छठ गीत (Chhath Geet) - सूर्य उपासना और लोक आस्था के महापर्व के पावन भजन
छठ पर्व (Chhath Puja) सनातन संस्कृति में केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति, सूर्य देव और छठी मैया के प्रति अटूट आस्था, कृतज्ञता और लोक समर्पण का सबसे बड़ा महापर्व है। इस चार दिवसीय अनुष्ठान के दौरान गाए जाने वाले पारंपरिक छठ गीत (Chhath Geet) इस उत्सव की आत्मा हैं। भोजपुरी, मैथिली और मगही की सोंधी खुशबू से रचे-बसे ये लोकगीत न केवल सूर्य उपासना के महत्व को रेखांकित करते हैं, बल्कि परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की दीर्घायु और जीवन में शुचिता का संदेश भी देते हैं। लोक गायिका शारदा सिन्हा से लेकर पारंपरिक ग्रामीण महिलाओं के कंठ से गूंजने वाले ये कर्णप्रिय गीत जब संध्याकालीन अर्घ्य और उषा अर्घ्य के समय घाटों पर बजते हैं, तो पूरा वातावरण भक्तिमय और दिव्य हो जाता है। इस लेख में हम छठ गीतों के आध्यात्मिक महत्व, प्रमुख रचनाओं, उनके भावार्थ और सूर्य उपासना की परंपरा का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण छठ गीत लिरिक्स एवं लोकप्रिय पंक्तियाँ | Complete Chhath Geet Lyrics
केरा के पात पर उगेलन सुरुज मल बाबा, ता कांचहीं बाँस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय...
पारंपरिक और सबसे अधिक गाए जाने वाले छठ गीतों में सूर्य देव और छठी मैया की महिमा का गुणगान किया जाता है। यहाँ कुछ अत्यंत प्रसिद्ध छठ गीतों के अंश प्रस्तुत किए गए हैं:
1. उगहूँ सूरज मल भइले बिहान...
उगहूँ सूरज मल भइले बिहान, अरघ के बेरिया भइले न अबेर।
सुनू छठी मैया तोहरो महिमा अपार, रच्छिया करहूँ हे दीनानाथ अपरम्पार।
केरवा जे फरेला घवद समेत, ओ पर सुगा मंडराए...
2. कांचहीं बाँस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय...
कांचहीं बाँस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय,
बहंगी लचकत जाय तोहें पाहुँचब घाट के तीर।
तू त बहंगी बहइया के दीनानाथ, बहंगी पहुँचाबे घाट रे बहंगेदार...
3. मारबो रे सुगा धनुष से, सुगा सुिर सुिर रोए...
मारबो रे सुगा धनुष से, सुगा गिरल मुरुझाय,
उतनी से सुगा के बहुरिया रोए, हमरो सुगा के जिआइहूँ छठी माई...
छठ गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Chhath Geet Meaning & Bhavarth
छठ गीत केवल शब्दों का समूह नहीं हैं, बल्कि ये एक तपस्विनी माँ की अपने परिवार और संतान के कल्याण के लिए की गई प्रार्थना का सजीव दस्तावेज हैं। इन गीतों में उपयोग की जाने वाली शब्दावली जैसे 'केरा के पात' (केले का पत्ता), 'कांचहीं बाँस के बहंगी' (कच्चे बांस से बनी बहंगी) और 'सुगा' (तोता) गहरी प्रतीकात्मकता समेटे हुए हैं।
इन गीतों का मूल भाव प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का है। केले के पौधे को पवित्र मानकर उस पर प्रसाद सजाना, बांस से बने सूप और दौरा का प्रयोग यह दर्शाता है कि छठ पर्व पर्यावरण के अनुकूल और पूरी तरह से प्रकृति की गोद में रचा-बसा उत्सव है। गीतों के माध्यम से साधक सूर्य देव से प्रार्थना करता है कि हे दीनानाथ! जैसे आपने अपनी किरणों से पूरी सृष्टि को जीवन दिया है, वैसे ही हमारे जीवन के अंधकार को भी दूर कीजिए।
छठ गीत की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Cultural Significance
लोक संस्कृति में रचे-बसे छठ गीतों का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है:
- प्रकृति प्रेम और स्वच्छता: इन गीतों में नदियों, तालाबों और सूर्य की पूजा का सजीव चित्रण मिलता है, जो पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है।
- महिला सशक्तिकरण और लोक परंपरा: छठ पर्व की पूरी प्रक्रिया में महिलाएं मुख्य भूमिका निभाती हैं और लोकगीतों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस संस्कृति को जीवित रखती हैं।
- कठिन व्रत का संबल: 36 घंटे के निर्जला व्रत के दौरान जब व्रती महिलाएं और उनके परिजन इन गीतों को गाते हैं, तो उनकी शारीरिक थकान दूर हो जाती है और मन को असीम ऊर्जा मिलती है।
छठ गीत गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When to Sing Chhath Geet
छठ गीत मुख्य रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तक गाए जाते हैं:
