श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 18

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 28 मिनट का पठन 127 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन | भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् || १८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
विस्तरेण
विस्तार से
आत्मन
अपने
योगम्
योग को
विभूतिम्
विभूति को
च
और
जनार्दन
हे जनार्दन
भूय
फिर से
कथय
कहिए
तृप्ति
तृप्ति
हि
ही
शृण्वत
सुनते हुए
न अस्ति
नहीं है
मे
मेरी
अमृतम्
अमृत।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे जनार्दन! अपने योग और विभूति को विस्तार से फिर कहिए। आपके इस अमृतमय वचन को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भूमिका एवं आध्यात्मिक महत्त्व

सनातन संस्कृति और वैदिक साहित्य के मुकुटमणि श्रीमद्भागवतगीता के दशम अध्याय का यह अठारहवां श्लोक (विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन...) मानव आत्मा और परमात्मा के बीच के उस अनंत संवाद का प्रतीक है, जहाँ ज्ञान, भक्ति और प्रेम की त्रिवेणी प्रवाहित होती है। कुरुक्षेत्र की रणभूमि में जहाँ एक ओर विनाश के अस्त्र-शस्त्र गरज रहे थे, वहीं दूसरी ओर भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अस्तित्व के परम रहस्यों से अवगत करा रहे थे। यह श्लोक केवल दो मित्रों या गुरु-शिष्य का संवाद मात्र नहीं है, बल्कि यह उस जीव की पुकार है जो भौतिक संसार के दुखों और भ्रमों से त्रस्त होकर उस परम सत्य की ओर दौड़ रहा है, जो सब कुछ होते हुए भी अलिप्त है।

सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से, यह श्लोक 'जिज्ञासा' के सर्वोच्च शिखर को दर्शाता है। वेदों और उपनिषदों में ज्ञान प्राप्ति को सबसे बड़ा यज्ञ माना गया है। जब मनुष्य के भीतर ईश्वर को जानने की तीव्र छटपटाहट उत्पन्न होती है, तब उसे वैराग्य और भक्ति के मार्ग पर चलने से कोई नहीं रोक सकता। अर्जुन यहाँ एक आदर्श भक्त के रूप में प्रकट होते हैं, जिनका मन भगवान के वचनों को सुनकर भरता नहीं है, बल्कि उनकी तृषा और अधिक तीव्र हो जाती है। वे श्रीकृष्ण को 'जनार्दन' कहकर संबोधित करते हैं—वह जो समस्त प्राणियों के याचनाकर्ता हैं, जो भक्तों के दुखों का निवारण करते हैं और जो सम्पूर्ण जगत के पालनहार हैं।

कोस्मिक या ब्रह्मांडीय दृष्टि से देखा जाए तो, इस श्लोक में निहित ऊर्जा साधक को स्थूल जगत से निकालकर सूक्ष्म और कारण जगत की यात्रा कराती है। भगवान की विभूतियाँ यानी उनकी अनंत शक्तियाँ और ऐश्वर्य इस ब्रह्मांड के कण-कण में रचे-बसे हैं। सूरज की चमक, चंद्रमा की शीतलता, वेदों में सामवेद, और जीवों में चेतना—ये सब उसी महाशक्ति के विस्तार हैं। जब कोई साधक इस श्लोक का स्मरण करता है और इसके मर्म को समझता है, तो उसके भीतर का संकुचित अहंकार गलने लगता है और वह सम्पूर्ण ब्रह्मांड में केवल और केवल एक ही चेतना के दर्शन करने लगता है। यही इस दिव्य रचना का मूल आध्यात्मिक संदेश है, जो पीढ़ियों से मानवता का मार्गदर्शन करता आ रहा है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अथ श्रीमद्भागवतगीता दशमोध्यायः (विभूतियोग) - श्लोक १८

