बाल काण्ड अध्याय 1

संक्षेप रामायण

बाल काण्ड का प्रथम सर्ग 'संक्षेप रामायण' के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें भगवान् राम की सम्पूर्ण जीवन-गाथा का संक्षिप्त रूप में वर्णन किया गया है। यह संवाद महर्षि वाल्मीकि और देवर्षि नारद के बीच होता है, जिसमें नारद जी राम के चरित्र, गुणों एवं लीलाओं का वर्णन करते हैं। इसी सर्ग में वाल्मीकि को रामायण लिखने की प्रेरणा मिलती है।

विवरण

यह सर्ग सम्पूर्ण रामायण का सार है। प्रारम्भ में भगवान् वाल्मीकि देवर्षि नारद से पूछते हैं कि क्या इस संसार में कोई सर्वगुण सम्पन्न, पराक्रमी, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवादी और दृढ़प्रतिज्ञ पुरुष है? तब नारद जी श्रीराम का आदर्श चरित्र प्रस्तुत करते हैं। वे राम के जन्म, बाललीलाओं, विश्वामित्र के यज्ञ-रक्षण, सीता स्वयंवर, परशुराम से संवाद, अयोध्या वापसी, केकयी के वरदान, वनवास, दण्डक वन यात्रा, सीता हरण, सुग्रीव मैत्री, वालि वध, हनुमान की खोज, लंका दहन, रावण वध एवं अयोध्या लौटकर राज्याभिषेक तक की सम्पूर्ण कथा संक्षेप में सुनाते हैं। इस प्रकार नारद जी द्वारा वर्णित इस संक्षिप्त रामकथा को सुनकर वाल्मीकि मुनि अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और उन्हें रामायण महाकाव्य की रचना करने की प्रेरणा मिलती है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग १ (संक्षेप रामायण)

ॐ श्री परमात्मने नमः
॥ अथ प्रथमः सर्गः ॥
(नारद-वाल्मीकि संवाद – संक्षेप रामायण)

❓ वाल्मीकि जी का प्रश्न – कौन है वह परम गुणवान् पुरुष?

॥ श्लोक १ ॥
तपःस्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम् ।
नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवम् ॥ १-१-१ ॥
पदच्छेदः – तपःस्वाध्यायनिरतम् = तप और स्वाध्याय में निरत; तपस्वी = तपस्वी; वाग्विदाम् = वक्ताओं में; वरम् = श्रेष्ठ; नारदम् = नारद को; परिपप्रच्छ = भली-भाँति पूछा; वाल्मीकिः = वाल्मीकि ने; मुनिपुङ्गवम् = मुनियों में श्रेष्ठ।
भावार्थ : तप और स्वाध्याय में लीन रहने वाले, तपस्वी, वक्ताओं में श्रेष्ठ, मुनिश्रेष्ठ नारद जी से महर्षि वाल्मीकि ने यह प्रश्न पूछा।
व्याख्या : यहाँ वाल्मीकि जी ने नारद जी की विशेषताएँ बताईं – वे तपस्या और स्वाध्याय में निरत हैं, अर्थात् सदा साधना और वेद-अध्ययन में लगे रहते हैं। साथ ही वे वक्ताओं में श्रेष्ठ हैं, अतः उनके पास सर्वोत्तम ज्ञान है। ऐसे महान् मुनि से वाल्मीकि जी ने प्रश्न किया, जो दर्शाता है कि वे जिज्ञासा से भरे हुए हैं।
॥ श्लोक २ ॥
को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् ।
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥ १-१-२ ॥
पदच्छेदः – कः = कौन है; नु = निश्चय ही; अस्मिन् = इस; साम्प्रतम् = वर्तमान में; लोके = लोक में; गुणवान् = गुणों से युक्त; कः = कौन है; च = और; वीर्यवान् = पराक्रमी; धर्मज्ञः = धर्म को जानने वाला; च = और; कृतज्ञः = उपकार मानने वाला; च = और; सत्यवाक्यः = सत्य बोलने वाला; दृढव्रतः = दृढ़ प्रतिज्ञा वाला।
भावार्थ : "इस वर्तमान लोक में कौन-सा पुरुष ऐसा है जो गुणवान् है, पराक्रमी है, धर्मज्ञ है, कृतज्ञ है, सत्यवादी है और दृढ़प्रतिज्ञ है?"
व्याख्या : वाल्मीकि जी के इस प्रश्न में आदर्श पुरुष के छः लक्षण गिनाए गए हैं – गुणवान् (शील-स्वभाव से सम्पन्न), वीर्यवान् (शारीरिक एवं मानसिक शक्ति से युक्त), धर्मज्ञ (धर्म के मर्म को जानने वाला), कृतज्ञ (किए हुए उपकार को मानने वाला), सत्यवाक्य (सत्य बोलने वाला), दृढ़व्रत (अपने संकल्प पर अटल रहने वाला)। ऐसे पुरुष की खोज में वाल्मीकि जी हैं।

