श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 13

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 42 मिनट का पठन 128 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा | असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे || १३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
आहु
कहते हैं
त्वाम्
आपको
ऋषयः
ऋषि
सर्वे
सभी
देवर्षि
देवर्षि
नारद
नारद
तथा
तथा
असित
असित
देवल
देवल
व्यास
व्यास
स्वयम्
स्वयं
च
और
एव
ही
ब्रवीषि
कहते हैं
मे
मुझसे।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

सभी ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल और व्यास भी आपको ऐसा ही कहते हैं, और अब स्वयं आप भी मुझसे यही कह रहे हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

प्रस्तावना: वेदों, ऋषियों और साक्षात् परमेश्वर की वाणी का समन्वय

सनातन धर्म की सनातन परंपरा में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ मात्र नहीं, बल्कि साक्षात् उपनिषदों का सार माना गया है। गीता का प्रत्येक श्लोक मानव जीवन के सबसे गहरे दार्शनिक प्रश्नों का उत्तर प्रदान करता है। विशेषकर श्रीमद्भगवद्गीता का दसवां अध्याय, जिसे 'विभूतियोग' की संज्ञा दी गई है, साधक को यह बोध कराता है कि इस चराचर जगत में जो कुछ भी ऐश्वर्ययुक्त, कांतिवान, शक्तिसंपन्न और पवित्र है, वह सब भगवान श्री कृष्ण की ही असीम विभूतियों का विस्तार है। जब अर्जुन भगवान श्री कृष्ण के विराट रूप और उनकी अनन्त विभूतियों के दर्शन करते हैं, तो उनके अंतःकरण में अगाध श्रद्धा, विस्मय और पूर्ण समर्पण का भाव उमड़ पड़ता है।

इस पवित्र मार्ग पर आगे बढ़ते हुए, प्रस्तुत श्लोक "आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा | असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे || १३||" इस बात की पराकाष्ठा है कि कैसे एक सच्चे जिज्ञासु और भक्त (अर्जुन) को भगवान के परम सत्य को स्वीकार करने के लिए न केवल अपनी आंतरिक अनुभूति होती है, बल्कि प्राचीन काल के महान ब्रह्मज्ञानी ऋषियों की साक्षी भी प्राप्त होती है। भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति में 'आचार्यवान पुरुषो वेद' अर्थात् आचार्य के माध्यम से ही सत्य की पूर्ण प्राप्ति होती है, का यह जीवंत उदाहरण है। देवर्षि नारद, महर्षि असित, महर्षि देवल और वेदव्यास जैसे त्रिकालदर्शी ऋषि इस ब्रह्मांड के मूल सत्य को जानते थे और उन्होंने श्री कृष्ण को साक्षात् परब्रह्म के रूप में स्वीकार किया था। जब अर्जुन इन सभी महान आचार्यों के वचनों को उद्धृत करते हुए भगवान से कहते हैं कि "अब आप स्वयं भी मेरे लिए वही बात कह रहे हैं", तो यह श्लोक प्रमाणिकता के उस सर्वोच्च शिखर को छू लेता है जहाँ संदेह का कोई स्थान नहीं रहता। यह आलेख इसी दिव्य श्लोक के शाब्दिक, दार्शनिक, पौराणिक और व्यावहारिक पक्षों का एक विस्तृत और प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिससे आधुनिक युग के साधक अपने जीवन में मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति और परम चेतना का अनुभव कर सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

ॐ श्री परमात्मने नमः

अथ दशमोध्यायः - विभूतियोग

आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा।

असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे।। १३।।


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय 'आहुस्त्वाम्' का उच्चारण स्पष्ट अनुस्وار के साथ, 'ऋषयः' में विसर्ग का ध्यान रखते हुए तथा 'देवर्षिर्नारदस्तथा' को लयबद्ध तरीके से करना चाहिए। इसके नियमित पाठ से वाणी में ओज और मन में एकाग्रता बढ़ती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

यहाँ श्लोक के प्रत्येक पद का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि साधक इसके आंतरिक अर्थ को भली-भांति आत्मसात कर सकें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
आहुः (आहुस्त्वाम्) कहते हैं / ऐसा बताते हैं सत्य की सार्वभौमिक स्वीकृति; जो बात ज्ञानी महात्मा अनुभव करते हैं, उसे वाणी से व्यक्त करते हैं।
ऋषयः सर्वे सभी ऋषिगण समस्त वेदमार्गी, द्रष्टा और त्रिकालदर्शी ऋषि जो सृष्टि के गूढ़ रहस्यों से परिचित हैं।
देवर्षिः नारदः देवर्षि नारद लोक कल्याण के लिए तीनों लोकों में विचरने वाले परम भक्त और ब्रह्मज्ञानी, जिन्होंने भगवद-महिमा का गान किया।
तथा तथा / और एक मत की पुष्टि, जहाँ विभिन्न आचार्यों का ज्ञान एक ही बिंदु पर आकर केंद्रित होता है।
असितः देवलः असित और देवल ऋषि प्राचीन काल के महान तपस्वी और धर्मशास्त्री, जिनकी निष्ठा और वाक्-सिद्धता सर्वविदित थी।
व्यासः महर्षि वेदव्यास वेदों के संकलनकर्ता, महाभारत और पुराणों के रचयिता, जिन्होंने स्वयं भगवान कृष्ण के स्वरूप को लिपिबद्ध किया।
स्वयं च एव और स्वयं आप भी किसी अन्य की गवाही के बाद स्वयं परमेश्वर द्वारा अपने मुख से अपने सत्य को प्रमाणित करना।
ब्रवीषि मे मुझसे कह रहे हो अर्जुन का गुरु और सखा के रूप में भगवान से सीधे इस परम रहस्य को सुनने का सौभाग्य और कृतज्ञता।