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १८॥

उच्चारण विधि एवं ध्यान सूत्र

इस श्लोक का पाठ करने से पूर्व मन को शांत करें और भगवान श्रीकृष्ण के चतुर्भुज रूप का मानसिक ध्यान करें। प्रत्येक पद का उच्चारण स्पष्ट और सस्वर होना चाहिए। 'योगं' और 'विभूतिं' शब्दों पर हल्का बल देते हुए, श्लोक के अंत में आने वाले 'अमृतम्' शब्द को दीर्घ और भावपूर्ण ढंग से उच्चारित करें, जिससे उसका वास्तविक अर्थ हृदय तक उतर सके। नियमित रूप से प्रातःकाल ब्रह्म बेला में इस श्लोक का १०८ बार जप या स्मरण मानसिक शांति और एकाग्रता प्रदान करता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्रीमद्भागवतगीता के इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में ज्ञान का अपार भंडार छिपा है। आइए, इसका सूक्ष्म व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण करते हैं:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
विस्तरेण विस्तारपूर्वक, विस्तार से, विस्तार के साथ अल्प ज्ञान से संतुष्ट न होकर सत्य की गहराई तक उतरने की तीव्र लालसा और साधक की असीम जिज्ञासा को दर्शाता है।
आत्मनो अपने, स्वयं के, अपनी आत्मा या स्वरूप के भगवान श्रीकृष्ण अपनी ही आंतरिक योगशक्ति और परम स्वरूप का वर्णन करने की बात कर रहे हैं, जो सर्वव्यापी है।
योगं योगशक्ति, अपनी योगीय ऐश्वर्य शक्ति को वह दिव्य सामर्थ्य जिसके द्वारा परमेश्वर इस समस्त ब्रह्मांड को धारण करते हैं और नियंत्रित करते हैं।
विभूतिं विभूतियों को, ऐश्वर्यों को, महात्म्यों को प्रकृति और ब्रह्मांड के हर सुंदर, शक्तिशाली और उत्कृष्ट तत्व में परमेश्वर की उपस्थिति का बोध कराना।
च और, तथा योग और विभूति दोनों के समुच्चय को एक साथ जोड़कर समग्र ज्ञान प्राप्ति का संकेत देना।
जनार्दन हे जनार्दन! (कृष्ण का एक नाम - भक्तों के संकट हरने वाले) अर्जुन भगवान को इस विशेष संबोधन से पुकारते हैं क्योंकि केवल वही समस्त जीवों के अज्ञान जनित दुखों को हर सकते हैं।
भूयः फिर से, बार-बार, पुनः यह इस बात का प्रमाण है कि आध्यात्मिक ज्ञान का एक बार श्रवण पर्याप्त नहीं है; इसे बार-बार अनुभव करने की आवश्यकता है।
कथय क कहिए, वर्णन कीजिए, सुनाइए भक्त का अपने गुरु और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण, जहाँ वह ज्ञान का भिखारी बनकर बार-बार सुनने की प्रार्थना करता है।
तृप्तिः संतोष, तृप्ति, मन की पूर्ण संतुष्टि लौकिक पदार्थों से मिलने वाली तृप्ति क्षणिक होती है, किंतु भगवत कथा से मिलने वाली तृप्ति स्थायी और अलौकिक होती है।
हि निश्चय ही, क्योंकि एक अकाट्य सत्य को स्थापित करना कि भगवत प्रेम और ज्ञान का पान कभी मनुष्य को थकाता नहीं है।
शृण्वतः सुनते हुए, श्रवण करते हुए कानों के माध्यम से आत्मा तक पहुँचने वाली वह दिव्य ध्वनि जो श्रवण मात्र से चेतना को रूपांतरित कर देती है।
नास्ति नहीं है (न + अस्ति) अभाव की अनुपस्थिति को दर्शाना—अर्थात यहाँ तृप्ति का न होना किसी कमी का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रेम की अनंतता का प्रतीक है।
मे मेरी, मुझको अर्जुन व्यक्तिगत रूप से अपनी आंतरिक स्थिति का बयान कर रहे हैं कि उनकी अपनी प्यास अभी बुझी नहीं है।
अमृतम् अमृत, अमरता प्रदान करने वाला रस भगवान के मुख से निकले शब्द साधारण वायु तरंगें नहीं हैं, बल्कि वे भवसागर से तारने वाला संजीवनी अमृत हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भागवतगीता का यह प्रसंग महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आता है, जब दोनों सेनाएं कुरुक्षेत्र के मैदान में आमने-सामने खड़ी थीं। युद्ध के ठीक पूर्व, अर्जुन अपने सगे-सम्बन्धियों को देखकर विषाद से भर जाते हैं और अपने गांडीव धनुष को नीचे रख देते हैं। तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें कर्म, ज्ञान और भक्ति का जो उपदेश देते हैं, वही गीता है। दशम अध्याय तक आते-आते, अर्जुन भगवान के विराट स्वरूप और उनके उपदेशों के मर्म को कुछ हद तक समझ चुके होते हैं। उनके भीतर का मोह और अज्ञान अब छंटने लगा था, और उसके स्थान पर भगवान के प्रति अनन्य प्रेम, श्रद्धा और जिज्ञासा ने ले ली थी।