- नहाय-खाय (चतुर्थी): इस दिन घर की सफाई और सात्विक भोजन बनाते समय महिलाओं द्वारा मंगला गीत गाए जाते हैं।
- खरना (पंचमी): खीर-पुड़ी का प्रसाद बनाते समय संध्या के समय छठी मैया के भजन गाए जाते हैं।
- संध्या अर्घ्य (षष्ठी): जब व्रती महिलाएं अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने के लिए नदी या तालाब के घाट की ओर बढ़ती हैं, तब रास्ते में "कांचहीं बाँस के बहंगिया" जैसे गीत गूंजते हैं।
- उषा अर्घ्य (सप्तमी): उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देते समय "उगहूँ सूरज मल" और अन्य स्तुति गीत गाए जाते हैं।
सूर्य उपासना और छठ पर्व का पौराणिक संदर्भ | Mythological Context
हिन्दू धर्म में सूर्य देव को प्रत्यक्ष देवता माना जाता है जिनकी कृपा से इस संसार में जीवन का संचालन होता है। महाभारत काल में पांडवों की पत्नी द्रौपदी और सूर्यपुत्र कर्ण द्वारा सूर्य उपासना करने का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि महर्षि दुर्वासा के आशीर्वाद और माता द्रौपदी द्वारा की गई सूर्य आराधना से ही पांडवों को उनके कष्टों से मुक्ति मिली थी। छठी मैया (माता षष्ठी) को प्रकृति की अधिष्ठात्री देवी और भगवान सूर्य की बहन माना जाता है, जो बच्चों की रक्षा और उनके सुखी जीवन का आशीर्वाद देती हैं। अधिक जानकारी के लिए आप सूर्य स्तोत्र एवं उपासना विधि का अध्ययन कर सकते हैं।
कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings
| शब्द / पद | सरल हिंदी अर्थ | संदर्भ / उपयोग |
|---|---|---|
| बहंगी | बांस की डंडी जिसके दोनों सिरों पर टोकरी बंधी होती है | प्रसाद को घाट तक ले जाने का पारंपरिक साधन |
| सुगा | तोता | लोक गीतों में प्रकृति और पक्षियों का प्रतीक |
| अर्घ्य | जल अर्पित करना | सूर्य देव को तांबे के कलश से जल देने की क्रिया |
| दीनानाथ | दुखियों के नाथ, सूर्य भगवान | भगवान भास्कर का संबोधन |
| घवद | केले का पूरा गुच्छा | पूजा में अर्पित होने वाला मुख्य फल |
एक नजर में छठ गीत की जानकारी | Chhath Geet Quick Information
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| विषय / थीम | सूर्य उपासना, प्रकृति प्रेम और छठी मैया की महिमा |
| भाषा / बोली | भोजपुरी, मैथिली, मगही और हिंदी |
| मुख्य अवसर | कार्तिक छठ महापर्व (नहाय-खाय से प्रात: अर्घ्य तक) |
| प्रमुख कलाकार | शारदा सिन्हा, मालिनी अवस्थी और पारंपरिक लोक गायिकाएं |
| संबंधित देवता | भगवान सूर्य नारायण एवं छठी मैया (माता षष्ठी) |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
छठ गीत मुख्य रूप से किस भाषा में गाए जाते हैं?
छठ गीत मुख्य रूप से भोजपुरी, मैथिली और मगही लोक भाषाओं में गाए जाते हैं, क्योंकि इनका उद्गम बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश की संस्कृति से जुड़ा है।
छठ पर्व पर कौन से गीत सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं?
"कांचहीं बाँस के बहंगिया", "उगहूँ सूरज मल भइले बिहान" और "केलवा जे फरेला घवद समेत" छठ पर्व के सबसे लोकप्रिय और पारंपरिक गीत हैं।
छठ गीतों में बांस की बहंगी का क्या महत्व है?
बांस को हिंदू संस्कृति में अत्यंत पवित्र और वंश वृद्धि का प्रतीक माना जाता है। बहंगी के माध्यम से पूजा का प्रसाद शुद्धता के साथ घाट तक ले जाया जाता है।
छठ गीत गाने की परंपरा कब शुरू होती है?
छठ गीत गाने की परंपरा कार्तिक शुक्ल चतुर्थी (नहाय-खाय) से शुरू होकर सप्तमी को प्रात:कालीन अर्घ्य संपन्न होने तक चलती है।
क्या छठ गीत केवल महिलाओं द्वारा ही गाए जाते हैं?
पारंपरिक रूप से ये गीत महिलाओं द्वारा व्रत के दौरान गाए जाते हैं, परंतु आज के समय में सांस्कृतिक आयोजनों और संगीत कार्यक्रमों में सभी लोग इन्हें श्रद्धापूर्वक गाते व सुनते हैं।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री। इस लेख में दी गई समस्त जानकारी पारंपरिक मान्यताओं, लोकसाहित्य और सांस्कृतिक धरोहर पर आधारित है।
स्रोत एवं संदर्भ: भारतीय लोक संस्कृति ग्रंथ, सूर्य पुराण, प्रादेशिक लोकगीत संग्रह एवं पारंपरिक व्रत कथाएं।
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