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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 · श्लोक 32

अध्याय 1 · श्लोक 32

अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च | किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ||३२||

na kāṅkṣe vijayaṃ kṛṣṇa na ca rājyaṃ sukhāni ca | kiṃ no rājyena govinda kiṃ bhogairjīvitena vā ||32||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; काङ्क्षे: चाहता हूँ; विजयम्: विजय; कृष्ण: हे कृष्ण; न: नहीं; च: और; राज्यम्: राज्य; सुखानि: सुख; च: और; किम्: क्या; न: हमें; राज्येन: राज्य से; गोविन्द: हे गोविन्द; किम्: क्या; भोगैः: भोगों से; जीवितेन: जीवन से; वा: अथवा।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे कृष्ण! मैं विजय नहीं चाहता, न राज्य और न सुख। हे गोविन्द! हमें राज्य से क्या प्रयोजन? भोगों से या जीवन से भी क्या?

English Translation

I do not desire victory, O Krishna, nor kingdom nor pleasures. What use is kingdom to us, O Govinda? What use are enjoyments or even life itself?

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन अब घोषित करते हैं कि उन्हें विजय, राज्य, सुख – कुछ भी नहीं चाहिए यदि उसके लिए अपनों को मारना पड़े। Arjuna declares that he desires nothing if it means killing his own people.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।