"मुझे अपने ही रंग में रंग ले, मेरे यार सांवरे" साध्वी पूर्णिमा जी (पुनम दीदी) द्वारा गाया गया एक अत्यंत लोकप्रिय और भावपूर्ण कृष्ण भजन है। यह भजन जीवात्मा की परमात्मा के प्रति अनन्य भक्ति, पूर्ण समर्पण और माधुर्य भाव को दर्शाता है। सनातन धर्म की संकीर्तन परंपरा में इस भजन का एक विशिष्ट स्थान है, क्योंकि इसके बोल सीधे हृदय को स्पर्श करते हैं और साधक को सांसारिक मोह-माया से दूर कर श्री कृष्ण के दिव्य प्रेम में सराबोर कर देते हैं। इस लेख के माध्यम से हम इस पावन भजन के सम्पूर्ण लिरिक्स, विस्तृत भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व और इससे मिलने वाली जीवन सीख पर गहराई से चर्चा करेंगे।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ मुझे अपने ही रंग में रंग ले ॥
मुझे अपने ही रंग में रंग ले, मेरे यार सांवरे।
मुझे अपने ही रंग में रंग ले, मेरे यार सांवरे॥
ऐसा रंग दे जो रंग छूटे ना धोबी धोए चाहे सारी उमरिया।
मुझे अपने ही रंग में रंग ले, मेरे यार सांवरे॥
तुम तो रंगते हो लोक और परलोक को,
मेरी छोटी सी रंग दे चुनरिया।
मुझे अपने ही रंग में रंग ले, मेरे यार सांवरे॥
भाव के कुण्ड में प्रेम के जल में,
ऐसी डुबकी लगा दे सांवरिया।
मुझे अपने ही रंग में रंग ले, मेरे यार सांवरे॥
लोक-लाज कुल की मर्यादा,
छोड़ के आई मैं तो तेरी डगरिया।
मुझे अपने ही रंग में रंग ले, मेरे यार सांवरे॥
साध्वी पूर्णिमा दासी तुम्हारी,
चरणों में रख लो अपनी गुजरिया।
मुझे अपने ही रंग में रंग ले, मेरे यार सांवरे॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का मुख्य भाव "माधुर्य भक्ति" और "शरणागति" है। यहाँ भक्त (जीवात्मा) अपने आराध्य भगवान श्री कृष्ण (परमात्मा) से प्रार्थना कर रहा है कि वे उसे अपने दिव्य प्रेम के रंग में रंग दें। यह रंग कोई भौतिक रंग नहीं है, बल्कि यह ईश्वर के प्रति अनन्य अनुराग, श्रद्धा और भक्ति का रंग है।
भक्त कहता है कि हे सांवरे! मुझे अपने उस रंग में रंग दो जो कभी फीका न पड़े। संसार के सारे संबंध और रंग समय के साथ फीके पड़ जाते हैं, लेकिन ईश्वर की भक्ति का रंग शाश्वत और अमर है। जब एक बार यह रंग चढ़ जाता है, तो संसार की कोई भी परिस्थिति, कोई भी दुख या सुख इसे मिटा नहीं सकता। भक्त अपनी "चुनरिया" (जो कि मानव मन और बुद्धि का प्रतीक है) को भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है और प्रार्थना करता है कि इसे भी अपने दिव्य रंग से सुशोभित कर दें।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- अनन्य समर्पण: यह भजन साधक को सिखाता है कि भगवान की प्राप्ति के लिए पूर्ण समर्पण आवश्यक है।
- माधुर्य भाव: इसमें भगवान को "यार" (सखा या प्रियतम) कहकर संबोधित किया गया है, जो भक्त और भगवान के बीच के अत्यंत घनिष्ठ और मधुर संबंध को दर्शाता है।
- सांसारिक विरक्ति: भजन में "लोक-लाज" और "कुल की मर्यादा" को छोड़कर भगवान की शरण में जाने की बात कही गई है, जो मीराबाई की भक्ति पद्धति से प्रेरित है।
- मानसिक शांति: इस भजन के नियमित श्रवण और कीर्तन से मन को असीम शांति मिलती है और तनाव दूर होता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि भगवान के नाम संकीर्तन के लिए कोई भी समय वर्जित नहीं है, फिर भी इस भजन को गाने और सुनने के लिए निम्नलिखित समय और विधियां सर्वोत्तम मानी जाती हैं:
- संध्या आरती के समय: शाम के समय जब घर या मंदिर में दीप प्रज्वलित किया जाता है, तब इस भजन का गायन मन को एकाग्र करता है।
- सत्संग और संकीर्तन: सामूहिक रूप से भक्तों के संग बैठकर ढोलक और मंजीरे की थाप पर इस भजन को गाना अत्यंत फलदायी होता है।
- जन्माष्टमी और त्योहारों पर: श्री कृष्ण जन्माष्टमी, राधाष्टमी और होली के पावन अवसर पर इस भजन का विशेष रूप से गायन किया जाता है।
- विधि: शांत चित्त होकर, आंखें बंद करके भगवान श्री कृष्ण की छवि का ध्यान करते हुए इस भजन को गाना चाहिए ताकि इसके शब्दों का गहरा प्रभाव अंतर्मन पर पड़ सके।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। श्री कृष्ण को "सांवरा", "गिरिधर", और "कन्हैया" जैसे अनेक नामों से पुकारा जाता है। इस भजन को अपनी मधुर आवाज से जन-जन तक पहुंचाने का श्रेय प्रसिद्ध भजन गायिका साध्वी पूर्णिमा जी (पुनम दीदी) को जाता है। वे वृंदावन की पावन भूमि से जुड़ी हुई हैं और उनके भजनों में श्री राधा-कृष्ण के प्रति अगाध प्रेम और विरह की तड़प स्पष्ट दिखाई देती है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
