पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदश्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
आप सम्पूर्ण रूप से अपनी उन दिव्य विभूतियों को कहने की कृपा करें, जिन विभूतियों से आप इन सब लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय, जिसे 'विभूति योग' के नाम से जाना जाता है, का यह 16वाँ श्लोक आध्यात्मिक जिज्ञासा की पराकाष्ठा है। यहाँ अर्जुन, जो अब पूरी तरह से शरणागत भक्त की भूमिका में है, भगवान श्रीकृष्ण से उनकी उन दिव्य शक्तियों और ऐश्वर्यों के बारे में विस्तार से बताने का आग्रह करता है, जिनसे उन्होंने समस्त ब्रह्मांड को व्याप्त कर रखा है। यह श्लोक केवल एक प्रश्न नहीं है, बल्कि एक साधक की उस तड़प का प्रतीक है जो अपने आराध्य को कण-कण में देखने की इच्छा रखता है।
सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि ईश्वर केवल मंदिरों या मूर्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह 'विभूति' के रूप में इस दृश्य जगत के हर उत्कृष्ट तत्व में विद्यमान है। जब हम सूर्य की प्रखरता, हिमालय की स्थिरता या गंगा की पवित्रता को देखते हैं, तो वास्तव में हम भगवान की ही विभूतियों का दर्शन कर रहे होते हैं। अर्जुन का यह अनुरोध "वक्तुमर्हस्यशेषेण" (पूर्ण रूप से कहने की कृपा करें) यह दर्शाता है कि दिव्य ज्ञान की कोई सीमा नहीं है और एक सच्चा जिज्ञासु कभी भी भगवान की महिमा सुनने से तृप्त नहीं होता। इस लेख में हम इस श्लोक के गूढ़ अर्थों, इसके दार्शनिक आधार और हमारे दैनिक जीवन में इसकी प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह यात्रा हमें अज्ञान के अंधकार से निकालकर ईश्वरीय प्रकाश की ओर ले जाने वाली है, जहाँ हम समझेंगे कि कैसे परमात्मा अपनी अनंत शक्तियों के माध्यम से इस चराचर जगत का संचालन कर रहे हैं।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
॥ मूल संस्कृत श्लोक ॥
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥ १६ ॥
पदच्छेद एवं उच्चारण (Transliteration)
vaktum-arhasy-aśeṣeṇa divyā hyātma-vibhūtayaḥ |
yābhir-vibhūtibhir-lokān-imāṃstvaṃ vyāpya tiṣṭhasi || 16 ||
सरल हिंदी काव्यानुवाद
"हे प्रभु! अपनी दिव्य विभूतियाँ, विस्तार से आप सुनाइये,
जिन शक्तियों से व्याप्त जग को, आप ही बस छाइये।
अशेष रूप से वर्णन करें, अपनी महिमा का गान करें,
लोक-लोकान्तर में व्याप्त प्रभु, अपना दर्शन दान करें।"
पाठ की विधि:
इस श्लोक का पाठ विशेष रूप से एकाग्रता और भक्ति भाव को बढ़ाने के लिए किया जाता है। साधक को चाहिए कि वह प्रातः काल स्नान के पश्चात, शुद्ध आसन पर बैठकर, भगवान श्रीकृष्ण के 'विश्वरूप' या 'मुरलीधर' स्वरूप का ध्यान करते हुए इस श्लोक का 11 या 21 बार जाप करे। यह पाठ मानसिक शांति और ईश्वर की सर्वव्यापकता का अनुभव कराने में अत्यंत सहायक सिद्ध होता है।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)
श्रीमद्भगवद्गीता का दसवाँ अध्याय 'विभूति योग' एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ है। इससे ठीक पहले, नौवें अध्याय में भगवान ने अपने 'राजविद्या राजगुह्य योग' का वर्णन किया था, जहाँ उन्होंने अपनी परम गोपनीयता को प्रकट किया। दसवें अध्याय के प्रारंभ में, भगवान स्वयं अर्जुन से कहते हैं कि "न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः" (मेरी उत्पत्ति को न देवता जानते हैं और न ही महर्षि)। जब अर्जुन यह सुनता है कि भगवान ही सबके आदि कारण हैं, तो उसके भीतर एक गहरी जिज्ञासा उत्पन्न होती है।
