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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 10 · श्लोक 15

अध्याय 10 · श्लोक 15

विभूति योग (Vibhuti Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम | भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते || १५||

svayam evātmanātmānaṃ vettha tvaṃ puruṣottama | bhūta-bhāvana bhūteśa devadeva jagat-pate ||15||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

स्वयम्: स्वयं; एव: ही; आत्मना: अपने से; आत्मानम्: अपने को; वेत्थ: जानते हो; त्वम्: आप; पुरुषोत्तम: हे पुरुषोत्तम; भूत-भावन: हे भूतों को उत्पन्न करने वाले; भूतेश: हे भूतों के ईश्वर; देवदेव: हे देवों के देव; जगत्-पते: हे जगत के स्वामी।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने आप को अपने से जानते हैं। हे भूतभावन! हे भूतेश! हे देवदेव! हे जगत्पते!

English Translation

Verily, You Yourself know Yourself by Yourself, O Supreme Person, O source and Lord of beings, O God of gods, O ruler of the world!

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

Arjuna addresses Krishna with multiple exalted titles, acknowledging His supreme position. He recognizes that only Krishna Himself can fully know His own divine nature. This verse beautifully expresses the transcendence of the Lord — He is self-luminous and self-knowing.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।