पुराणों और वेदों में इस बात का बार-बार उल्लेख मिलता है कि परम ब्रह्म का ज्ञान कोई साधारण वस्तु नहीं है। मुंडकोपनिषद और कठोपनिषद में भी गुरु और शिष्य के बीच इसी प्रकार के आत्मीय संवादों का वर्णन है जहाँ यमराज नचिकेता को और सनतकुमार नारद को आत्मज्ञान का पाठ पढ़ाते हैं। जब अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं कि "मुझे आपकी बातें सुनकर अमृत का पान करने जैसा अनुभव हो रहा है और मेरी तृप्ति नहीं हो रही है", तो वे वास्तव में उस सनातन परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं जहाँ साधक परमात्मा के मुखर वचनों को अपने जीवन का आधार मानता है।

इस प्रसंग की ऐतिहासिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि हमें यह सिखाती है कि जब वेदव्यास जी ने महाभारत की रचना की, तो उनका उद्देश्य केवल एक ऐतिहासिक युद्ध का वर्णन करना नहीं था, बल्कि मानव चेतना के सबसे बड़े संघर्ष—धर्म और अधर्म, ज्ञान और अज्ञान के युद्ध—को उजागर करना था। भगवान श्रीकृष्ण का यह कथन कि 'मैं समस्त भूतों का आदि, मध्य और अंत हूँ' अर्जुन की उस जिज्ञासा का उत्तर है जो यह जानना चाहती थी कि इस विराट ब्रह्मांड में ईश्वर कहाँ-कहाँ और किस रूप में विद्यमान हैं। इस प्रकार, यह शास्त्रीय पृष्ठभूमि हमें यह स्मरण कराती है कि हम सब भी उसी कुरुक्षेत्र में खड़े हैं जहाँ हमें हर पल भगवान के वचनों रूपी अमृत की आवश्यकता है ताकि हम जीवन के मोह-माया रूपी विषाद को पार कर सकें।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भागवतगीता के इस दिव्य श्लोक का नियमित पठन, मनन और जप करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। यहाँ इसके प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभों का वर्णन किया गया है:

1. मानसिक शांति और एकाग्रता में वृद्धि

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मानसिक अशांति और तनाव आम बात हो गई है। इस श्लोक का नियमित स्मरण मस्तिष्क की तरंगों को शांत करता है और गहन एकाग्रता (डिप फोकस) प्रदान करता है।

2. सकारात्मक ऊर्जा (Positive Aura) का सृजन

संस्कृत के इन पवित्र अक्षरों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाले ध्वनि कंपन (Sound Vibrations) व्यक्ति के चारों ओर एक शक्तिशाली सकारात्मक ऊर्जा का कवच तैयार करते हैं, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखता है।

3. कार्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

अज्ञानतावश किए गए पापों और बुरे कर्मों के संस्कारों (कर्म बंधनों) को काटने के लिए भगवद्गीता का अध्ययन सबसे बड़ा प्रायश्चित्त और शुद्धि का मार्ग माना गया है। यह चेतना को निर्मल करता है।

4. भगवत कृपा और भक्ति की प्राप्ति

जिस प्रकार अर्जुन के भीतर ईश्वर के प्रति जिज्ञासा और प्रेम उमड़ा, उसी प्रकार इस श्लोक के नियमित अभ्यास से साधक के हृदय में भी भगवान के प्रति अनन्य भक्ति और प्रेम का अंकुर फूटता है।

संसार की नश्वरता और मायावी प्रपंचों से मोह भंग करने में यह श्लोक मार्गदर्शक का कार्य करता है। यह विवेक बुद्धि को जागृत करता है जिससे सही और गलत का भेद स्पष्ट हो जाता है।

भविष्य की चिंता और भूतकाल के पछतावे में जीने वाले व्यक्तियों के लिए यह श्लोक वर्तमान क्षण में ईश्वर की उपस्थिति का अहसास कराकर समस्त मानसिक विकारों और अवसाद से मुक्ति दिलाता है।

अहंकार मनुष्य के पतन का कारण बनता है। अर्जुन की भाँति भगवान से बार-बार ज्ञान की याचना करना साधक के भीतर विनीत स्वभाव और सीखने की निरंतर प्रवृत्ति (Eternal Learner) को विकसित करता है।

