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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 · श्लोक 45

अध्याय 1 · श्लोक 45

अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् | यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ||४५||

aho bata mahatpāpaṃ kartuṃ vyavasitā vayam | yadrājyasukhalobhena hantuṃ svajanamudyatāḥ ||45||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अहो बत: हाय; महत्: बड़ा; पापम्: पाप; कर्तुम्: करने के लिए; व्यवसिताः: तत्पर; वयम्: हम; यत्: जो; राज्यसुखलोभेन: राज्य के सुख के लोभ से; हन्तुम्: मारने को; स्वजनम्: अपने लोगों को; उद्यताः: उद्यत।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हाय! कितने आश्चर्य की बात है कि हम राज्य के सुख के लोभ से अपने ही स्वजनों को मारने के लिए उद्यत होकर बड़ा पाप करने को तत्पर हैं।

English Translation

Alas! How strange it is that we are intent on committing a great sin, being eager to kill our own kinsmen out of greed for the pleasures of the kingdom!

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन स्वयं को धिक्कारते हैं कि वे राज्य के लालच में अपनों को मारने का पाप करने जा रहे हैं। Arjuna laments that they are about to commit a great sin by killing relatives for the sake of kingdom.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।