🎙️ नारद जी का उत्तर – राम ही वह आदर्श पुरुष हैं

॥ श्लोक ३ ॥
श्रुत्वा वाक्यं तु वाल्मीकेः प्रत्युवाच महामुनिः ।
नारदो वाक्यतत्त्वज्ञस्तदिदं वदतां वरः ॥ १-१-३ ॥
पदच्छेदः – श्रुत्वा = सुनकर; वाक्यम् = वचन; तु = तो; वाल्मीकेः = वाल्मीकि का; प्रत्युवाच = उत्तर दिया; महामुनिः = महामुनि; नारदः = नारद ने; वाक्यतत्त्वज्ञः = वाक्य के तत्त्व को जानने वाले; तत् = वह; इदम् = यह; वदताम् = वक्ताओं में; वरः = श्रेष्ठ।
भावार्थ : वाल्मीकि जी के वचनों को सुनकर महामुनि नारद, जो वाक्यतत्त्व के ज्ञाता और वक्ताओं में श्रेष्ठ हैं, ने यह उत्तर दिया।
॥ श्लोक ४ ॥
बहवो दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुणाः ।
मुने वक्ष्याम्यहं बुद्ध्वा तैर्गुणैरुपबृंहितम् ॥ १-१-४ ॥
पदच्छेदः – बहवः = बहुत; दुर्लभाः = दुर्लभ; च = और; एव = ही; ये = जो; त्वया = तुम्हारे द्वारा; कीर्तिताः = कहे गए; गुणाः = गुण; मुने = हे मुने!; वक्ष्यामि = कहूँगा; अहम् = मैं; बुद्ध्वा = जानकर; तैः = उन; गुणैः = गुणों से; उपबृंहितम् = सम्पन्न पुरुष को।
भावार्थ : "हे मुने! तुमने जिन गुणों का वर्णन किया है, वे बहुत दुर्लभ हैं। मैं उन सब गुणों से सम्पन्न एक पुरुष का वर्णन करूँगा।"
व्याख्या : नारद जी कहते हैं कि वाल्मीकि द्वारा बताए गए गुण साधारण नहीं हैं – ये अत्यन्त दुर्लभ हैं। फिर भी एक ऐसा पुरुष है जो इन सबसे युक्त है। अब वे उसका परिचय देंगे।

🏹 राम का वंश, नाम एवं स्वरूप

॥ श्लोक ५ ॥
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः ।
नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान्धृतिमान्यशः ॥ १-१-५ ॥
पदच्छेदः – इक्ष्वाकुवंशप्रभवः = इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न; रामः = राम; नाम = नाम से; जनैः = लोगों द्वारा; श्रुतः = सुने गए; नियतात्मा = संयमित चित्त वाले; महावीर्यः = महान् पराक्रमी; द्युतिमान् = तेजस्वी; धृतिमान् = धैर्यवान्; यशः = यशस्वी।
भावार्थ : "इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न, राम नाम के एक पुरुष हैं, जो लोगों में प्रसिद्ध हैं। वे संयमित आत्मा वाले, महापराक्रमी, तेजस्वी, धैर्यवान् और यशस्वी हैं।"
॥ श्लोक ६ ॥
विद्वान् निपुणितो वाग्मी सुन्दरः स्मितभाषणः ।
महासेनो महाबुद्धिः सर्वलोकहिते रतः ॥ १-१-६ ॥
भावार्थ : "वे विद्वान्, निपुण, वाक्पटु, सुन्दर, मधुरभाषी, महान् सेनापति, महाबुद्धि और समस्त लोकों के हित में रत हैं।"
॥ श्लोक ७ ॥
आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः ।
स च सर्वगुणोपेतः कौसल्यानन्दवर्धनः ॥ १-१-७ ॥
भावार्थ : "वे आर्य (श्रेष्ठ चरित्र वाले), सबके प्रति समभाव रखने वाले, सदा प्रियदर्शन हैं। वे समस्त गुणों से युक्त, माता कौसल्या के आनन्द को बढ़ाने वाले हैं।"

