श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 16

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 47 मिनट का पठन 130 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः | याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि || १६||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
वक्तुम्
कहने के लिए
अर्हसि
आप योग्य हैं
अशेषेण
सम्पूर्ण रूप से
दिव्या
दिव्य
हि
ही
आत्म-विभूतय
अपनी विभूतियाँ
याभि
जिनसे
विभूतिभि
विभूतियों से
लोकान्
लोकों को
इमान्
इन
त्वम्
आप
व्याप्य
व्याप्त करके
तिष्ठसि
स्थित हैं।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

आप सम्पूर्ण रूप से अपनी उन दिव्य विभूतियों को कहने की कृपा करें, जिन विभूतियों से आप इन सब लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय, जिसे 'विभूति योग' के नाम से जाना जाता है, का यह 16वाँ श्लोक आध्यात्मिक जिज्ञासा की पराकाष्ठा है। यहाँ अर्जुन, जो अब पूरी तरह से शरणागत भक्त की भूमिका में है, भगवान श्रीकृष्ण से उनकी उन दिव्य शक्तियों और ऐश्वर्यों के बारे में विस्तार से बताने का आग्रह करता है, जिनसे उन्होंने समस्त ब्रह्मांड को व्याप्त कर रखा है। यह श्लोक केवल एक प्रश्न नहीं है, बल्कि एक साधक की उस तड़प का प्रतीक है जो अपने आराध्य को कण-कण में देखने की इच्छा रखता है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि ईश्वर केवल मंदिरों या मूर्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह 'विभूति' के रूप में इस दृश्य जगत के हर उत्कृष्ट तत्व में विद्यमान है। जब हम सूर्य की प्रखरता, हिमालय की स्थिरता या गंगा की पवित्रता को देखते हैं, तो वास्तव में हम भगवान की ही विभूतियों का दर्शन कर रहे होते हैं। अर्जुन का यह अनुरोध "वक्तुमर्हस्यशेषेण" (पूर्ण रूप से कहने की कृपा करें) यह दर्शाता है कि दिव्य ज्ञान की कोई सीमा नहीं है और एक सच्चा जिज्ञासु कभी भी भगवान की महिमा सुनने से तृप्त नहीं होता। इस लेख में हम इस श्लोक के गूढ़ अर्थों, इसके दार्शनिक आधार और हमारे दैनिक जीवन में इसकी प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह यात्रा हमें अज्ञान के अंधकार से निकालकर ईश्वरीय प्रकाश की ओर ले जाने वाली है, जहाँ हम समझेंगे कि कैसे परमात्मा अपनी अनंत शक्तियों के माध्यम से इस चराचर जगत का संचालन कर रहे हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ मूल संस्कृत श्लोक ॥

वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥ १६ ॥

पदच्छेद एवं उच्चारण (Transliteration)

vaktum-arhasy-aśeṣeṇa divyā hyātma-vibhūtayaḥ |
yābhir-vibhūtibhir-lokān-imāṃstvaṃ vyāpya tiṣṭhasi || 16 ||

सरल हिंदी काव्यानुवाद

"हे प्रभु! अपनी दिव्य विभूतियाँ, विस्तार से आप सुनाइये,
जिन शक्तियों से व्याप्त जग को, आप ही बस छाइये।
अशेष रूप से वर्णन करें, अपनी महिमा का गान करें,
लोक-लोकान्तर में व्याप्त प्रभु, अपना दर्शन दान करें।"

पाठ की विधि:

