ॐ शिव ॐ शिव परात्परा शिव लिरिक्स - परिचय एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि
देवादिदेव महादेव को समर्पित अत्यंत मनमोहक और वैराग्यपूर्ण संकीर्तन "ॐ शिव ॐ शिव परात्परा शिव लिरिक्स (Om Shiv Om Shiv Paratpara Shiv Lyrics in Hindi)" भगवान शिव के अनंत, निराकार और कल्याणकारी स्वरूप का सजीव चित्रण करता है। 'परात्परा' शब्द का अर्थ है जो परा से भी परे है, अर्थात् संपूर्ण ब्रह्मांड के मूल कारण, आदि और अंत से रहित परम ब्रह्म परमात्मा। भगवान शिव न केवल संहार के देवता हैं, बल्कि वे समस्त चराचर जगत के मूल आधार और परम चेतना के प्रतीक हैं। इस पावन भजन और मंत्र धुन के शब्दों के माध्यम से साधक अपने मन को सांसारिक मोह-माया से विरक्त करके शिव की असीम कृपा और ध्यानमग्न मुद्रा में लीन कर देता है। सोमवार के व्रत, महाशिवरात्रि, सावन मास और दैनिक साधना के दौरान इस शिव भजन का स्मरण करने से मानसिक शांति, आध्यात्मिक ऊर्जा और भगवान भोलेनाथ की अतुल्नीय कृपा प्राप्त होती है। शिव का नाम स्मरण करने मात्र से ही जन्म-जन्मांतर के पाप और भवबाधाएं नष्ट हो जाती हैं।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
ॐ शिव ॐ शिव परात्परा शिव
ॐ शिव ॐ शिव परात्परा शिव,
भोले बाबा भोलेनाथ शंभू देवा शिव।
डमरू वाले त्रिपुरारी, हे त्रिदोष हारी शिव,
भस्म रमे अंग, गले रुद्राक्ष धारी शिव।
जटा में गंग बिराजै, चंद्र सुशोभित ललाट शिव,
विषपान किए नीलकंठ, जग के संकट काट शिव।
ॐ शिव ॐ शिव परात्परा शिव...
कैलाश वासी प्रभु, भूतनाथ स्वामी शिव,
अमृत के दाता और महामृत्युंजय ध्यानी शिव।
नंदी पे सवार हो के, जग कल्याण आएं शिव,
भक्तों के संकट हरने, डमरू बजाएं शिव।
ॐ शिव ॐ शिव परात्परा शिव...
सत्यम शिवम सुंदरम, तेरी महिमा अपरंपार शिव,
तेरी शरण में आए जो, उसका बेड़ा पार शिव।
ॐ शिव ॐ शिव परात्परा शिव,
भोले बाबा भोलेनाथ शंभू देवा शिव।
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस पावन भजन की प्रत्येक पंक्ति भगवान शिव के महान गुणों और उनके स्वरूप का व्याख्यान करती है। 'परात्परा शिव' का उच्चारण साधक को भौतिक जगत की नश्वरता से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक चेतना के उच्च शिखर पर ले जाता है। भजन में महादेव के विभिन्न रूपों जैसे कि भस्मधारी, रुद्राक्षधारी, जटाधारी, नीलकंठ और कैलाशवासी का बहुत ही सुंदर वर्णन किया गया है।
प्रथम पंक्ति में भगवान शिव को 'परात्परा शिव' कहकर संबोधित किया गया है, जिसका अर्थ है कि वे इस सृष्टि के सबसे परे और सर्वोच्च परम सत्य हैं। वे 'भोले बाबा' और 'शंभू' हैं, जो अपने भक्तों की एक सच्ची पुकार पर ही प्रसन्न हो जाते हैं। उनके गले में रुद्राक्ष और पूरे शरीर पर भस्म यह संदेश देती है कि यह भौतिक शरीर नश्वर है और अंत में सब कुछ इसी राख में मिल जाना है, अतः अहंकार का त्याग कर भगवान की शरण में जाना ही मनुष्य का परम कर्तव्य है।