📜 नारद-कथित संक्षिप्त रामायण (श्लोक ८ से ९८ तक)

राम का बाल्यकाल : राजा दशरथ के चार पुत्र – राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न। राम सबके प्रिय, सदा धर्म में स्थित।

विश्वामित्र का आगमन : विश्वामित्र ऋषि यज्ञरक्षा हेतु राम-लक्ष्मण को माँगते हैं। दशरथ अनिच्छा से भी सहमत होते हैं।

ताड़का-सुबाहु वध : राम ने ताड़का का वध किया, सुबाहु को मारा, मारीच को समुद्र के पार भगाया।

अहिल्या उद्धार : गौतम आश्रम में अहिल्या शापमुक्त हुईं। (यहाँ अहिल्या की कथा का संकेत)

जनकपुरी और सीता स्वयंवर : शिव-धनुष भंग, सीता-राम विवाह। परशुराम का क्रोध और शांति।

अयोध्या वापसी : राम का राज्याभिषेक निश्चित। केकयी का वरदान – राम वनवास, भरत राज्य।

वनवास : राम, सीता, लक्ष्मण वन गए। भरत मिलन, पादुका ग्रहण, नन्दिग्राम में निवास।

दण्डक वन : ऋषियों की तपोभूमि। शूर्पणखा का प्रसंग, खर-दूषण वध। रावण का षड्यंत्र – मारीच द्वारा स्वर्णमृग रूप, सीता हरण, जटायु वध।

राम का विलाप : सीता की खोज, कबन्ध वध, शबरी का आश्रम, पम्पा सरोवर।

सुग्रीव-मैत्री : ऋष्यमूक पर्वत पर मिलन, वालि-वध, सुग्रीव का राज्य।

हनुमान की लंका यात्रा : समुद्रलंघन, सीता से भेंट, अशोक वाटिका विध्वंस, लंका दहन।

रावण-वध : वानर सेना का सेतु-निर्माण, युद्ध, कुम्भकर्ण, मेघनाद, रावण का वध।

सीता की अग्निपरीक्षा : अयोध्या वापसी, भरत से मिलन, राज्याभिषेक, रामराज्य।

रामराज्य का वर्णन : प्रजा सुखी, न कोई दुःखी, धर्म की स्थापना।

📖 रामायण श्रवण-पठन का फल

॥ श्लोक ९९ ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
सर्वपापैः प्रमुच्येत ब्रह्मलोके महीयते ॥ १-१-९९ ॥
भावार्थ : जो इस रामायण को नित्य सुनता है और जो नित्य कीर्तन करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में महान् बनता है।
॥ श्लोक १०० ॥
रामायणमिदं पुण्यं यः पठेच्छृणुयादपि ।
सर्वपापैः प्रमुच्येत सर्वकामानवाप्नुयात् ॥ १-१-१०० ॥
भावार्थ : जो इस पवित्र रामायण को पढ़ता या सुनता है, वह सब पापों से छूट जाता है और सब मनोरथों को प्राप्त करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

इस प्रथम सर्ग का नाम ही "संक्षेप रामायण" है – यह सम्पूर्ण रामकथा का बीज है। जैसे वट-बीज में विशाल वृक्ष छिपा होता है, वैसे ही इन १०० श्लोकों में पूरे रामायण का सार समाया है। वाल्मीकि जी का प्रश्न यह दर्शाता है कि मनुष्य सदा आदर्श की खोज में रहता है। नारद जी राम के रूप में वह आदर्श प्रस्तुत करते हैं जो सर्वगुण-सम्पन्न है। इस प्रकार राम का चरित्र "मर्यादा पुरुषोत्तम" के रूप में स्थापित होता है।