गूढ़ार्थ: इस श्लोक में अर्जुन यह स्पष्ट कर रहे हैं कि श्री कृष्ण की दिव्यता केवल उनकी व्यक्तिगत धारणा नहीं है, बल्कि यह सनातन परंपरा के समस्त आकृतियों, द्रष्टाओं और आचार्यों द्वारा अनुशंसित अकाट्य सत्य है। जब बाहरी प्रमाण और आंतरिक अनुभूति दोनों एक हो जाएं, तो संदेह का अंधकार सदा के लिए मिट जाता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

भारतीय पुराण साहित्य में इस बात का बार-बार उल्लेख मिलता है कि भगवान विष्णु या उनके पूर्ण अवतार श्री कृष्ण का वास्तविक स्वरूप साधारण मानव बुद्धि से परे है। इसे केवल वही जान सकते हैं जिन पर उनकी कृपा होती है अथवा जो ब्रह्मर्षि और देवर्षि कोटि के महात्मा हैं। इस श्लोक में जिन महान ऋषियों का नाम आया है—देवर्षि नारद, असित, देवल और वेदव्यास—उनका सनातन संस्कृति में अद्वितीय स्थान है।

देवर्षि नारद नारायण के अनन्य भक्त और लोक-कल्याणकारी मुनि हैं। उन्होंने अपने विभिन्न संवादों में (जैसे नारद भक्ति सूत्र और पुराणों के प्रसंगों में) बार-बार यह प्रमाणित किया है कि श्री कृष्ण ही समस्त कारणों के कारण, आदि नारायण और परम पुरुष हैं। इसी प्रकार, महर्षि असित और देवल प्राचीन काल के वे महान तपस्वी थे जिन्होंने एकांत में रहकर ध्यान और योग के माध्यम से इस ब्रह्मांड के मूल तत्त्व को साक्षात देखा था। महर्षि वेदव्यास तो स्वयं भगवान नारायण के अंशा अवतार माने जाते हैं, जिन्होंने वेदों को चार भागों में विभाजित किया, अठारह पुराणों की रचना की और महाभारत जैसे महाकाव्य के माध्यम से भगवान कृष्ण के चरित्र और उनके उपदेशों को अमर कर दिया।

महाभारत के युद्ध के आरंभ से ठीक पहले, जब कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन भयंकर मोह और विषाद से घिर गए थे, तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें यह ज्ञान दिया। कुरुक्षेत्र का वह प्रांगण केवल दो सेनाओं के बीच युद्ध का स्थल नहीं था, बल्कि वह जीव और ब्रह्म के मिलन का महातीर्थ बन गया। अर्जुन का इन महान ऋषियों के वचनों को याद करना यह दर्शाता है कि वेदों और पुराणों का ज्ञान केवल किंवदंतियां नहीं हैं, बल्कि यह एक जीवंत परंपरा है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी आचार्यों के माध्यम से आगे बढ़ती है। जब अर्जुन कहते हैं कि "अब आप स्वयं भी मुझे यही बता रहे हैं", तो यह इस बात का प्रतीक है कि शास्त्र और गुरु दोनों का जब मिलन होता है, तब साधक का संशय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है और उसे आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति होती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस विशिष्ट श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके मर्म को समझना साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन लाता है:

1. मानसिक शांति और संशय मुक्ति

जीवन में जब कभी असमंजस या मानसिक द्वंद्व की स्थिति उत्पन्न हो, तो इस श्लोक का पाठ करने से बुद्धि स्थिर होती है और सही-गलत का निर्णय करने की शक्ति प्राप्त होती है।

2. सकारात्मक ऊर्जा (Positive Aura) का विकास

ऋषियों और भगवान के संवाद से जुड़े इस पवित्र मंत्र के उच्चारण से आसपास का वातावरण शुद्ध होता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर भागती है।

3. कार्मिक शुद्धि और चेतना का उत्थान

परम सत्य का स्मरण करने से पुराने कर्मों के बंधन ढीले पड़ते हैं और चेतना भौतिक स्तर से ऊपर उठकर आध्यात्मिक चेतना की ओर अग्रसर होती है।