यह भजन पारंपरिक सूफी और वैष्णव भक्ति काव्य का एक सुंदर मिश्रण है। अमीर खुसरो के प्रसिद्ध कलाम "मोहे अपने ही रंग में रंग ले" से प्रेरित होकर इसे वैष्णव संकीर्तन शैली में ढाला गया है। साध्वी पूर्णिमा जी ने इसे आधुनिक संगीत और पारंपरिक धुनों के साथ प्रस्तुत किया, जिससे यह वर्ष 2015 में रिलीज होने के बाद से ही हर कृष्ण भक्त की जुबान पर चढ़ गया।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और ब्रजभाषा मिश्रित हिंदी है। इसमें रूपक अलंकार का बहुत ही सुंदर प्रयोग किया गया है। यहाँ "चुनरिया" मानव आत्मा का प्रतीक है, "धोबी" संसार और उसकी कठिनाइयों का प्रतीक है, और "रंग" ईश्वर के शाश्वत प्रेम का प्रतीक है। इसकी काव्य शैली गेय है, जिसे आसानी से गाया और याद किया जा सकता है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें सिखाता है कि वास्तविक आनंद केवल भगवान की शरण में ही है। संसार के रंग क्षणभंगुर हैं; आज जो सुख है, कल वह दुख में बदल सकता है। लेकिन यदि हम अपने मन को भगवान के चरणों में लगा दें, तो हम हर परिस्थिति में समभाव रह सकते हैं। यह भजन हमें अहंकार को त्यागने और भगवान के प्रति पूर्ण विश्वास रखने की प्रेरणा देता है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| सांवरे | श्याम वर्ण वाले श्री कृष्ण | परमात्मा का सगुण रूप |
| चुनरिया | दुपट्टा या वस्त्र | मानव मन और अंतःकरण |
| लोक-लाज | संसार का संकोच या भय | सांसारिक बंधन और सामाजिक बाधाएं |
| डगरिया | रास्ता या मार्ग | भक्ति और ज्ञान का मार्ग |
| गुजरिया | ग्वालिन या दासी | समर्पित जीवात्मा |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
1. "मुझे अपने ही रंग में रंग ले, मेरे यार सांवरे..."
भक्त अपने आराध्य से कहता है कि हे मेरे प्रियतम कृष्ण! मुझे अपने दिव्य प्रेम के रंग में इस प्रकार रंग लो कि मेरा अस्तित्व तुममें ही विलीन हो जाए।
2. "ऐसा रंग दे जो रंग छूटे ना धोबी धोए चाहे सारी उमरिया..."
यह संसार रूपी धोबी चाहे जितनी भी कोशिश कर ले, माया के थपेड़े चाहे जितने भी लगें, लेकिन तुम्हारी भक्ति का यह रंग कभी भी फीका नहीं पड़ना चाहिए।
3. "तुम तो रंगते हो लोक और परलोक को, मेरी छोटी सी रंग दे चुनरिया..."
हे प्रभु! आप तो इस समस्त ब्रह्मांड और तीनों लोकों के स्वामी हैं। आपके लिए मेरे इस छोटे से जीवन और मन को पवित्र करना अत्यंत सरल है। कृपया मुझ पर भी अपनी कृपा दृष्टि डालें।
4. "भाव के कुण्ड में प्रेम के जल में, ऐसी डुबकी लगा दे सांवरिया..."
मेरे भीतर सच्ची श्रद्धा और प्रेम का संचार कर दीजिए ताकि मैं आपके ध्यान में पूरी तरह से मग्न हो सकूं।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के भाव को और अधिक गहराई से समझने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है, जहाँ भगवान अर्जुन से पूर्ण शरणागति की बात कहते हैं:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः॥
अर्थ: सभी धर्मों (कर्तव्यों) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा, शोक मत करो।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | मुझे अपने ही रंग में रंग ले |
| मुख्य गायक | साध्वी पूर्णिमा जी (पुनम दीदी) |
| समर्पित देवता | भगवान श्री कृष्ण |
| भाषा | हिंदी (ब्रजभाषा का प्रभाव) |
| मुख्य भाव | माधुर्य भाव, शरणागति, प्रेम भक्ति |
| रिलीज वर्ष | 2015 |
| उपयुक्त अवसर | सत्संग, संध्या आरती, जन्माष्टमी, होली |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पर आधारित है। इस भजन की व्याख्या और इसके आध्यात्मिक पहलुओं को विभिन्न वैष्णव ग्रंथों, संतों के प्रवचनों और पारंपरिक संकीर्तन पद्धतियों के आधार पर संकलित किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को भजन के केवल शब्दों से ही नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे गहरे दार्शनिक अर्थ से भी अवगत कराना है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 18, श्लोक 66)
- वृंदावन संकीर्तन परंपरा और वैष्णव भक्ति साहित्य
- साध्वी पूर्णिमा जी के आधिकारिक भजन संग्रह
संबंधित भजन एवं लेख
यदि आपको यह भजन पसंद आया है, तो आप हमारी वेबसाइट पर निम्नलिखित लेख और भजन भी पढ़ सकते हैं:
- श्री कृष्ण स्तोत्र - भगवान कृष्ण की स्तुति के लिए पावन मंत्र।
- ॐ जय जगदीश हरे आरती - दैनिक पूजा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण आरती।
- पार्वती स्तोत्र - मां पार्वती की दिव्य आराधना।
पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें