Parvati Stotram

कान्हा मोहे लगे बड़ी लाज ( Kanha Mohe Lage Badi Laaj ) - Jhanki Shyam Bhajan - Bhaktilok

64 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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प्रस्तावना एवं परिचय

कृष्ण भक्ति का अनुपम स्तोत्र: कान्हा मोहे लगे बड़ी लाज

इस भजन को गाकर भक्त श्री कृष्ण की कृपा प्राप्त कर सकते हैं। यह गहरी लाज की भावना को दर्शाता है।

कान्हा मोहे लगे बड़ी लाज कान्हा मोहे लगे बड़ी लाज इंद्रधनुष में युं घूमा वो खेल मत गजो साज कान्हा मोहे लगे बड़ी लाज गोपी तरसे तेरा बास कान्हा मोहे लगे बड़ी लाज श्री कृष्णा, तेरा तुकार हर वक्त तुमसे करूँ कान्हा मोहे लगे बड़ी लाज कान्हा मोहे लगे बड़ी लाज मधु बंधन में बंधा तुमसे, मुझसे कोई बात न बोला कान्हा मोहे लगे बड़ी लाज कान्हा मोहे लगे बड़ी लाज मैया शारदा की सवारी की घुड़सवारों का छाल कान्हा मोहे लगे बड़ी लाज
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🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

इस भजन में भक्त अपनी मनोदशा और श्री कृष्ण के प्रति अपनी लाज और प्रेम को व्यक्त कर रहे हैं। 'कान्हा मोहे लगे बड़ी लाज' वाक्य में लाज की भावना, अपने प्रियतम के प्रति समर्पण को दर्शाती है। यह भाव भक्त की आत्मा की गहराई में बसी प्रेम की गहराई को प्रदर्शित करता है। भक्त का मन इस बात से भरा हुआ है कि क्या श्री कृष्ण उनकी भक्ति को समझ पाएंगे या नहीं। 'इंद्रधनुष में युं घूमा वो खेल' इस वाक्य में भक्त के हृदय में उमंग और उल्लास है, जहां श्री कृष्ण का हर खेल और लीलाएँ मन को मोह लेती हैं। यह एक प्रकार की सामाजिक लाज है, जहां भक्त अपने सभी संबंधों और सामाजिक दायरों को भूलकर केवल कृष्ण की भक्ति में लीन हो जाते हैं।

भजन के भावार्थ में यह स्पष्ट है कि भक्त श्री कृष्ण की प्रेम लीलाओं में खोई हुई गोपियों का प्रतीक है। 'गोपी तरसे तेरा बास' इशारा करती है उन गोपियों की बेचैनी और उनके प्रेम की गहराई को। इस भजन में गोपियों की मनोदशा का चित्रण मिलता है जो श्री कृष्ण की अनुपस्थिति में व्याकुलता महसूस करती हैं। यहाँ पर एक गहरा भाव है जो प्रेम की अनंतता और भक्ति की अद्वितीयता को दर्शाता है। 'श्री कृष्णा, तेरा तुकार हर वक्त तुमसे करूँ' का अर्थ है कि भक्त हर समय श्री कृष्ण के साथ रहना चाहता है। यह लक्षित करता है कि कैसे एक भक्त को अपने इष्ट के प्रति पूर्ण समर्पण होना चाहिए।

इस भजन में भक्तियोग का अद्वितीय रूप देखा जा सकता है। भक्त की यह लाज दरअसल उसकी भक्ति का एक अभिन्न हिस्सा है। भक्ति मार्ग में 'लाज' का होना एक महत्वपूर्ण तत्व है, क्योंकि यह भक्त की आत्मा की गहराइयों से जुड़ा है। यह भक्ति को और अधिक गहरा बनाता है। भक्त की लाज, उसका निस्वार्थ प्रेम और अपने इष्ट को पाने की आकांक्षा दर्शाती है। भगवान कृष्ण के प्रति यह भक्ति न केवल आस्था है, बल्कि आत्मा का एक गहरा तप है। यह दर्शाता है कि परमात्मा में लीन होना ही सर्वोच्च लक्ष्य है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

इस भजन का महत्व भारतीय धार्मिक साहित्य में गहरा है। भक्ति-संप्रदाय में, कृष्ण की लीलाओं को समझने का प्रयास किया गया है। भजन में गोवर्धन लीला, रास लीला जैसे पौराणिक प्रसंगों का आध्यात्मिक महत्व है। पुर्नजन्म, प्रेम, भक्ति और निष्ठा की कहानियां इनमें निहित हैं। ये भावनाएं हमें याद दिलाती हैं कि भक्ति केवल अहंकार से दूर जाने की यात्रा नहीं है, बल्कि प्रेम का एक रास्ता है। ग्रामीण संस्कृतियों में भक्ति का यह रूप सामान्य जन से जुड़कर उनकी रोजमर्रा की जीवनशैली में प्रतिष्ठित है।

श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य उपदेशों को जानने के लिए भगवद्गीता खंड अवश्य पढ़ें और भगवान कृष्ण की लीलाओं के गहन अध्ययन के लिए ब्रह्म पुराण का पाठ करें। इस भजन का जाप करने से मानसिक शांति और आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है। भक्त इस भजन के माध्यम से अपने मन को प्रसन्न रख सकते हैं, जिससे जीवन में खुशियां और सकारात्मकता आती है। भजन का श्रवण करने से भक्त की आत्मा को सुकून मिलता है, और यह साधना के जरिए भक्ति का अनुभव और भी गहरा होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का जाप प्रातः काल या संध्या समय में किया जाता है। पूजा स्थल पर दीपक जलाकर, फूल अर्पित करके और अपने मन को शांत करके इस भजन का पाठ करना चाहिए। ध्यान रखें कि मन में श्री कृष्ण की छवि का स्मरण करें और प्रेम व विनम्रता के साथ भजन का जाप करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भजन का अर्थ क्या है?

इस भजन में भक्त अपनी लाज और प्रेम को व्यक्त करता है जो वह श्री कृष्ण के प्रति महसूस करता है। यह उनकी लीलाओं की गहराई को दर्शाता है।

इस भजन का संपादन कब हुआ?

यह भजन प्राचीन समय से भक्तिभाव के साथ गाया जाता रहा है। इसका मूल स्वरूप लोकजीवन में समाहित है।

कृष्ण की लीलाओं का क्या महत्व है?

कृष्ण की लीलाएँ शाश्वत प्रेम, करुणा और भक्ति का प्रतीक हैं। ये जीवन में निष्ठा और त्याग के मूल सिद्धांतों का अनुसरण करने की प्रेरणा देते हैं।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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