4. गुरु परंपरा के प्रति अगाध श्रद्धा

यह श्लोक हमें आचार्यों और ऋषियों के प्रति सम्मान सिखाता है, जिससे जीवन में सच्चे मार्गदर्शक (गुरु) की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

5. भक्ति और समर्पण में वृद्धि

भगवान की सर्वव्यापकता और दिव्यता को समझकर भक्त का अहंकार गल जाता है और उसके हृदय में अनन्य भक्ति का उदय होता है।

6. एकाग्रता और स्मरण शक्ति में सुधार

संस्कृत श्लोकों के नियमित अभ्यास और उनके अर्थ पर ध्यान केंद्रित करने से मस्तिष्क की स्मरण शक्ति और एकाग्रता तीव्र होती है।

7. भय और चिंता से मुक्ति

जब साधक यह जान लेता है कि यह समस्त संसार एक सर्वोच्च शक्ति के नियंत्रण में है, तो उसके मन से मृत्यु और भविष्य का भय समाप्त हो जाता है।

8. दिव्य कृपा की प्राप्ति

गीता के ज्ञान का प्रचार और पठन करने वाले भक्तों पर भगवान श्री कृष्ण की अहैतुत कृपा और आशीर्वाद सदैव बना रहता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस विशेष आलेख को तैयार करते समय पारंपरिक सनातन ग्रंथों, श्रीमद्भगवद्गीता के मूल भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी विवेकानंद के दृष्टिकोण) का गहन अध्ययन किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों तक जो भी धार्मिक और आध्यात्मिक सामग्री पहुंचे, वह वेदों, पुराणों और ऐतिहासिक साक्ष्यों पर खरी उतरे। इस प्रक्रिया में भाषा की शुद्धता, दार्शनिक गहराई और आधुनिक संदर्भों में उसकी उपादेयता का विशेष ध्यान रखा गया है, ताकि यह मार्गदर्शिका हर आयु वर्ग के साधक के लिए उपयोगी और प्रेरणादायी बन सके।

सन्दर्भ ग्रंथ: श्रीमद्भगवद्गीता (दशम अध्याय - विभूतियोग, श्लोक १३), महाभारत (भीष्म पर्व), तथा विभिन्न पुराणों में वर्णित ऋषि परंपरा के आख्यान।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: इस श्लोक में अर्जुन ने देवर्षि नारद, असित, देवल और महर्षि वेदव्यास का उल्लेख किया है। ये सभी सनातन धर्म के परम ज्ञानी, तपस्वी और त्रिकालदर्शी ऋषि माने गए हैं। इन आचार्यों द्वारा भगवान श्री कृष्ण को परम सत्य और ईश्वर के रूप में स्वीकार किया जाना इस बात का प्रमाण है कि श्री कृष्ण की दिव्यता कोई साधारण बात नहीं, बल्कि वेदों और आचार्यों द्वारा सिद्ध सत्य है।

उत्तर: अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के मित्र और सखा भी थे। मानवीय रूप में उनके साथ रहने के कारण कभी-कभी मनुष्य की बुद्धि भ्रमित हो सकती है। इसलिए, अर्जुन प्राचीन आचार्यों और ऋषियों के वचनों को स्मरण करके यह स्पष्ट करते हैं कि वे केवल अपने मित्र से नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के आदिकारण परब्रह्म से ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं। इससे उनके भीतर अटूट विश्वास स्थापित होता है।

उत्तर: श्रीमद्भगवद्गीता का दसवां अध्याय 'विभूतियोग' कहलाता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के आग्रह पर अपनी अनंत विभूतियों (ऐश्वर्य, शक्तियों और विस्तार) का वर्णन किया है। इस अध्याय का उद्देश्य साधक को यह समझाना है कि इस संसार की हर सुंदर, शक्तिशाली और पवित्र वस्तु में भगवान की ही ऊर्जा विद्यमान है।

उत्तर: इस श्लोक के नियमित पाठ और मनन से मन की चंचलता समाप्त होती है, मानसिक तनाव कम होता है, और जीवन के कठिन निर्णयों में सही दिशा मिलती है। यह साधक को आचार्यों के प्रति सम्मान और ईश्वर के प्रति अगाध समर्पण सिखाता है, जिससे जीवन में शांति और सकारात्मकता बनी रहती है।

उत्तर: हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता के सभी श्लोक मानवता के कल्याण के लिए हैं। इन्हें किसी भी जाति, आयु या वर्ग का व्यक्ति श्रद्धा और पवित्रता के साथ पढ़ सकता है। इसके लिए केवल शुद्ध उच्चारण और सच्ची भक्ति की आवश्यकता होती है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अर्जुन कहते हैं: "सभी ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल और व्यास भी आपको ऐसा ही कहते हैं, और अब स्वयं आप भी मुझसे यही कह रहे हैं।"

Arjuna validates his understanding by pointing to the agreement between the teachings of the ancient sages and Krishna's own revelation. This establishes the consistency of spiritual truth across different times and teachers.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 13 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 13/42 31% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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