संक्षेप रामायण – श्लोक 85
संस्कृत श्लोक
रामायणरताः सन्तो धन्या रामपदे रताः । तेषां वै रामसायुज्यं रामेण सह मोदते ॥
हिंदी अनुवाद
रामायण में रत रहने वाले सन्त (सज्जन) धन्य हैं, जो राम के चरणों में रत हैं। उन्हीं को राम का सायुज्य (एकरूपता) प्राप्त होता है और वे राम के साथ आनन्दित होते हैं।
अर्थ / व्याख्या
रामायण में रत सज्जन रामसायुज्य प्राप्त करते हैं।
टिप्पणी
यह श्लोक रामायण के अनुरागियों के उच्चतम फल का वर्णन करता है।
॥ श्लोक ८५ – रामायणरत सज्जनों को रामसायुज्य की प्राप्ति ॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : रामायण में रत रहने वाले सन्त (सज्जन) धन्य हैं, जो राम के चरणों में रत हैं। उन्हीं को राम का सायुज्य (एकरूपता) प्राप्त होता है और वे राम के साथ आनन्दित होते हैं।
🔹 English Translation : Those virtuous ones who delight in the Ramayana are blessed, who are devoted to the feet of Rama. They alone attain Sayujya (oneness) with Rama and rejoice with Him.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| रामायणरताः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | रामायण में रत |
| सन्तः | पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | सज्जन |
| धन्याः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | धन्य |
| रामपदे | नपुंसकलिंग, सप्तमी एकवचन | राम के चरणों में |
| रताः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | रत |
| तेषाम् | सर्वनाम, पुल्लिंग, षष्ठी बहुवचन | उनको |
| वै | अव्यय | ही |
| रामसायुज्यम् | नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचन | राम का सायुज्य (एकरूपता) |
| रामेण | पुल्लिंग, तृतीया एकवचन | राम के साथ |
| सह | अव्यय | साथ |
| मोदते | लट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (मुद् धातु) | आनन्दित होते हैं |
📜 ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व
यह श्लोक रामायण के प्रति अनुराग (रति) को सर्वोच्च फल – सायुज्य मुक्ति – से जोड़ता है। सायुज्य का अर्थ है भगवान् में एकरूप हो जाना, उनमें लीन हो जाना। यह चार प्रकार की मुक्तियों में सर्वोच्च मानी जाती है। यहाँ कहा गया है कि रामायण में रत रहने वाले सज्जन, जो राम के चरणों में रत हैं, वे ही रामसायुज्य प्राप्त करते हैं और राम के साथ आनन्दित होते हैं।
यह श्लोक भक्ति की पराकाष्ठा को दर्शाता है। रामायण में रत रहने का अर्थ है निरन्तर रामकथा में लीन रहना, उसका चिन्तन करना, उसके रस में डूबे रहना। ऐसे भक्त राम के चरणों में रत रहते हैं, अर्थात् उनके अतिरिक्त किसी और में उनकी आसक्ति नहीं होती। फलस्वरूप वे राम में लीन हो जाते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से, रामायण का निरन्तर श्रवण-मनन चित्त को एकाग्र करता है और अन्ततः समाधि की ओर ले जाता है, जो सायुज्य का ही रूप है।
॥ रामायणरता ये ते हि धन्या रामपदे रताः ॥
जय श्री राम 🙏