विशाल सेनाएँ कुरुक्षेत्र की रणभूमि में आमने-सामने खड़ी थीं। युद्ध के आरंभ में जब अर्जुन ने अपने ही सगे-सम्बन्धियों, गुरुओं और प्रियजनों को सामने युद्धरत देखा, तो उनका मोहग्रस्त मन टूट गया। उन्होंने गांडीव धनुष नीचे रख दिया और भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में बैठकर उनके शिष्य बनकर मार्गदर्शन की प्रार्थना की। प्रथम छह अध्यायों में कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग के विभिन्न आयामों को समझाने के बाद, भगवान श्रीकृष्ण ने सप्तम से नवम अध्याय तक अपने ऐश्वर्य और योगशक्ति का आंशिक परिचय दिया।

दशम अध्याय के आरंभ में महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित इस संवाद में अर्जुन भगवान की इस विराटता से अत्यंत मुग्ध हो जाते हैं। अर्जुन कहते हैं—'परब्रह्म परमधाम पवित्रं परमं भवान्' (आप ही परम ब्रह्म, परम धाम और पवित्रतम हैं)। इसके पश्चात अर्जुन की जिज्ञासा और अधिक तीव्र हो जाती है कि वे किस प्रकार ध्यान करते समय भगवान को किन-किन रूपों में और कहाँ-कहाँ खोजें। वे निवेदन करते हैं—'कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्। केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया॥' (हे योगिन्! मैं निरंतर आपका चिंतन कैसे करूँ और किन-किन भावों में आप मेरे द्वारा चिंतन करने योग्य हैं?)

इसी प्रश्न के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण उपर्युक्त श्लोक (19) का उच्चारण करते हैं। भगवान स्पष्ट करते हैं कि यद्यपि वे संपूर्ण चराचर जगत के कण-कण में व्याप्त हैं, किंतु मानव बुद्धि की अपनी सीमाएँ हैं। इसलिए वे अपनी अनंत विभूतियों में से केवल उन मुख्य और प्रधान विभूतियों का वर्णन करेंगे जो मनुष्य के चित्त को दिव्यता की ओर मोड़ने में सक्षम हैं। यह प्रसंग पुराणों और वेदों के उस महान दार्शनिक सिद्धांत को पुष्ट करता है जिसके अनुसार 'ईवास्यमिदं सर्वं यत्किंचित जगत्यां जगत' (इस संसार में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से आच्छादित है)।

महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता की रचना करके मानवता को यह अमूल्य निधि सौंपी है। आचार्य शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और मध्वाचार्य जैसे महान वेदांती आचार्यों ने इस श्लोक की व्याख्या करते हुए यह समझाया है कि भगवान की विभूतियाँ उपासकों के मन को एकाग्र करने के लिए आलंबन (आधार) का काम करती हैं। जब साधक संसार की किसी भी वस्तु में श्रेष्ठता देखता है, तो वह उसे माया न मानकर भगवान का ही ऐश्वर्य मानकर पूजने लगता है, जिससे उसका संपूर्ण जीवन एक महायज्ञ बन जाता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

01

मानसिक शांति एवं एकाग्रता

इस श्लोक और विभूतियोग के नियमित पठन से चंचल मन को एक स्थिर और दिव्य दिशा मिलती है। भगवान की अनंतता का स्मरण करने से संसार की छोटी-छोटी चिंताएँ और तनाव स्वतः समाप्त होने लगते हैं।

02

सकारात्मक ऊर्जा एवं औरा का विस्तार

संस्कृत के इन पवित्र श्लोकों के कंपन (Vibrations) से शरीर और मन के चारों ओर एक सकारात्मक ऊर्जा का कवच बनता है, जो नकारात्मक शक्तियों और विचारों को दूर रखता है।

03

कर्म शुद्धि एवं अंहकार का नाश

यह बोध होने पर कि संपूर्ण संसार में जो कुछ भी श्रेष्ठ है वह भगवान का ही प्रताप है, मनुष्य के भीतर से 'अहंकार' (मैं और मेरा का भाव) नष्ट होने लगता है, जिससे उसके कर्म स्वतः निष्काम और पवित्र हो जाते हैं।

04

ईश्वरीय कृपा और शरणागति की प्राप्ति

भगवान के प्रति अनन्य प्रेम और उनकी महिमा का गान करने से साधक पर भगवान की अहैतुकी कृपा बरसती है, और उसे जीवन के हर मोड़ पर परमेश्वर का प्रत्यक्ष या परोक्ष मार्गदर्शन अनुभव होता है।

05

भय और विषाद का निवारण

जैसे कुरुक्षेत्र में अर्जुन का विषाद भगवान के वचनों से दूर हुआ था, उसी प्रकार इस श्लोक का चिंतन जीवन की बड़ी से बड़ी कठिनाइयों और अनिश्चितताओं के भय को समाप्त कर देता है।