इस सर्ग की एक और महत्त्वपूर्ण घटना है – वाल्मीकि को क्रौंच पक्षी के शोक से पहला श्लोक (मा निषाद प्रतिष्ठां त्वम्...) की प्राप्ति, जो इसी सर्ग के अन्तर्गत आती है (हालाँकि वह इस सर्ग के अन्त में या अगले सर्ग में आती है, परम्परा के अनुसार यहाँ उल्लेखनीय है)। उस श्लोक से वाल्मीकि को छन्दों की रचना की प्रेरणा मिली और उन्होंने सम्पूर्ण रामायण की रचना की।

इस प्रकार यह सर्ग रामायण का आधार-स्तम्भ है – इसे पढ़ने मात्र से सम्पूर्ण रामकथा का ज्ञान हो जाता है और अशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

इस अध्याय के लोकप्रिय श्लोक

श्लोक 1

239

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥…

“हे निषाद! तूने काममोहित क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार डाला, इसलिए तू कभ…”

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श्लोक 3

150

कोऽस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् । धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥…

“इस समय इस संसार में कौन गुणवान्, कौन वीर्यवान्, कौन धर्मज्ञ, कौन कृतज्ञ, कौन सत्…”

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श्लोक 16

126

तस्य भ्राता चतुर्वर्षात् लक्ष्मणः शत्रुसूदनः। भरतश्च शत्रुघ्नश्च सर्वे रामानुजाः प्रियाः॥…

“उनके चार भाई हैं – लक्ष्मण (शत्रुसूदन), भरत और शत्रुघ्न। ये सभी राम के अनुज (छोट…”

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श्लोक 60

107

रामोऽपि बहुवर्षाणि राज्यं कृत्वा महायशाः । सभ्राता सह सीतेन स्वर्गलोकं जगाम ह ॥…

“राम ने भी बहुत वर्षों तक राज्य करके महान् यश प्राप्त किया, और फिर भाइयों सहित तथ…”

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श्लोक 23

101

तेषां रामो महातेजा लक्ष्मणश्च महाबलः । भरतः शत्रुघ्नश्चैव वीर्यवन्तो महारथाः ॥…

“उनमें राम महातेजस्वी थे, लक्ष्मण महाबली थे, तथा भरत और शत्रुघ्न भी महारथी और परा…”

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अध्याय के श्लोक

श्लोक 81

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यः पठेदेकमप्यत्र श्लोकं रामायणस्य तु । स याति रामसालोक्यं रामचन्द्रप्रसादतः ॥
हिंदी अर्थ: जो इस रामायण के एकमात्र श्लोक को भी पढ़ता है, वह रामचन्द्र की कृपा से राम के सालोक्य (समान लोक) को प्राप्त होता है।
रामायण का एक श्लोक भी पढ़ने से रामसालोक्य की प्राप्ति होती है।

श्लोक 82

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धर्मार्थकाममोक्षाणां रामायणमिति स्मृतम् । यः पठेत् प्रयतो नित्यं स सर्वं लभते नरः ॥
हिंदी अर्थ: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए रामायण स्मरण किया जाता है। जो नित्य संयमपूर्वक पढ़ता है, वह मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर लेता है।
रामायण चारों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) प्रदान करता है।

श्लोक 83

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मनःशुद्धिकरं पुण्यं पापघ्नं सुखदं शुभम् । रामायणमिदं दिव्यं सर्वरोगापहं नृणाम् ॥
हिंदी अर्थ: यह दिव्य रामायण मन की शुद्धि करने वाला, पुण्यमय, पापनाशक, सुखदायक, शुभ और मनुष्यों के सभी रोगों का नाश करने वाला है।
रामायण के गुण – मन:शुद्धि, पापनाश, सुख, शुभता और रोगनाश।