इस श्लोक का पाठ विशेष रूप से एकाग्रता और भक्ति भाव को बढ़ाने के लिए किया जाता है। साधक को चाहिए कि वह प्रातः काल स्नान के पश्चात, शुद्ध आसन पर बैठकर, भगवान श्रीकृष्ण के 'विश्वरूप' या 'मुरलीधर' स्वरूप का ध्यान करते हुए इस श्लोक का 11 या 21 बार जाप करे। यह पाठ मानसिक शांति और ईश्वर की सर्वव्यापकता का अनुभव कराने में अत्यंत सहायक सिद्ध होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
वक्तुम् (Vaktum) कहने के लिए / वर्णन करने हेतु यहाँ अर्जुन की प्रार्थना है कि केवल भगवान ही अपनी महिमा का वर्णन करने में समर्थ हैं, क्योंकि वे स्वयं के स्रोत हैं।
अर्हसि (Arhasi) आप ही योग्य हैं / कृपा करें यह शब्द भगवान की श्रेष्ठता को दर्शाता है। अर्जुन स्वीकार करता है कि कोई अन्य ऋषि या देवता इस रहस्य को नहीं बता सकता।
अशेषेण (Asheshena) बिना कुछ छोड़े / पूर्ण रूप से 'शेष' का अर्थ है बचा हुआ। 'अशेष' का अर्थ है जिसमें कुछ भी शेष न रहे। अर्जुन भगवान की महिमा को समग्रता में जानना चाहता है।
दिव्याः (Divyah) अलौकिक / दिव्य वे विभूतियाँ जो भौतिक जगत के नियमों से परे हैं और सीधे परमात्मा के ऐश्वर्य को प्रकट करती हैं।
आत्म-विभूतयः (Atma-vibhutayah) स्वयं की विभूतियाँ / ऐश्वर्य भगवान की वे शक्तियाँ जो उनके अपने स्वरूप से प्रकट होती हैं। यह उनकी 'योगमाया' का विस्तार है।
याभिः (Yabhih) जिनके द्वारा / जिन से उन विशिष्ट माध्यमों या शक्तियों की ओर संकेत है जो सृष्टि के संचालन का आधार हैं।
विभूतिभिः (Vibhutibhih) ऐश्वर्यों या वैभवों के द्वारा विभूति का अर्थ है 'विशेष भूति' यानी विशेष प्रकार की सत्ता या प्रकट रूप।
लोकान् (Lokan) समस्त लोकों को / ब्रह्मांड को केवल पृथ्वी ही नहीं, बल्कि समस्त चौदह भुवन और अनंत कोटि ब्रह्मांड इसमें समाहित हैं।
व्याप्य (Vyapya) व्याप्त होकर / समाकर जैसे सोने के गहनों में सोना व्याप्त है, वैसे ही संसार के हर कण में परमात्मा व्याप्त है।
तिष्ठसि (Tishthasi) स्थित हैं / विराजमान हैं यह परमात्मा की नित्यता को दर्शाता है। वे केवल सृष्टा नहीं हैं, बल्कि वे सृष्टि के भीतर स्थित होकर उसका पोषण भी कर रहे हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता का दसवाँ अध्याय 'विभूति योग' एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ है। इससे ठीक पहले, नौवें अध्याय में भगवान ने अपने 'राजविद्या राजगुह्य योग' का वर्णन किया था, जहाँ उन्होंने अपनी परम गोपनीयता को प्रकट किया। दसवें अध्याय के प्रारंभ में, भगवान स्वयं अर्जुन से कहते हैं कि "न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः" (मेरी उत्पत्ति को न देवता जानते हैं और न ही महर्षि)। जब अर्जुन यह सुनता है कि भगवान ही सबके आदि कारण हैं, तो उसके भीतर एक गहरी जिज्ञासा उत्पन्न होती है।

महाभारत का संदर्भ: कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में, अर्जुन मोहग्रस्त था, लेकिन जैसे-जैसे संवाद आगे बढ़ा, उसका मोह ज्ञान में बदलने लगा। श्लोक 16 तक पहुँचते-पहुँचते, अर्जुन को यह पूर्ण विश्वास हो गया है कि कृष्ण ही साक्षात् परब्रह्म हैं। वह पिछले श्लोक (10.15) में कह चुका है कि "स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम" (हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने आप से अपने को जानते हैं)। अब अर्जुन की समस्या यह है कि वह इस अनंत परमात्मा का ध्यान कैसे करे? एक साधारण मनुष्य का मन अनंत पर एकाग्र नहीं हो सकता, उसे किसी आलंबन या प्रतीक की आवश्यकता होती है।

