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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 · श्लोक 26

अध्याय 1 · श्लोक 26

अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् | आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ||२६||

tatrāpaśyatsthitānpārthaḥ pitṝnatha pitāmahān | ācāryānmātulānbhrātṝnputrānpautrānsakhīṃstathā ||26||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

तत्र: वहाँ; अपश्यत्: देखा; स्थितान्: खड़े हुए; पार्थः: पार्थ (अर्जुन); पितॄन्: पिताओं को; अथ: तथा; पितामहान्: दादाओं को; आचार्यान्: आचार्यों को; मातुलान्: मामाओं को; भ्रातॄन्: भाइयों को; पुत्रान्: पुत्रों को; पौत्रान्: पौत्रों को; सखीन्: मित्रों को; तथा: और।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

वहाँ अर्जुन ने देखा कि दोनों सेनाओं में उनके पिता, पितामह, आचार्य, मामा, भाई, पुत्र, पौत्र, मित्र आदि सभी खड़े थे।

English Translation

There Arjuna saw standing on both sides his fathers, grandfathers, teachers, maternal uncles, brothers, sons, grandsons, and friends.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन ने अपने सगे-संबंधियों और प्रियजनों को दोनों ओर देखा। इससे उनके मन में मोह और करुणा उत्पन्न हुई। Arjuna saw his own relatives and loved ones on both sides, which gave rise to attachment and pity in his heart.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।