जटाओं में बहने वाली पवित्र गंगा और मस्तक पर सुशोभित चंद्रदेव उनके शीतलता, ज्ञान और पवित्रता के प्रतीक हैं। 'नीलकंठ' स्वरूप यह स्मरण कराता है कि संसार के कल्याण के लिए विषपान करना पड़े तो भी पीछे नहीं हटना चाहिए और दूसरों के दुखों को अपने ऊपर लेना ही सच्ची शिव भक्ति है। यह भजन साधक के भीतर छिपे डर, अहंकार और अज्ञान को समाप्त कर भक्ति और समर्पण का दीप प्रज्वलित करता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन शिव साधना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- वैराग्य और चेतना का प्रतीक: यह भजन मनुष्य को भौतिक मोह-माया से मुक्त होकर आत्म-साक्षात्कार की ओर प्रेरित करता है।
- सरल और लयबद्ध शब्द: इसके बोल इतने सरल और मधुर हैं कि कोई भी भक्त इसे आसानी से गा सकता है और ध्यान की अवस्था में उतर सकता है।
- मानसिक शांति: इस भजन के नियमित श्रवण या गान से मन की चंचलता समाप्त होती है और तनाव दूर होता है।
- शिव कृपा प्राप्ति का साधन: महाशिवरात्रि, सावन मास और सोमवार के व्रत में इसे गाने से भगवान भोलेनाथ की विशेष कृपा मिलती है।
- अन्य प्रेरणादायक स्तोत्रों और मंत्रों के लिए आप शिव तांडव स्तोत्र और महामृत्युंजय मंत्र का भी पाठ कर सकते हैं।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
शिव भजनों का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए उचित समय और विधि का पालन करना आवश्यक है:
- शुभ समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातःकाल 4 से 6 बजे) या प्रदोष काल (संध्याकाल) में इस भजन का गान या श्रवण करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
- दिन: विशेष रूप से सोमवार के दिन, सावन मास में और त्रयोदशी तिथि (प्रदोष व्रत) के दिन इसका पाठ अवश्य करना चाहिए।
- पूजा विधि: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। शिव मंदिर या घर के मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग के सामने दीपक प्रज्वलित करें।
- अर्पण: शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और अक्षत अर्पित करते हुए इस भजन का मानसिक या मौखिक संकीर्तन करें।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
इस भजन के केंद्र में देवादिदेव महादेव, भगवान शिव हैं, जिन्हें त्रिमूर्ति में संहार और प्रलय का देवता माना जाता है किंतु वे वास्तव में परम कल्याणकारी हैं। उनके साथ माता पार्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय का परिवार भी संपूर्ण ब्रह्मांड में आदर्श परिवार का प्रतीक माना जाता है। सनातन परंपरा में आदि शंकराचार्य जैसे महान संतों ने भी शिव महिमा का गान किया है। शिव को आदि गुरु भी कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने ही संसार को योग, संगीत और ज्ञान की पहली दीक्षा दी थी। शिव साधना से जुड़ी अधिक जानकारी के लिए आप शिव पुराण कथा का अध्ययन कर सकते हैं।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
यह पारंपरिक शिव भजन सदियों से भारतीय संकीर्तन परंपरा का हिस्सा रहा है। लोक परंपरा और संतों की वाणी से जन-जन तक पहुँचा यह भजन शिव भक्तों के बीच विशेष रूप से लोकप्रिय है। इसकी रचना का मुख्य उद्देश्य आम जनमानस को शिव के उस रूप से परिचित कराना है जो अत्यंत सरल और सहज है, जिसे महंगे अनुष्ठानों की नहीं अपितु केवल सच्चे प्रेम और एक ल लोटा जल की आवश्यकता होती है। यह भजन लोक संगीत की धुनों पर आधारित है जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देता है.
