Parvati Stotram

शारदा सिन्हा छठ गीत छठ गीत

54 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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शारदा सिन्हा छठ गीत - लोक आस्था के महापर्व की पावन स्वर साधना

छठ महापर्व का नाम लेते ही भारतवर्ष के कोने-कोने में, विशेष रूप से बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के जनमानस में, स्वर कोकिला पद्म भूषण शारदा सिन्हा जी की मधुर और कर्णप्रिय आवाज स्वतः ही कानों में गूंजने लगती है। शारदा सिन्हा के छठ गीत केवल संगीत नहीं हैं, बल्कि वे सूर्य उपासना और प्रकृति के प्रति अटूट कृतज्ञता की जीवंत प्रस्तुतियां हैं। इन गीतों में एक ऐसा दिव्य स्पंदन और मार्मिक भाव छिपा है, जो हर प्रवासी बिहारी को अपनी माटी, अपने घर और छठी मइया की आराधना के लिए विवश कर देता है। शारदा सिन्हा द्वारा गाए गए छठ गीत लोक संस्कृति, पारिवारिक समरसता, शुद्धता, संयम और पूर्ण समर्पण के प्रतीक हैं। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले इस चार दिवसीय महापर्व के दौरान जब सुबह और शाम के वेला में उनके गीत रेडियो, टेलीविजन और गलियारों से गूंजते हैं, तो संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो जाता है। यह लेख शारदा सिन्हा के अमर छठ गीतों के सांस्कृतिक महत्व, उनकी गायकी की विशेषता, और लोक जीवन पर उनके गहरे प्रभाव का संपूर्ण और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

"केलवा जे फरेला घवद से, सुअवा ता मारे मंडराइल हो..."

प्रसिद्ध पारंपरिक शारदा सिन्हा छठ गीत बोल


केलवा जे फरेला घवद से, सुअवा ता मारे मंडराइल हो!< सुअवा के मारब धनुष से, सुअवा सुगा गिलान हो!< सुगा सुगा कहे मोर छठी मइया, उगहें सुरुज देव भइले बिहान हो!

घाट स सजेलियेटरहिया जोरेली, छठी मइया दर्शन दिअत हो!< भोरही के बेरिया अरघ गिराइब, संकट सब हरिएत हो!< उगहें सुरुज देव भइले बिहान हो, अरघ के बेरिया भइले बिहान हो!

कांच ही बाँस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए!< हूँ बहंगी के पहुँचाबS कइसे, बहंगी घाट पहुँचाइये!< बाट जे जोरेली दियरा बारेली, छठी मइया धिया पुता के सुख दिअहें!

पहिले पहिल हम कइनी, छठी मइया बरत तोहार!< करिया चरणवा के धइनी, करिअs हमार उद्धार!< सुरुज भगवान के अरघ देबS, निर्मल होई संसार!< छठी मइया तोहरे महिमा अपरम्पार!

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

शारदा सिन्हा जी के इन पवित्र छठ गीतों में केवल शब्दों का मेल नहीं है, बल्कि यह एक व्रती की अपने आराध्य सूर्य देव और छठी मइया (प्रकृति देवी) के प्रति अनन्य पुकार है। गीत की पहली पंक्तियाँ—"केलवा जे फरेला घवद से"—प्रकृति की शुद्धता और संपन्नता का प्रतीक हैं। छठ पूजा में उपयोग होने वाले प्रत्येक फल, विशेषकर केले का गुच्छा, इस बात का गवाह है कि हम भगवान को वही अर्पित करते हैं जो प्रकृति का सबसे शुद्ध और अनछुआ उपहार है। तोते द्वारा मंडराने का प्रसंग लोक कथाओं के माध्यम से यह सिखाता है कि जब हम पवित्रता और नियम के साथ व्रत करते हैं, तो हर छोटी-छोटी वस्तु और जीव के प्रति भी हमारी संवेदनशीलता बढ़ जाती है।

इसके पश्चात, 'कांच ही बाँस के बहंगिया' गीत में उस कठिन परिश्रम और सामूहिक सहभागिता का वर्णन है जो छठ व्रत के दौरान देखने को मिलती है। बांस से बनी बहंगी पर सजे हुए सूप, ठेकुआ, फल और दीपक इस बात के प्रतीक हैं कि हमारा जीवन और हमारी संस्कृति कितनी सरल और पर्यावरण के अनुकूल है। व्रती माताएं और बहनें नंगे पांव, कठिन उपवास रखते हुए जब नदी या तालाब के घाट की ओर बढ़ती हैं, तो उनके मन में केवल एक ही भाव होता है—"हे छठी मइया, हमारे परिवार की रक्षा करना और समाज में सुख-शांति बनाए रखना।" शारदा सिन्हा की आवाज इन भावों को इतना सजीव कर देती है कि सुनने वाले की आंखें श्रद्धा से नम हो जाती हैं।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

