Parvati Stotram

बोले कोयलिया भईले भोर मईया -अंजलि भारद्वाज देवीगीत 2017 - Anjali Bhardwaj bhakti song new - BhaktiLok

134 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
आकार:
कंट्रास्ट:

"बोले कोयलिया भईले भोर मईया" आदिशक्ति माता दुर्गा, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती की स्तुति में रचा गया एक अत्यंत मधुर और भावपूर्ण देवीगीत है, जिसे वर्ष 2017 में लोकप्रिय भक्ति गायिका अंजलि भारद्वाज ने अपनी सुमधुर वाणी में प्रस्तुत किया। यह भजन जगत जननी की ममतामयी कृपा, दुष्टनाशिनी शक्ति और भक्त-वात्सल्य का गान करता है। सनातन परंपरा में स्त्री शक्ति को सृष्टि का आदि कारण माना गया है, और यह गीत उसी आदिशक्ति के चरणों में समर्पण का भाव जगाता है। जब भक्त प्रातःकालीन मंगल बेला में इस गीत को सुनता या गुनगुनाता है, तो उसके भीतर शक्ति, करुणा, तेज और पवित्रता का संचार होता है। यह गीत विशेष रूप से नवरात्रि, दुर्गा पूजा, मंगलवार और शुक्रवार के व्रत तथा घर के मंदिर में नित्य आरती के समय अत्यंत श्रद्धा भाव से गाया जाता है। इसकी लोकप्रियता का कारण इसका सरल बोल, लोकधुन की मिठास और माता के प्रति निश्छल भक्ति भाव है, जो श्रोता के हृदय को सीधे छू लेता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

बोले कोयलिया भईले भोर मईया

बोले कोयलिया भईले भोर मईया,
जागो जगत जननी भवानी मईया।
बोले कोयलिया भईले भोर मईया।।

चरणों में तेरे आया हूँ मैं मईया,
दुखड़े सारे मिटा दे मईया।
बोले कोयलिया भईले भोर मईया।।

तेरी महिमा अपरंपार है मईया,
तेरे बिना सब सूनापन है मईया।
बोले कोयलिया भईले भोर मईया।।

ज्योति जलाऊँ तेरे दरबार में मईया,
भक्ति का दीप जला दे मईया।
बोले कोयलिया भईले भोर मईया।।

शेरों वाली माता शेरावाली,
भक्तों के संकट हर ले मईया।
बोले कोयलिया भईले भोर मईया।।

लक्ष्मी सरस्वती काली रूप में,
दर्शन दे जगदंबे मईया।
बोले कोयलिया भईले भोर मईया।।

अंजलि भारद्वाज के स्वर में,
गूंजे तेरा जयकारा मईया।
बोले कोयलिया भईले भोर मईया।।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का प्रारंभिक मुखड़ा "बोले कोयलिया भईले भोर मईया" अत्यंत काव्यात्मक और प्रतीकात्मक है। कोयल की मधुर वाणी भारतीय परंपरा में मंगल बेला, वसंत आगमन और शुभ संदेश की प्रतीक मानी जाती है। जब कोयल बोलती है, तो इसका अर्थ है कि रात्रि का अंधकार समाप्त हो चुका है और प्रकाश की किरणें धरती पर उतर आई हैं। भक्त इस प्राकृतिक संकेत को माता के आगमन के रूप में देखता है और जगत जननी को जगाने की प्रार्थना करता है। यहाँ "जागो जगत जननी भवानी मईया" केवल माता को जगाने का आग्रह नहीं है, बल्कि भक्त के भीतर सुप्त चेतना को जागृत करने का प्रतीक है। भक्त कहता है कि हे मईया, अब प्रकाश का समय हो गया है, आप अपनी कृपा दृष्टि से मेरे जीवन के अंधकार को दूर कर दीजिए।

दूसरे अंतरे में भक्त अपनी पूर्ण समर्पण भावना व्यक्त करता है — "चरणों में तेरे आया हूँ मैं मईया, दुखड़े सारे मिटा दे मईया।" यह पंक्ति भक्ति के उस सर्वोच्च भाव को दर्शाती है जहाँ भक्त अपने अहंकार को त्यागकर माता के चरणों में स्वयं को अर्पित कर देता है। सनातन धर्म में शरणागति को मोक्ष का सर्वोच्च साधन माना गया है। जब भक्त पूर्ण विश्वास के साथ माता की शरण में जाता है, तो उसके सभी दुख स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। "तेरी महिमा अपरंपार है मईया" पंक्ति में भक्त माता की असीम महिमा को स्वीकार करता है और यह स्वीकारोक्ति ही उसकी भक्ति की गहराई को प्रकट करती है।