महाभारत का संदर्भ: कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में, अर्जुन मोहग्रस्त था, लेकिन जैसे-जैसे संवाद आगे बढ़ा, उसका मोह ज्ञान में बदलने लगा। श्लोक 16 तक पहुँचते-पहुँचते, अर्जुन को यह पूर्ण विश्वास हो गया है कि कृष्ण ही साक्षात् परब्रह्म हैं। वह पिछले श्लोक (10.15) में कह चुका है कि "स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम" (हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने आप से अपने को जानते हैं)। अब अर्जुन की समस्या यह है कि वह इस अनंत परमात्मा का ध्यान कैसे करे? एक साधारण मनुष्य का मन अनंत पर एकाग्र नहीं हो सकता, उसे किसी आलंबन या प्रतीक की आवश्यकता होती है।
विभूति का अर्थ और महत्व: 'विभूति' शब्द 'वि' (विशेष) और 'भूति' (सत्ता या ऐश्वर्य) से बना है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान की अनंत शक्तियाँ हैं, लेकिन उनमें से जो मुख्य हैं, जिनके माध्यम से उनकी उपस्थिति का आभास होता है, उन्हें विभूति कहा जाता है। अर्जुन यहाँ श्रीकृष्ण से प्रार्थना कर रहा है कि वे अपनी उन मुख्य विभूतियों को बताएँ जिनके माध्यम से अर्जुन उन्हें इस संसार में देख सके। यह ठीक वैसा ही है जैसे हम बिजली को नहीं देख सकते, लेकिन जलते हुए बल्ब या चलते हुए पंखे के माध्यम से उसकी शक्ति का अनुभव करते हैं।
वैदिक दृष्टिकोण: उपनिषदों में कहा गया है - "ईशा वास्यमिदं सर्वं" (यह सब ईश्वर से व्याप्त है)। अर्जुन इसी उपनिषदिक सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव करना चाहता है। वह चाहता है कि कृष्ण उसे वह 'दृष्टि' दें जिससे वह सामान्य वस्तुओं में भी दिव्यता का दर्शन कर सके। यह श्लोक भक्ति मार्ग और ज्ञान मार्ग का एक सुंदर संगम है, जहाँ भक्त अपने ज्ञान की प्यास बुझाने के लिए भगवान के चरणों में निवेदन करता है। इसी निवेदन के उत्तर में भगवान आगे चलकर प्रसिद्ध 'विभूति विस्तार' करते हैं, जहाँ वे कहते हैं कि "मैं शस्त्रधारियों में राम हूँ, नदियों में गंगा हूँ और विद्याओं में अध्यात्म विद्या हूँ।"
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ
यह लेख 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत आता है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के शाश्वत सिद्धांतों और महान आचार्यों की टीकाओं (जैसे आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और श्रील प्रभुपाद) के आधार पर संकलित किया गया है। यहाँ प्रस्तुत व्याख्या का उद्देश्य पाठकों को गीता के दार्शनिक पहलुओं से परिचित कराना है। इस श्लोक का मुख्य संदेश ईश्वर की सर्वव्यापकता (Omnipresence) को स्वीकार करना है। यह सामग्री धार्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन और विद्वानों के परामर्श के पश्चात तैयार की गई है ताकि भक्तगण अपनी आध्यात्मिक यात्रा में इसका लाभ उठा सकें।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
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श्रीमद्भगवद्गीता के संदेश को जन-जन तक पहुँचाने का एक विनम्र प्रयास।श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
अर्जुन विनम्र निवेदन करते हैं: "आप सम्पूर्ण रूप से अपनी उन दिव्य विभूतियों को कहने की कृपा करें, जिन विभूतियों से आप इन सब लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं।"
Arjuna, having recognized Krishna's supreme position, humbly requests a detailed description of His divine manifestations. He understands that only the Lord Himself can fully reveal His own glories.