शारदा सिन्हा के छठ गीतों की केंद्रीय भावना विरह, समर्पण, पारिवारिक कल्याण और प्रकृति पूजा है। जब कोई गीत "पहिले पहिल हम कइनी, छठी मइया बरत तोहार" गूंजता है, तो उसमें पहली बार व्रत करने वाले के मन की घबराहट, उत्साह और अगाध श्रद्धा का अनूठा मिश्रण झलकता है। यह संदेश देता है कि ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति किसी दिखावे की मोहताज नहीं होती, बल्कि यह आंतरिक शुद्धि और अनुशासन की मांग करती है। इन गीतों से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपनी संस्कृति, अपनी मातृभाषा (भोजपुरी, मैथिली, मगही) और अपनी परंपराओं को कभी नहीं भूलना चाहिए, चाहे हम दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न पहुँच जाएं।

गीत का नाम / मुखड़ा गायक कलाकार भाषा / बोली मुख्य विषय
पहिले पहिल हम कइनी पद्म भूषण शारदा सिन्हा भोजपुरी / मैथिली व्रत की शुरुआत और समर्पण
केलवा जे फरेला घवद से पद्म भूषण शारदा सिन्हा भोजपुरी लोकगीत प्रकृति और छठी मइया की महिमा
उगहें सुरुज देव भइले बिहान पद्म भूषण शारदा सिन्हा भोजपुरी / अंगिका सूर्योदय और अर्घ्यदान
कांच ही बाँस के बहंगिया पद्म भूषण शारदा सिन्हा पारंपरिक लोकगायन घाट की यात्रा और उल्लास

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

भारतीय लोक संगीत के इतिहास में शारदा सिन्हा का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। बिहार के सुपौल जिले में जन्मीं शारदा सिन्हा ने पारंपरिक लोकगीतों को वैश्विक पहचान दिलाई। उनके पति श्री ब्रजकिशोर सिन्हा द्वारा रचित कई गीत और पारंपरिक लोकधुनों का उनका अनूठा संयोजन संगीत प्रेमियों के दिलों में हमेशा जीवित रहेगा। उन्होंने शास्त्रीय संगीत की बारीकियों को लोक गीतों की मिठास के साथ इस प्रकार पिरोया कि हर उम्र का व्यक्ति उनके गानों से जुड़ गया। सरकार ने उनके योगदान को सम्मानित करते हुए उन्हें पद्म श्री और पद्म भूषण जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से अलंकृत किया। उनके गाए छठ गीत आज के समय में किसी मंत्र या स्तोत्र से कम नहीं माने जाते हैं।

कठिन शब्द सरल हिंदी अर्थ सांस्कृतिक एवं गीत का संदर्भ
घवद केले का पूरा गुच्छा पेड़ से उतरा हुआ सबसे ताजा और शुद्ध फल
बहंगिया बांस का बना हुआ झूलता हुआ ढांचा जिस पर प्रसाद के सूप रखकर कंधों पर उठाए जाते हैं
अरघ (अर्घ्य) जल या दूध अर्पित करना उगते और डूबते सूर्य को जल देने की पवित्र विधि
बेरिया समय या बेला सूर्योदय या सूर्यास्त का विशेष समय

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

छठ पूजा का पर्व भारतीय सनातन संस्कृति में एकमात्र ऐसा अनुष्ठान है जिसमें डूबते हुए सूर्य और उगते हुए सूर्य दोनों की पूजा की जाती है। शारदा सिन्हा के छठ गीत इस महान दार्शनिक सत्य को उजागर करते हैं कि जो अस्त होता है, उसका उदय होना भी निश्चित है। यह जीवन के उतार-चढ़ाव में धैर्य और आशा का संदेश देता है। जब इन गीतों को घाटों पर बजाया जाता है, तो अमीर-गरीब, जाति-पाति के सभी भेद मिट जाते हैं और पूरा समाज एक परिवार की तरह छठी मइया के गीत गुनगुनाता है। यह सांस्कृतिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का सबसे बड़ा माध्यम है। इस संदर्भ में आप श्री हनुमान चालीसा और शिव तांडव स्तोत्र के समान ही इन लोक गीतों को भी अपनी आध्यात्मिक साधना का हिस्सा मान सकते हैं।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

