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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 10 · श्लोक 17

अध्याय 10 · श्लोक 17

विभूति योग (Vibhuti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् | केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया || १७||

kathaṃ vidyām ahaṃ yogiṃs tvāṃ sadā paricintayan | keṣu keṣu ca bhāveṣu cintyo ’si bhagavan mayā ||17||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

कथम्: कैसे; विद्याम्: जानूँ; अहम्: मैं; योगिन्: हे योगिन्; त्वाम्: आपको; सदा: सदा; परिचिन्तयन्: चिन्तन करता हुआ; केषु केषु: किन-किन; च: और; भावेषु: भावों में; चिन्त्य: चिन्तन करने योग्य; असि: हैं; भगवन्: हे भगवन्; मया: मेरे द्वारा।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे योगिन्! मैं निरन्तर चिन्तन करता हुआ आपको कैसे जानूँ? हे भगवन्! मेरे द्वारा किन-किन भावों में आप चिन्तन करने योग्य हैं?

English Translation

How shall I, ever meditating, know You, O Yogin? In what aspects or things, O Blessed Lord, should I think of You?

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

Arjuna asks the practical question: how can he constantly meditate on Krishna? He seeks specific forms and aspects through which the Lord can be contemplated. This shows Arjuna's sincere desire for constant remembrance and devotion.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।