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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 10 · श्लोक 18

अध्याय 10 · श्लोक 18

विभूति योग (Vibhuti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन | भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् || १८||

vistareṇātmano yogaṃ vibhūtiṃ ca janārdana | bhūyaḥ kathaya tṛptir hi śṛṇvato nāsti me ’mṛtam ||18||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

विस्तरेण: विस्तार से; आत्मन: अपने; योगम्: योग को; विभूतिम्: विभूति को; च: और; जनार्दन: हे जनार्दन; भूय: फिर से; कथय: कहिए; तृप्ति: तृप्ति; हि: ही; शृण्वत: सुनते हुए; न अस्ति: नहीं है; मे: मेरी; अमृतम्: अमृत।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे जनार्दन! अपने योग और विभूति को विस्तार से फिर कहिए। आपके इस अमृतमय वचन को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती।

English Translation

Tell me again in detail, O Janardana, of Your Yoga power and glory; for I am not satiated with hearing Your life-giving, nectar-like speech.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

Arjuna expresses his insatiable thirst for hearing about Krishna's divine glories. He compares Krishna's words to nectar (amrita) — the more he drinks, the more he wants. This verse beautifully illustrates the devotee's eternal hunger for divine knowledge.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।