श्लोक 84

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कल्पवृक्षसमं पुण्यं रामायणमनुत्तमम् । सर्वकामप्रदं नृणां सर्वपापहरं शुभम् ॥
हिंदी अर्थ: कल्पवृक्ष के समान पुण्यमय, अनुपम रामायण मनुष्यों के लिए सभी कामनाओं को देने वाला, सभी पापों को हरने वाला और शुभ है।
रामायण की तुलना कल्पवृक्ष से – सर्वकामनाप्रद और पापहर।

श्लोक 85

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रामायणरताः सन्तो धन्या रामपदे रताः । तेषां वै रामसायुज्यं रामेण सह मोदते ॥
हिंदी अर्थ: रामायण में रत रहने वाले सन्त (सज्जन) धन्य हैं, जो राम के चरणों में रत हैं। उन्हीं को राम का सायुज्य (एकरूपता) प्राप्त होता है और वे राम के साथ आनन्दित होते हैं।
रामायण में रत सज्जन रामसायुज्य प्राप्त करते हैं।

श्लोक 86

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इतिहासोत्तमे ह्यस्मिन् रामायणे महात्मनः । रामचन्द्रस्य चरितं वर्णितं पापनाशनम् ॥
हिंदी अर्थ: इस उत्तम इतिहास रामायण में महात्मा रामचन्द्र का पापनाशक चरित्र वर्णित है।
रामायण में रामचन्द्र का पापनाशक चरित्र वर्णित है।

श्लोक 87

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सर्वदानफलं यस्मात् प्राप्नोति शृण्वतां नरः । रामायणकथां पुण्यां तस्माच्छृणुयादादरात् ॥
हिंदी अर्थ: जिससे सुनने वाला मनुष्य सभी दानों का फल प्राप्त कर लेता है, उस पुण्यमय रामायण कथा को इसलिए आदरपूर्वक सुनना चाहिए।
रामायण श्रवण से सभी दानों का फल मिलता है।

श्लोक 88

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यः शृणोति सदा भक्त्या रामायणमनुत्तमम् । स सर्वपापनिर्मुक्तो रामलोके महीयते ॥
हिंदी अर्थ: जो सदा भक्तिपूर्वक इस अनुपम रामायण को सुनता है, वह सब पापों से मुक्त होकर रामलोक में पूजित होता है।
भक्तिपूर्वक रामायण सुनने से पापमुक्ति और रामलोक की प्राप्ति।

श्लोक 89

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अनेकयज्ञदानानां तपसां च फलं लभेत् । रामायणमिदं पुण्यं यः पठेत् शृणुयादपि ॥
हिंदी अर्थ: अनेक यज्ञों, दानों और तपों का जो फल होता है, वह फल इस पुण्यमय रामायण को जो पढ़ता या सुनता है, उसे प्राप्त होता है।
रामायण पाठ या श्रवण से अनेक यज्ञों, दानों और तपों का फल मिलता है।

श्लोक 90

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इति संक्षेपरामायं प्रथमः सर्ग उच्यते । यस्य श्रवणमात्रेण पापं नश्यति तत्क्षणात् ॥
हिंदी अर्थ: इस प्रकार संक्षेप रामायण का प्रथम सर्ग कहा जाता है, जिसके मात्र श्रवण मात्र से पाप तत्क्षण नष्ट हो जाता है।
संक्षेप रामायण के प्रथम सर्ग का समापन और उसकी महिमा।

श्लोक 91

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प्रथमे सर्गमाहात्म्यं शृणुयाद्यः सदा नरः । स रामभक्तिं लभते रामलोकं च गच्छति ॥
हिंदी अर्थ: जो मनुष्य प्रथम सर्ग की महिमा को सदा सुनता है, वह रामभक्ति प्राप्त करता है और रामलोक को जाता है।
प्रथम सर्ग के माहात्म्य को सुनने से रामभक्ति और रामलोक की प्राप्ति होती है।

श्लोक 92

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य इदं कीर्तयेद् भक्त्या प्रथमं सर्गमुत्तमम् । तस्य पुण्यफलं वक्तुं न शक्यं वर्षकोटिभिः ॥
हिंदी अर्थ: जो भक्तिपूर्वक इस उत्तम प्रथम सर्ग का कीर्तन करता है, उसके पुण्यफल को करोड़ों वर्षों में भी नहीं कहा जा सकता।
प्रथम सर्ग के कीर्तन का फल अपरिमित है।