"ज्योति जलाऊँ तेरे दरबार में मईया, भक्ति का दीप जला दे मईया" — यह पंक्ति बाहरी दीपक के साथ-साथ भीतर के भक्ति दीपक को जलाने की प्रार्थना है। बाहरी ज्योति तो केवल प्रतीक है, वास्तविक ज्योति तो हृदय में भक्ति की ज्योति है। भक्त माता से प्रार्थना करता है कि वह उसके अंतःकरण में भक्ति का दीप प्रज्वलित कर दे, जिससे उसका जीवन सदा प्रकाशित रहे। "शेरों वाली माता शेरावाली, भक्तों के संकट हर ले मईया" में माता के शेरावाली स्वरूप का स्मरण किया गया है, जो भक्तों के समस्त संकटों का नाश करने वाली है। अंतिम अंतरों में भक्त माता को लक्ष्मी, सरस्वती और काली के रूप में स्मरण करता है, जो यह दर्शाता है कि आदिशक्ति ही समस्त देवियों का मूल स्वरूप है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह देवीगीत अपनी सरल भाषा, लोकधुन की मिठास और भक्ति भाव की गहराई के कारण श्रोताओं के हृदय में विशेष स्थान रखता है। इस भजन की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • आदिशक्ति का सर्वरूप वर्णन: भजन में माता को दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती और काली के रूप में स्मरण किया गया है, जो शक्ति उपासना की समग्रता को दर्शाता है।
  • शरणागति का भाव: भक्त पूर्ण समर्पण के साथ माता के चरणों में अपने दुखों को अर्पित करता है।
  • प्रकृति और भक्ति का संगम: कोयल की वाणी और भोर के प्रकाश को भक्ति से जोड़कर एक अद्भुत आध्यात्मिक चित्र प्रस्तुत किया गया है।
  • लोकसंगीत की परंपरा: यह गीत पारंपरिक लोकधुन पर आधारित है, जिससे यह जनमानस से सहज ही जुड़ जाता है।
  • सर्वसुलभ भक्ति: इसके बोल इतने सरल हैं कि बच्चे, बड़े, स्त्री-पुरुष सभी इसे सहजता से गा सकते हैं।

देवीभागवत पुराण और मार्कंडेय पुराण के अनुसार, माता की उपासना से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों पुरुषार्थों की सिद्धि होती है। इस भजन का नित्य श्रवण और गायन मन की नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और सकारात्मकता का संचार करता है। घर के वातावरण को पवित्र बनाने, मानसिक शांति प्राप्त करने और आत्मविश्वास जागृत करने में यह भजन अत्यंत प्रभावी माना जाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को गाने और सुनने का सर्वोत्तम समय प्रातःकालीन ब्रह्म मुहूर्त है, क्योंकि इसका मूल स्वर ही भोर और जागरण से जुड़ा है। स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद, घर के मंदिर में दीपक और धूप प्रज्वलित करके इस भजन का गायन करना चाहिए। नवरात्रि के नौ दिनों में, विशेषकर प्रतिपदा से नवमी तक, इस भजन का विशेष महत्व है। इसके अतिरिक्त मंगलवार, शुक्रवार, दुर्गा अष्टमी, नवमी, दीपावली और अन्य मंगल अवसरों पर भी इसका गायन शुभ माना जाता है।

गायन की विधि अत्यंत सरल है — पहले माता के चरणों में प्रणाम करें, फिर हाथ में पुष्प या अक्षत लेकर भजन प्रारंभ करें। भजन गाते समय मन को माता के चरणों में एकाग्र रखें। यदि संभव हो तो ढोलक, मंजीरा या घंटी के साथ गाएं, जिससे भक्ति भाव और भी गहरा हो जाता है। भजन के अंत में माता की आरती अवश्य करें और प्रसाद वितरित करें। जो भक्त नियमित रूप से इस भजन का श्रवण करते हैं, उनके जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन मुख्य रूप से आदिशक्ति माता दुर्गा को समर्पित है, जिन्हें जगत जननी भवानी कहा गया है। भजन में माता के लक्ष्मी, सरस्वती और काली स्वरूपों का भी स्मरण किया गया है, जो शक्ति उपासना की समग्रता को दर्शाता है।

इस भजन को वर्ष 2017 में प्रसिद्ध भक्ति गायिका अंजलि भारद्वाज ने अपनी मधुर वाणी में प्रस्तुत किया था। उनका यह देवीगीत श्रोताओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुआ और आज भी भक्ति संगीत के क्षेत्र में इसे विशेष स्थान प्राप्त है।

इस भजन का गायन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में सर्वोत्तम माना जाता है। इसके अतिरिक्त नवरात्रि, मंगलवार, शुक्रवार, दुर्गा अष्टमी और नवमी के दिन भी इसका विशेष महत्व है। नित्य आरती के समय भी इसे गाया जा सकता है।

शास्त्रों और परंपरा के अनुसार, माता की शरण में पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया भजन-कीर्तन भक्त की मनोकामनाओं को पूर्ण करता है। यह भजन भक्ति भाव जागृत करता है और माता की कृपा से जीवन के कष्टों को दूर करने में सहायक माना जाता है।

हाँ, श्रद्धा भाव से इस भजन का श्रवण करने मात्र से भी मन को शांति मिलती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। भक्ति संगीत का श्रवण मानसिक तनाव को कम करता है और आध्यात्मिक ऊर्जा को बढ़ाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख भक्तिलोक पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसमें भजन के मूल बोल, उनका सरल हिंदी भावार्थ, धार्मिक महत्व और गायन विधि को शास्त्रीय परंपरा एवं लोकप्रिय भक्ति साहित्य के संदर्भ में समझाया गया है। भजन के बोल लोक परंपरा में प्रचलित रूप में प्रस्तुत किए गए हैं, जिनमें क्षेत्रीय भाषा-शैली के कारण मामूली पाठ-भेद संभव है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ पढ़ें एवं श्रवण करें।

संबंधित भजन एवं लेख

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!