श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 14

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 41 मिनट का पठन 127 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव | न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः || १४||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

17 पद
सर्वम्
सब
एतत्
यह
ऋतम्
सत्य
मन्ये
मानता हूँ
यत्
जो
माम्
मुझसे
वदसि
कहते हो
केशव
हे केशव
न
नहीं
हि
ही
ते
आपकी
भगवन्
हे भगवन्
व्यक्तिम्
प्रकट स्वरूप को
विदु
जानते हैं
देवा
देवता
न
न
दानवाः
दानव।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे केशव! आप मुझसे जो कुछ कहते हैं, वह सब मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्! आपके प्रकट स्वरूप को न तो देवता जानते हैं और न दानव ही।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भारतीय सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान केवल एक धार्मिक ग्रंथ का नहीं, बल्कि साक्षात् ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र का है। यह ग्रंथ मानव जीवन के समस्त संशयों का निवारण करने वाला वह दिव्य प्रकाशपुंज है, जो घोर अंधकार में फंसे मनुष्य को परम शांति और मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय, जिसे 'विभूतियोग' की संज्ञा दी गई है, उसमें भगवान श्री कृष्ण ने अपनी अनंत ऐश्वर्ययुक्त विभूतियों और ब्रह्मांडीय रूपों का विस्तार से वर्णन किया है। अर्जुन जो कि केवल एक श्रेष्ठ धनुर्धर ही नहीं, बल्कि भगवान के परम सखा और अनन्य भक्त भी हैं, वे अपने आराध्य के इन वचनों को पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ श्रवण करते हैं। प्रस्तुत श्लोक—"सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव..."—अर्जुन की अनन्य श्रद्धा, संपूर्ण समर्पण और भगवान के प्रति अगाध प्रेम की पराकाष्ठा को प्रदर्शित करता है।

इस श्लोक का सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय महत्व अत्यंत व्यापक है। जब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगशक्ति और विभूतियों का दिग्दर्शन कराया, तो अर्जुन ने बिना किसी तार्किक संशय के यह स्वीकार किया कि हे केशव! आप जो कुछ भी कह रहे हैं, वह सब सत्य (ऋत) है। इस प्रसंग में 'ऋत' शब्द का प्रयोग अत्यंत गहरा दार्शनिक अर्थ रखता है, जिसका तात्पर्य उस शाश्वत सत्य से है जो त्रिकाल अवाधित है—यानी जो भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों में अपरिवर्तनीय है। इसके साथ ही, अर्जुन यह भी स्वीकार करते हैं कि भगवान के इस परम और वास्तविक स्वरूप को न तो देवता भली-भांति जानते हैं और न ही दानव। यह इस बात का प्रतीक है कि भगवान का वास्तविक ऐश्वर्य बौद्धिक तर्कों या केवल भौतिक इंद्रियों की पकड़ से परे है। इसे जानने का एकमात्र मार्ग केवल उनकी अहैतुकी कृपा (भक्ति और शरणागति) ही है।

भक्ति लोक (Bhaktilok.in) के इस विशेष आध्यात्मिक अंक में हम इसी महान श्लोक का शास्त्रीय, दार्शनिक और व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि साधकगण इसके मर्म को समझकर अपने जीवन को कृतार्थ कर सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अथ श्रीमद्भगवद्गीता दशमोध्यायः (विभूतियोग) - श्लोक १४

सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः।। १४।।


श्लोकोच्चारण एवं पाठ की विधि:

इस पावन श्लोक का पाठ करने से पूर्व साधक को पवित्र होकर शांत मन से आसन पर बैठना चाहिए। श्लोक का उच्चारण शुद्ध संस्कृत व्याकरण और स्वर-लहरी के साथ करना चाहिए। प्रतिदिन प्रातःकाल स्नानोपरांत भगवान श्री कृष्ण के विग्रह अथवा चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर इस श्लोक का कम से कम 108 बार (एक माला) जप करने से मन में उत्पन्न होने वाले समस्त संशय और भय दूर होते हैं। यह श्लोक साधक को पूर्ण समर्पण (शरणागति) का मार्ग दिखाता है, अतः इसका पाठ करते समय हृदय में पूर्ण निष्ठा और भक्ति भाव होना अनिवार्य है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक पद में वेदों और उपनिषदों का सार छिपा हुआ है। आइए, इसके एक-एक शब्द के अर्थ और उसके दार्शनिक निहितार्थ को समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
सर्वम् सब कुछ भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कही गई समस्त विभूतियाँ, योग-ऐश्वर्य और ब्रह्मांडीय सत्य।
एतत् यह (जो आपने कहा) वर्तमान प्रसंग में भगवान द्वारा बताई गई उनकी अनंत और असीम शक्तियाँ।
ऋतम् सत्य, शाश्वत सत्य वह सत्य जो तार्किक सीमाओं से परे है और त्रिकाल (भूत, भविष्य, वर्तमान) में कभी नहीं बदलता।
मन्ये मैं मानता हूँ / स्वीकार करता हूँ अर्जुन की बौद्धिक स्वीकृति और उनके अगाध विश्वास का प्रत्यक्ष प्रमाण।
यत् जो कुछ भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन के प्रति व्यक्त किए गए उपदेश और रहस्य।
माम् मुझसे / मुझे (श्रीकृष्ण को) वह सगुण रूपधारी परम ब्रह्म, जो साक्षात् अर्जुन के सारथी बने हुए हैं।
वदसि आप कहते हैं भगवान के मुख से निःसृत होने वाली वाणी, जो साक्षात् उपनिषदों का सार है।
केशव हे केशव! (कृष्ण का नाम) वह महाबाहु जिन्होंने 'केशी' नामक असुर का वध किया था तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव को भी अपने अधीन रखते हैं।
न हि न ही निश्चित रूप से पूर्ण निषेध, जो यह दर्शाता है कि सांसारिक बुद्धि से भगवान को समझना असंभव है।
ते आपकी भगवान श्रीकृष्ण के अलौकिक और वास्तविक स्वरूप की दिव्यता।
भगवन् हे भगवान! (ऐश्वर्ययुक्त) ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य—इन छहों भगवत् स्वरूपों से युक्त परम सत्ता।
व्यक्तिम् वास्तविक प्रकटीकरण / स्वरूप भगवान के मूल स्वरूप और उनकी अचिंत्य शक्ति का वास्तविक रहस्य।
विदुः जानते हैं पूर्ण ज्ञान या साक्षात्कार करने की क्षमता रखना।
देवाः स्वर्ग के देवता (इंद्र, वरुण आदि) उच्च लोकवासी celestial beings, जो भौतिक शक्तियों के स्वामी हैं परंतु ब्रह्मज्ञान में सीमित हैं।
न दानवाः और न ही दानव / असुर असुरी वृत्तियों या भौतिकवादी बुद्धि वाले प्राणी, जो केवल भोग और शक्ति में लीन रहते हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय की पृष्ठभूमि महाभारत के महासमर से जुड़ी हुई है। जब कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने थीं, तब अर्जुन अपने सगे-सम्बन्धियों को देखकर भीषण मोह और विषाद से घिर गए थे। उनके गांडीव धनुष हाथ से छूटने लगे थे और अंतःकरण में भारी उथल-पुथल मची थी। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन, मर्म, कर्म, और धर्म का उपदेश दिया। इसी क्रम में, अध्याय 10 (विभूतियोग) में अर्जुन ने भगवान से यह जानने की इच्छा व्यक्त की कि हे योगेश्वर! मैं किस-किस प्रकार से आपका निरंतर चिंतन करूँ और किन-किन भावों में आप मुझे स्मरण करने योग्य हैं?

अर्जुन के इस प्रश्न के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अनगिनत विभूतियों का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि—'अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः' (हे अर्जुन! मैं समस्त भूतों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ), वे वेदों में सामवेद हैं, देवताओं में इंद्र हैं, नक्षत्रों में चंद्रमा हैं और जल स्रोतों में समुद्र हैं। भगवान ने अपनी शक्तियों का जब यह विराट परिचय दिया, तो साधारण मानव बुद्धि चकरा सकती थी। परंतु अर्जुन की निर्मल बुद्धि और भगवान के प्रति उनकी अनन्य भक्ति ने तुरंत यह पहचान लिया कि उनके समक्ष कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि साक्षात् परमब्रह्म नारायण खड़े हैं।

पुराणों और वेदों में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि भगवान के वास्तविक स्वरूप को जान पाना ब्रह्मा और शिव जैसे महान देवताओं के लिए भी सहज नहीं है, तो फिर साधारण मनुष्यों या दानवों की तो बात ही क्या है! श्रीमद्भागवत महापुराण और अन्य स्मृतियों में बार-बार इस बात पर बल दिया गया है कि ईश्वर को तर्कों या बौद्धिक चातुर्य से नहीं जीता जा सकता। देवतागण भी यज्ञ और अनुष्ठानों के माध्यम से केवल भगवान के एक आंशिक स्वरूप (ऐश्वर्य) का ही अनुभव कर पाते हैं, जबकि उनका मूल और अंतरंग स्वरूप केवल 'भक्ति' और 'शरणागति' के द्वारा ही प्रकट होता है। अर्जुन का यह कथन—"न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः"—इसी शास्त्रीय और पौराणिक सत्य की सबसे बड़ी पुष्टि करता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

आध्यात्मिक एवं मानसिक उत्थान के बिंदु

  • 1. अहंकार का शमन (Ego Dissolution): यह श्लोक साधक को यह सिखाता है कि मनुष्य की बुद्धि कितनी भी तीव्र क्यों न हो, वह ईश्वर की विराटता को पूरी तरह नहीं माप सकती। इसके नियमित पाठ से अहंकार स्वतः समाप्त हो जाता है।
  • 2. परम शरणागति (Complete Surrender): अर्जुन की तरह भगवान के प्रति पूर्ण विश्वास जगाने से साधक के जीवन में 'शरणागति' का भाव प्रबल होता है, जिससे सभी प्रकार के मानसिक तनाव और चिंताएं दूर हो जाती हैं।
  • 3. बौद्धिक संशयों का निवारण: जीवन में आने वाले दार्शनिक और मानसिक संशयों से मुक्ति पाने के लिए यह श्लोक एक अचूक औषधि का कार्य करता है। यह मन को स्थिरता प्रदान करता है।
  • 4. सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura): इस श्लोक का शुद्ध उच्चारण और इसका मर्म समझने से साधक के आसपास एक उच्च कोटि के सात्विक आवरण (Positive Energy Field) का निर्माण होता है।

कर्मिक शुद्धि और भगवत्कृपा

  • 5. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification): भगवद्गीता के वचनों को सत्य मानना और उनका मनन करना पिछले जन्मों के संचित पापों और नकारात्मक कर्म संस्कारों को धोने का कार्य करता है।
  • 6. अहैतुकी भगवत्कृपा की प्राप्ति: जब भक्त यह स्वीकार करता है कि भगवान ही सब कुछ हैं और वही सत्य हैं, तो भगवान भी उस पर अपनी विशेष कृपा दृष्टि बरसाते हैं (जैसा कि श्लोक में 'ऋतं मन्ये' से स्पष्ट है)।
  • 7. ध्यान और एकाग्रता में वृद्धि: इस श्लोक का जप करने से चित्त की वृत्तियों पर नियंत्रण स्थापित होता है, जिससे ध्यान (Meditation) की गहरी अवस्था प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
  • 8. आंतरिक शांति और अभयता: जो व्यक्ति यह जान लेता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड का नियंत्रण उस परमेश्वर के हाथ में है और उनका स्वरूप सत्य है, वह जीवन की हर परिस्थिति में भयमुक्त और शांत रहता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता (शंकराचार्य भाष्य एवं रामानुज भाष्य के संदर्भों सहित) तथा सनातन धर्म के सनातन ग्रंथों के गहन अध्ययन पर आधारित है। हमारी संपादकीय नीति के अनुसार, प्रत्येक धार्मिक और दार्शनिक प्रसंग को पूरी प्रमाणिकारिता और शैक्षणिक गरिमा के साथ पाठकों तक पहुँचाया जाता है। यह 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' (Editorially crafted content) इस बात का विशेष ध्यान रखती है कि पाठकों को वेदों और पुराणों का सटीक संदेश मिले, जिससे उनकी आध्यात्मिक यात्रा सरल और प्रामाणिक बन सके। हमारे विद्वान पंडितों और संस्कृत भाषाविदों द्वारा इस श्लोक के प्रत्येक शब्द के मूलार्थ को आधुनिक संदर्भों से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है, ताकि आज की युवा पीढ़ी भी सनातन ज्ञान के इस अमृत का पान कर सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: सनातन संस्कृति में 'ऋत' शब्द उस शाश्वत, अपरिवर्तनीय और ब्रह्मांडीय सत्य को कहा जाता है जो त्रिकाल अवाधित है—यानी जो भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों में एक जैसा रहता है। जब अर्जुन कहते हैं कि "सर्वमेतदृतं मन्ये" (मैं आपके द्वारा कही गई हर बात को 'ऋत' यानी परम सत्य मानता हूँ), तो उनका तात्पर्य यह होता है कि भगवान श्रीकृष्ण के वचन किसी कल्पना या संप्रदाय तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सृष्टि के मूल नियम और शाश्वत सत्य हैं।

उत्तर: इसका कारण यह है कि भगवान का मूल स्वरूप अचिंत्य, अनंत और अपार है। देवतागण स्वर्ग के उच्च लोकों के स्वामी हैं और दानव अपनी भौतिक तथा असुरी शक्तियों में मतवाले रहते हैं, परंतु इन दोनों की ही बुद्धि माया के आवरण से ब बंधी होती है। कोई भी सीमित बुद्धि वाला प्राणी (चाहे वह कितना भी शक्तिशाली देवता क्यों न हो) असीमित परमब्रह्म के पूर्ण विस्तार को अपने बौद्धिक धरातल पर नहीं माप सकता। भगवान को केवल उनकी अपनी कृपा और अनन्य भक्ति के द्वारा ही जाना जा सकता है।

उत्तर: इस श्लोक का नियमित स्मरण करने से मनुष्य के मन का अहंकार और बौद्धिक दंभ समाप्त होता है। यह साधक के भीतर भगवान के प्रति पूर्ण शरणागति और विश्वास पैदा करता है। जीवन की कठिन परिस्थितियों में जब सारे तार्किक उपाय असफल हो जाते हैं, तब यह श्लोक साधक को यह याद दिलाता है कि सब कुछ उस परमेश्वर की व्यवस्था के अंतर्गत हो रहा है, जिससे मन को असीम शांति और अभयता प्राप्त होती है।

उत्तर: दशम अध्याय का मुख्य उद्देश्य साधक के मन में भगवान की सर्वव्यापकता (Omnipresence) के भाव को स्थापित करना है। जब मनुष्य यह देखता है कि इस संसार की हर श्रेष्ठ, सुंदर, शक्तिशाली और तेजस्वी वस्तु या गुण में वास्तव में भगवान की ही शक्ति का प्रकटीकरण है, तो वह हर जगह ईश्वर के दर्शन करने लगता है। यह अध्याय साधक को साधारण दृष्टि से हटाकर दिव्य दृष्टि (Cosmic Vision) प्रदान करता है।

उत्तर: नहीं, श्रीमद्भगवद्गीता के किसी भी श्लोक के पाठ या जप के लिए किसी प्रकार की कठोर दीक्षा या जटिल अनुष्ठान की अनिवार्यता नहीं है। इसे कोई भी व्यक्ति पूरी श्रद्धा, पवित्रता और भक्ति भाव के साथ पढ़ सकता है। भगवद्गीता सार्वभौमिक ग्रंथ है, और इसके श्लोक मात्र से ही भगवान श्रीकृष्ण की अहैतुकी कृपा सुलभ हो जाती है। आवश्यकता केवल निर्मल अंतःकरण और सच्चे प्रेम की है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अर्जुन कहते हैं: "हे केशव! आप मुझसे जो कुछ कहते हैं, वह सब मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्! आपके प्रकट स्वरूप को न तो देवता जानते हैं और न दानव ही।"

Arjuna's faith is not blind but based on the realization of Krishna's divine nature. He understands that the Lord's true manifestation is beyond the comprehension of even the highest celestial beings, accessible only through divine grace.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 14 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 14/42 33% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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पंचांग
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