श्लोक 93

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प्रथमे सर्गमाहात्म्यं सर्वविघ्नविनाशनम् । रामप्रसादजननं सर्वसम्पत्करं शुभम् ॥
हिंदी अर्थ: प्रथम सर्ग की महिमा सभी विघ्नों का नाश करने वाली, राम की कृपा उत्पन्न करने वाली, सभी सम्पत्तियाँ देने वाली और शुभ है।
प्रथम सर्ग की महिमा के गुण – विघ्ननाश, रामकृपा, सर्वसम्पत्कर, शुभ।

श्लोक 94

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कलियुगे पापबहुले रामायणकथा शुभा । नराणां मुक्तिदा प्रोक्ता प्रथमसर्ग एव च ॥
हिंदी अर्थ: पापबहुल कलियुग में रामायण की शुभ कथा मनुष्यों के लिए मुक्तिदायिनी कही गई है, और विशेष रूप से प्रथम सर्ग ही (मुक्तिदायक है)।
कलियुग में रामायण कथा और विशेष रूप से प्रथम सर्ग मुक्तिदायक है।

श्लोक 95

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सर्वशास्त्रसारभूतं रामायणमनुत्तमम् । तस्य प्रथमसर्गोऽयं सर्वपापप्रणाशनः ॥
हिंदी अर्थ: सर्वशास्त्रों के सारभूत अनुपम रामायण का यह प्रथम सर्ग सभी पापों का नाश करने वाला है।
रामायण के प्रथम सर्ग की महिमा – सर्वपापनाशक।

श्लोक 96

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गृहस्थेन सदा पुण्यं प्रथमं सर्गमुत्तमम् । पठितव्यं प्रयत्नेन रामप्रीत्यर्थमादरात् ॥
हिंदी अर्थ: गृहस्थ को सदा इस पुण्यमय उत्तम प्रथम सर्ग का प्रयत्नपूर्वक और आदर के साथ पाठ करना चाहिए, राम को प्रसन्न करने के लिए।
गृहस्थों के लिए प्रथम सर्ग पाठ का विधान।

श्लोक 97

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दिवसे दिवसे यस्तु प्रथमं सर्गमुत्तमम् । पठेत् तस्य दिने पापं नश्यत्येव न संशयः ॥
हिंदी अर्थ: जो प्रतिदिन इस उत्तम प्रथम सर्ग का पाठ करता है, उसके उस दिन का पाप नष्ट हो जाता है, इसमें संशय नहीं।
प्रतिदिन प्रथम सर्ग पढ़ने से उस दिन का पाप नष्ट होता है।

श्लोक 98

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इच्छति यत् फलं यस्तु तत् सर्वं लभते नरः । प्रथमं सर्गमासाद्य रामायणस्य कीर्तनात् ॥
हिंदी अर्थ: मनुष्य जिस फल की इच्छा करता है, वह सब कुछ उसे प्राप्त होता है, रामायण के प्रथम सर्ग का कीर्तन करके।
प्रथम सर्ग के कीर्तन से मनुष्य की सभी इच्छाएँ पूरी होती हैं।

श्लोक 99

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आयुः कीर्तिं यशश्चैव धनं धान्यं सुतान् पशून् । प्रयच्छति नरेन्द्रस्य प्रथमसर्गकीर्तनात् ॥
हिंदी अर्थ: प्रथम सर्ग के कीर्तन से राजाओं को आयु, कीर्ति, यश, धन, धान्य, पुत्र और पशु प्राप्त होते हैं।
प्रथम सर्ग के कीर्तन से राजाओं को आयु, कीर्ति, यश, धन, धान्य, पुत्र और पशु मिलते हैं।

श्लोक 100

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इति श्रीमद्वाल्मीकीये रामायणे बालकाण्डे संक्षेपरामायणं नाम प्रथमः सर्गः ॥
हिंदी अर्थ: इस प्रकार श्रीमद् वाल्मीकीय रामायण के बालकाण्ड में संक्षेप रामायण नामक प्रथम सर्ग समाप्त हुआ।
बालकाण्ड के प्रथम सर्ग का समापन।