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल हिंदी और संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का सुंदर मिश्रण है। इसमें 'परात्परा', 'त्रिपुरारी', 'त्रिदोष हारी', 'नीलकंठ' और 'महामृत्युंजय' जैसे उच्च कोटि के तात्विक शब्दों का प्रयोग किया गया है जो इसकी गरिमा को बढ़ाते हैं। काव्य शैली की दृष्टि से यह पद और धुन के रूप में संरचित है, जिसमें अनुप्रास और यमक अलंकारों की सुंदर छटा देखने को मिलती है। शब्दों का यह प्रवाह सुनने वाले के मन में भक्ति रस का संचार कर देता है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि जीवन को जीने का एक दर्शन है:
- समर्पण का भाव: जिस प्रकार शिव ने हलाहल विष को अपने गले में धारण कर लिया, उसी प्रकार जीवन की कठिनाइयों को सहन करने की शक्ति रखनी चाहिए।
- अहंकार का त्याग: शरीर पर भस्म लगाना यह सिखाता है कि यह देह अंत में मिट्टी हो जानी है, अतः अहंकार का त्याग करें।
- सादा जीवन: भगवान शिव कैलाश पर रहकर भी संतुष्ट हैं, यह हमें सिखाता है कि सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं बल्कि भीतर की शांति में है।
- सबकी सेवा: शिव को 'भूतनाथ' कहा जाता है, अर्थात समस्त जीवों और भूतों के रक्षक, जो हमें सभी प्राणियों के प्रति दया भाव रखने की प्रेरणा देता है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / पद | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| परात्परा | जो सबसे परे और सर्वोच्च है | परम ब्रह्म परमात्मा जो माया और प्रकृति से भी परे हैं। |
| त्रिपुरारी | त्रिपुर असुर का वध करने वाले | बुराई और अज्ञान का नाश करने वाली परम शक्ति। |
| त्रिदोष हारी | तीन दोषों (वात, पित्त, कफ / या मानसिक दोष) को हरने वाले | शारीरिक और मानसिक संतापों से मुक्ति देने वाले। |
| नीलकंठ | नीले गले वाले | समुद्र मंथन के समय विषपान करने के कारण पड़ा नाम। |
| महामृत्युंजय | मृत्यु पर विजय पाने वाले | अकाल मृत्यु और भय का नाश करने वाले देव। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"ॐ शिव ॐ शिव परात्परा शिव, भोले बाबा भोलेनाथ शंभू देवा शिव।"
भावार्थ: हम उस परमेश्वर शिव का आह्वान करते हैं जो सभी शक्तियों से परे हैं, जो अत्यंत भोले और सहज भाव से अपने भक्तों पर कृपा करने वाले शंभू देवा हैं।
"डमरू वाले त्रिपुरारी, हे त्रिदोष हारी शिव, भस्म रमे अंग, गले रुद्राक्ष धारी शिव।"
भावार्थ: जिनके हाथ में डमरू है, जो त्रिपुर असुर का नाश करने वाले और हमारे सभी कष्टों को हरने वाले हैं, जिनके पूरे शरीर पर भस्म रमी है और गले में रुद्राक्ष की माला सुशोभित है, ऐसे शिव को नमन।
"जटा में गंग बिराजै, चंद्र सुशोभित ललाट शिव, विषपान किए नीलकंठ, जग के संकट काट शिव।"
भावार्थ: जिनकी जटाओं में पवित्र गंगा जी विराजमान हैं और मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है, जिन्होंने संसार की रक्षा के लिए विष पिया और नीलकंठ कहलाए, वे हमारे सभी संकटों को काटें।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के साथ निम्नलिखित पावन मंत्रों का जप करने से साधना का पूर्ण फल प्राप्त होता है:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
एवं
ॐ नमः शिवाय॥
इन मंत्रों का प्रतिदिन 108 बार जप करने से साधक को मानसिक शांति और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | ॐ शिव ॐ शिव परात्परा शिव लिरिक्स (Om Shiv Paratpara Shiv Mantra) |
|---|---|
| आराध्य देव | भगवान शिव / महादेव / भोलेनाथ |
| रचना परंपरा | पारंपरिक वैदिक एवं पौराणिक संकीर्तन |
| भाषा | हिंदी एवं संस्कृतनिष्ठ पद |
| मुख्य थीम | शिव भक्ति, वैराग्य, समर्पण और शरण |
| भाव | भक्ति, शांति, आत्मीयता और शरणागति |
| उपयुक्त अवसर | सोमवार व्रत, सावन मास, महाशिवरात्रि, प्रदोष काल |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
भक्तिलok.in पर प्रकाशित यह लेख सनातन धर्म की प्राचीन परंपराओं, शिव पुराण के संदर्भों और लोकगीत परंपराओं का अध्ययन करके तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को शुद्ध, प्रामाणिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध सामग्री प्रदान करना है। यह सामग्री संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत प्रस्तुत की गई है ताकि प्रत्येक पाठक को उच्च गुणवत्ता का अनुभव मिल सके।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- शिव महापुराण - कोट रुद्र संहिता एवं विधेश्वर संहिता
- वैदिक एवं पौराणिक स्तोत्र संग्रह
- सनातन धर्म की लोक संकीर्तन एवं भजन परंपरा
- पारंपरिक शिव आराधना पद्धतियाँ
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