  1. प्रकृति के प्रति कृतज्ञता: सूर्य, जल, वायु और वनस्पतियों के बिना जीवन असंभव है, और छठ गीत हमें इन्हीं प्राकृतिक शक्तियों का धन्यवाद करना सिखाते हैं।
  2. कठिन परिस्थितियों में संयम: 36 घंटे का निर्जला उपवास और कठिन नियमों का पालन यह सिखाता है कि इच्छाशक्ति से हर कठिनाई को पार किया जा सकता है।
  3. सामूहिक सौहार्द: जाति और वर्ग के बंधनों से ऊपर उठकर एक साथ मिलकर पर्व मनाना सामाजिक एकता का सबसे बड़ा पाठ है।
  4. मातृभूमि और जड़ों से जुड़ाव: चाहे व्यक्ति दुनिया के किसी भी कोने में हो, अपनी संस्कृति और मातृभाषा को कभी नहीं भूलना चाहिए।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

शारदा सिन्हा के छठ गीत मुख्य रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से लेकर सप्तमी तिथि तक यानी नहाय-खाय, खरना, लोहंडा, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य के दौरान सुने और गाए जाते हैं। हालांकि, इनकी मिठास ऐसी है कि लोग अब इन्हें साल भर अपने घरों में सकारात्मक ऊर्जा और शांति बनाए रखने के लिए सुनते हैं। विशेषकर जब घर में कोई मांगलिक कार्य हो या प्रवासी अपने घर लौट रहे हों, तब इन गीतों का विशेष महत्व होता है।

गीत / विषय विवरण
प्रसिद्ध रचना केलवा जे फरेला घवद से, पहिले पहिल हम कइनी
प्रमुख गायिका पद्म भूषण शारदा सिन्हा
भाषा भोजपुरी, मैथिली, अंगिका
पर्व का अवसर छठ महापर्व (कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से सप्तमी)
मुख्य देवता सूर्य देव और छठी मइया (षष्ठी माता)
आध्यात्मिक भाव प्रकृति वंदना, पारिवारिक कल्याण और कृतज्ञता

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

"पहिले पहिल हम कइनी", "केलवा जे फरेला घवद से", "कांच ही बाँस के बहंगिया", और "उगहें सुरुज देव भइले बिहान" शारदा सिन्हा के सबसे अधिक प्रसिद्ध और लोकप्रिय छठ गीत हैं।

छठ गीत मुख्य रूप से भोजपुरी, मैथिली और अंगिका जैसी लोक भाषाओं में गाए जाते हैं, जो बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान हैं।

शारदा सिन्हा को भारतीय लोक संगीत में उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा 'पद्म श्री' और 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया गया है। उन्हें 'बिहार कोकिला' भी कहा जाता है।

उनकी आवाज में जो मार्मिकता, शुद्धता और भक्ति भाव झलकता है, वह व्रतियों के मन को शांति देता है और पर्व के माहौल को पूरी तरह से आध्यात्मिक बना देता है।

इस गीत में पहली बार छठ व्रत रखने वाले की भावना, छठी मइया के प्रति समर्पण और पूरे संसार की कल्याण की कामना का सुंदर वर्णन किया गया है।

मुख्य रूप से यह छठ पर्व पर गाए जाते हैं, परंतु देश-विदेश में बसे प्रवासी भारतीय अपनी संस्कृति और माटी की खुशबू से जुड़े रहने के लिए इन्हें साल भर सुनते हैं।

सूर्य देव को स्वास्थ्य, ऊर्जा, प्रकाश और जीवन का प्रत्यक्ष देवता माना जाता है। उनकी कृपा से ही प्रकृति में जीवन का संचार होता है।

नई पीढ़ी को इन गीतों के माध्यम से अपनी लोक संस्कृति, पारंपरिक संगीत, पारिवारिक मूल्यों और प्रकृति के प्रति सम्मान बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री। इस लेख में प्रस्तुत सभी विवरण लोक संस्कृति, पारंपरिक संगीत के इतिहास, और शारदा सिन्हा के संगीत अवदान के आधार पर संकलित किए गए हैं। हमारा उद्देश्य भारतीय सनातन पर्वों और लोक कलाओं के गौरवशाली इतिहास को पाठकों तक प्रामाणिक रूप से पहुँचाना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • भारतीय लोक संगीत और परंपरा कोष
  • बिहार की सांस्कृतिक विरासत एवं लोकगायन परंपरा
  • पद्म भूषण शारदा सिन्हा के आधिकारिक संगीत संकलन
  • सूर्य षष्ठी (छठ) व्रत के शास्त्रीय एवं पौराणिक संदर्भ

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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