विभूति का अर्थ और महत्व: 'विभूति' शब्द 'वि' (विशेष) और 'भूति' (सत्ता या ऐश्वर्य) से बना है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान की अनंत शक्तियाँ हैं, लेकिन उनमें से जो मुख्य हैं, जिनके माध्यम से उनकी उपस्थिति का आभास होता है, उन्हें विभूति कहा जाता है। अर्जुन यहाँ श्रीकृष्ण से प्रार्थना कर रहा है कि वे अपनी उन मुख्य विभूतियों को बताएँ जिनके माध्यम से अर्जुन उन्हें इस संसार में देख सके। यह ठीक वैसा ही है जैसे हम बिजली को नहीं देख सकते, लेकिन जलते हुए बल्ब या चलते हुए पंखे के माध्यम से उसकी शक्ति का अनुभव करते हैं।

वैदिक दृष्टिकोण: उपनिषदों में कहा गया है - "ईशा वास्यमिदं सर्वं" (यह सब ईश्वर से व्याप्त है)। अर्जुन इसी उपनिषदिक सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव करना चाहता है। वह चाहता है कि कृष्ण उसे वह 'दृष्टि' दें जिससे वह सामान्य वस्तुओं में भी दिव्यता का दर्शन कर सके। यह श्लोक भक्ति मार्ग और ज्ञान मार्ग का एक सुंदर संगम है, जहाँ भक्त अपने ज्ञान की प्यास बुझाने के लिए भगवान के चरणों में निवेदन करता है। इसी निवेदन के उत्तर में भगवान आगे चलकर प्रसिद्ध 'विभूति विस्तार' करते हैं, जहाँ वे कहते हैं कि "मैं शस्त्रधारियों में राम हूँ, नदियों में गंगा हूँ और विद्याओं में अध्यात्म विद्या हूँ।"

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • 1
    मानसिक शांति और स्थिरता: इस श्लोक के भाव में डूबने से मन को यह बोध होता है कि सब कुछ ईश्वर के नियंत्रण में है, जिससे चिंता और तनाव कम होता है।
  • 2
    एकाग्रता में वृद्धि: भगवान की विभूतियों का चिंतन करने से ध्यान (Meditation) की शक्ति बढ़ती है, क्योंकि मन को एक दिव्य आलंबन मिल जाता है।
  • 3
    अहंकार का नाश: जब हम यह समझते हैं कि संसार की हर महानता और विशेषता भगवान की ही देन है, तो हमारे भीतर का व्यक्तिगत अहंकार स्वतः समाप्त होने लगता है।
  • 4
    सकारात्मक ऊर्जा का संचार: "दिव्या ह्यात्मविभूतयः" का उच्चारण वातावरण में एक पवित्र कंपन पैदा करता है, जो नकारात्मकता को दूर करता है।
  • 5
    भक्ति भाव की प्रगाढ़ता: यह श्लोक साधक के हृदय में भगवान के प्रति प्रेम और श्रद्धा को बढ़ाता है, जिससे शरणागति का भाव सुदृढ़ होता है।
  • 6
    दृष्टिकोण में परिवर्तन: इस श्लोक के निरंतर मनन से व्यक्ति संसार को केवल भौतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से देखना शुरू कर देता है।
  • 7
    कर्मों की शुद्धि: जब हम हर कार्य में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करते हैं, तो हमारे हाथों से होने वाले कर्म स्वतः ही सात्विक और शुद्ध हो जाते हैं।
  • 8
    भय से मुक्ति: यह जानकर कि भगवान सर्वव्यापी हैं और वे हर स्थिति में हमारे साथ हैं, साधक के मन से मृत्यु और अज्ञात का भय निकल जाता है।
  • 9
    दिव्य कृपा की प्राप्ति: अर्जुन की तरह जिज्ञासा भाव से भगवान को पुकारने पर साधक को ईश्वरीय मार्गदर्शन और अंतःप्रेरणा प्राप्त होती है।
  • 10
    आत्म-साक्षात्कार का मार्ग: विभूतियों को समझना आत्म-साक्षात्कार की पहली सीढ़ी है, जो अंततः मोक्ष की ओर ले जाती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह लेख 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत आता है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के शाश्वत सिद्धांतों और महान आचार्यों की टीकाओं (जैसे आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और श्रील प्रभुपाद) के आधार पर संकलित किया गया है। यहाँ प्रस्तुत व्याख्या का उद्देश्य पाठकों को गीता के दार्शनिक पहलुओं से परिचित कराना है। इस श्लोक का मुख्य संदेश ईश्वर की सर्वव्यापकता (Omnipresence) को स्वीकार करना है। यह सामग्री धार्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन और विद्वानों के परामर्श के पश्चात तैयार की गई है ताकि भक्तगण अपनी आध्यात्मिक यात्रा में इसका लाभ उठा सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