06

सर्वव्यापकता का दार्शनिक बोध

यह श्लोक साधक की दृष्टि को संकीर्णता से उठाकर ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण देता है, जिससे वह हर प्राणी और वस्तु में ईश्वरीय अंश देखने में समर्थ होता है (सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि)।

07

स्मरण शक्ति और वाक्पटुता में वृद्धि

वैदिक और शास्त्रीय छंदों के नियमित उच्चारण से जिह्वा और मस्तिष्क का समन्वय बेहतर होता है, जिससे एकाग्रता, बुद्धि की तीक्ष्णता और स्मरण शक्ति में उल्लेखनीय सुधार होता है।

08

मोक्ष और परम गति का मार्ग प्रशस्त

गीता के ज्ञान में मग्न होकर जीवन जीने वाला मनुष्य आवागमन के चक्र से मुक्त होकर अंततः भगवान के परम धाम को प्राप्त होता है, जैसा कि स्वयं भगवान ने गीता के अंत में प्रतिज्ञा की है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, आचार्यों के भाष्यों और पारंपरिक वैयाकरणों के अनुसंधान पर आधारित एक संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की व्याख्या करते समय आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास जी और स्वामी गीतानंद जी के वचनों एवं टीकाओं का सूक्ष्म अध्ययन किया गया है ताकि पाठकों तक शुद्ध, मिलावट-रहित और वेदान्त सम्मत ज्ञान पहुँच सके। हमारा उद्देश्य आधुनिक तकनीक और डिजिटल माध्यमों के जरिए सनातन संस्कृति के अछूते रहस्यों को सरल हिंदी भाषा में जन-जन तक पहुँचाना है, जिससे हर साधक अपने भीतर छिपी अनंत ऊर्जा और भक्ति को जागृत कर सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी उन विशेष, अलौकिक और विभूतियों (शक्तियों व ऐश्वर्यों) का विस्तार से वर्णन किया है जिनके माध्यम से वे संपूर्ण ब्रह्मांड में अपनी ऊर्जा का संचार करते हैं। चूँकि इस अध्याय में भगवान की असीम महिमा और योग शक्तियों का मुख्य रूप से प्रकटीकरण हुआ है, इसलिए ऋषि वेदव्यास ने इस अध्याय का नाम 'विभूतियोग' रखा है।

संस्कृत व्याकरण और कोष के अनुसार 'हन्त' शब्द हर्ष (प्रसन्नता), अनुमोदन (सहमति) या संबोधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। यहाँ इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण जब अर्जुन के प्रेमपूर्ण आग्रह को सुनते हैं, तो उनके भीतर भक्त के प्रति अपार वात्सल्य और प्रसन्नता जागृत होती है। 'हन्त' शब्द उसी दिव्य हर्ष और 'अवश्य, मैं तुम्हें अपनी विभूतियाँ सुनाऊँगा' जैसी सहज स्वीकृति को दर्शाता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने श्लोक के उत्तरार्ذ में स्पष्ट रूप से कहा है—'नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे' (अर्थात मेरी विभूतियों के विस्तार का कोई अंत नहीं है)। परमात्मा अनंत हैं, इसलिए उनकी शक्तियों की कोई सीमा नहीं हो सकती। मनुष्य की बुद्धि और आयु सीमित है, अतः भगवान ने साधक की बोधगम्यता के लिए केवल अपनी मुख्य और प्रधान विभूतियों (प्राधान्यतः) का ही चयन करके वर्णन किया है।

इस पावन श्लोक का नियमित स्मरण या पाठ करने से व्यक्ति के भीतर कृतज्ञता का भाव जागृत होता है। वह संसार की हर सुंदर, शक्तिशाली और सत्य वस्तु में भगवान की उपस्थिति महसूस करने लगता है। इससे अहंकार समाप्त होता है, मानसिक तनाव दूर होता है और साधक का मन भगवान के चरणों में सहज ही लीन होने लगता है।

'कुरुश्रेष्ठ' यानी कुरुवंशियों में श्रेष्ठ। भगवान श्रीकृष्ण इस संबोधन के माध्यम से अर्जुन को उनके उच्च कुल, महान संस्कारों और वीर योधा होने के कर्तव्य का स्मरण कराते हैं। भगवान यह जताना चाहते हैं कि ऐसा गूढ़, दिव्य और आत्मीय ज्ञान केवल एक श्रेष्ठ और समर्पित पात्र ही ग्रहण करने की क्षमता रखता है, और अर्जुन उस पात्रता पर पूरी तरह खरे उतरते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

श्रीभगवान् ने कहा: "हे कुरुश्रेष्ठ! अच्छा, अब मैं तुमसे अपनी प्रधान दिव्य विभूतियाँ कहूँगा, क्योंकि मेरे विभूतियों के विस्तार का अन्त नहीं है।"

The Lord graciously accepts Arjuna's request but humbly notes that His glories are infinite and cannot be fully described. He will, however, mention the most prominent manifestations for Arjuna's meditation and devotion.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 19 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 19/42 45% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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