जीवन के अंतिम समय में भगवद्स्मरण और गीता के वचनों का संबल व्यक्ति को चौरासी लाख योनियों के चक्र से मुक्त कर परम धाम (वैकुंठ या गोलोक) की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

भक्तिलोक.इन पर प्रस्तुत यह विस्तृत सामग्री हमारे विद्वान संस्कृत भाषाविदों, प्राचीन ग्रंथों के मर्मज्ञों और वेदान्त आचार्यों की देखरेख में तैयार की गई है। इस लेख में उल्लिखित प्रत्येक श्लोक, शब्दार्थ और दार्शनिक व्याख्या को महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित प्रामाणिक 'श्रीमद्भागवतगीता' (विशेषकर शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और ज्ञानेश्वरी टीकाओं के संदर्भों) के आधार पर सत्यापित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन धर्म के मूल ग्रंथों का शुद्ध, अविकृत और सहज बोधगम्य ज्ञान पहुँचाना है। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री इस बात का पूर्ण ध्यान रखती है कि आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्राचीन आध्यात्मिक परंपरा के बीच एक सुंदर संतुलन स्थापित किया जा सके, जिससे आज की युवा पीढ़ी भी वेदों और गीता के शाश्वत सत्यों से लाभान्वित हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: श्रीमद्भागवतगीता के दशम अध्याय का नाम ‘विभूतियोग’ है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के पूछने पर अपनी अनंत शक्तियों, ऐश्वर्यों और इस ब्रह्मांड के कण-कण में व्याप्त अपनी विभूतियों का विस्तार से वर्णन किया है, ताकि साधक अपनी चेतना में ईश्वर की सर्वव्यापकता का अनुभव कर सके।

उत्तर: 'जनार्दन' शब्द का अर्थ है—वह जो समस्त जन (मानव या जीवों) के दुखों का निवारण करते हैं, या जो अपने भक्तों को अज्ञान रूपी भवसागर से मुक्त करते हैं। अर्जुन यह भली-भांति जानते थे कि उनके आंतरिक संशय और अज्ञान को केवल श्रीकृष्ण ही दूर कर सकते हैं, इसलिए उन्होंने इस आत्मीय और प्रभावशाली संबोधन का प्रयोग किया।

उत्तर: इस पंक्ति का अर्थ है कि "आपकी अमृततुल्य वाणियों को सुनते-सुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है, अर्थात मेरी प्यास और अधिक बढ़ रही है।" आध्यात्मिक दृष्टि से, भौतिक सुखों से इंसान का पेट भर सकता है या वह तृप्त हो सकता है, किंतु भगवद्कथा और आत्मज्ञान एक ऐसा अमृत है जिसे जितना पियो, उतनी ही उसकी लालसा और तीव्र होती जाती है। यह भगवान के प्रति अगाध प्रेम की पराकाष्ठा है।

उत्तर: इस श्लोक का स्मरण प्रातः काल स्नान के पश्चात शांत चित्त से पूजा कक्ष में बैठकर करना सबसे उत्तम माना जाता है। इसके अर्थ को हृदय में उतारते हुए इसका सस्वर पाठ करें। आप चाहें तो दिनभर में जब भी मानसिक तनाव महसूस हो, इस श्लोक की पंक्तियों का मानसिक जप करके अपनी ऊर्जा को संतुलित कर सकते हैं।

उत्तर: हाँ, बिल्कुल। श्रीमद्भागवतगीता का मूल उद्देश्य ही अर्जुन के मानसिक विषाद और अवसाद को दूर करना था। जब कोई व्यक्ति इन श्लोकों का नियमित पाठ और उनके अर्थ पर चिंतन करता है, तो उसे जीवन के वास्तविक उद्देश्य का बोध होता है, जिससे व्यर्थ की चिंताएं, भय और अवसाद स्वतः समाप्त होने लगते हैं।

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जय श्रीकृष्ण! सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अर्जुन कहते हैं: "हे जनार्दन! अपने योग और विभूति को विस्तार से फिर कहिए। आपके इस अमृतमय वचन को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती।"

Arjuna's devotion is evident in his endless desire to hear about the Lord. Spiritual nectar, unlike material pleasure, never satiates but only increases the longing for more.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 18 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 18/42 43% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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पंचांग
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