'विभूति' का अर्थ है भगवान का वह विशेष ऐश्वर्य या वैभव जो उनकी उपस्थिति को प्रकट करता है। सामान्य शक्तियाँ प्रकृति के नियमों के अधीन कार्य करती हैं, लेकिन विभूति वह बिंदु है जहाँ प्रकृति की सीमा समाप्त होती है और दिव्यता का प्रत्यक्ष दर्शन होता है। उदाहरण के लिए, प्रकाश सूर्य की शक्ति है, लेकिन सूर्य की वह प्रखरता जो जीवन का आधार है, भगवान की विभूति है। यह साधक को दृश्य जगत के माध्यम से अदृश्य परमात्मा तक पहुँचाने का एक माध्यम है।

अर्जुन एक अनन्य भक्त है और भक्त के लिए भगवान की महिमा सुनना अमृत के समान है। "अशेषेण" शब्द का प्रयोग अर्जुन की उस प्यास को दर्शाता है जो कभी नहीं बुझती। वह चाहता है कि वह जीवन के हर क्षेत्र में, हर वस्तु में और हर परिस्थिति में केवल कृष्ण को ही देखे। वह कोई भी ऐसा कोना नहीं छोड़ना चाहता जहाँ उसे ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव न हो। यह पूर्ण शरणागति और जिज्ञासा का प्रतीक है।

तार्किक रूप से, भगवान अनंत हैं और उनकी विभूतियाँ भी अनंत हैं। स्वयं भगवान आगे के श्लोकों में कहते हैं कि "नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप" (मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं है)। इसलिए, एक सीमित बुद्धि वाला मनुष्य उन्हें पूर्णतः नहीं जान सकता। हालाँकि, भगवान अपनी मुख्य विभूतियों का वर्णन करते हैं ताकि मनुष्य उनके माध्यम से परमात्मा के विराट स्वरूप का अनुमान लगा सके और उन पर ध्यान केंद्रित कर सके।

आज के भागदौड़ भरे जीवन में हम अक्सर अकेलापन और तनाव महसूस करते हैं। यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि ईश्वर "व्याप्य तिष्ठसि" (सब कुछ व्याप्त करके स्थित) हैं। जब हम प्रकृति की सुंदरता, किसी व्यक्ति की प्रतिभा या किसी महान कार्य को देखते हैं, तो हमें उसे भगवान की विभूति मानकर सम्मान देना चाहिए। यह दृष्टिकोण हमें ईर्ष्या से बचाता है और हमारे भीतर कृतज्ञता (Gratitude) का भाव पैदा करता है, जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है।

शास्त्रों के अनुसार, भगवान की महिमा का श्रवण (श्रावणम्) भक्ति के नौ प्रकारों में प्रथम है। विभूति योग को सुनने से बुद्धि सूक्ष्म होती है और हृदय शुद्ध होता है। यह हमारे संशय को दूर करता है और हमें यह विश्वास दिलाता है कि हम कभी अकेले नहीं हैं। यह श्रवण हमारे पूर्व जन्मों के पापों का शमन करता है और हमें भक्ति के उच्च स्तर पर ले जाता है, जहाँ हम संसार की हर वस्तु में परमात्मा के दर्शन करने में सक्षम हो जाते हैं।

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श्रीमद्भगवद्गीता के संदेश को जन-जन तक पहुँचाने का एक विनम्र प्रयास।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अर्जुन विनम्र निवेदन करते हैं: "आप सम्पूर्ण रूप से अपनी उन दिव्य विभूतियों को कहने की कृपा करें, जिन विभूतियों से आप इन सब लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं।"

Arjuna, having recognized Krishna's supreme position, humbly requests a detailed description of His divine manifestations. He understands that only the Lord Himself can fully reveal His own glories.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 16 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 16/42 38% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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