राम की कहानी – श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
राक्षसीतर्जनं चैव च्छायाग्राहस्य दर्शनम् । सिंहिकायाश्च निधनं लङ्कामलयदर्शनम् ॥
हिंदी अनुवाद
राक्षसियों (लंकिनी) की धमकी, छायाग्राह (सिंहिका) का दर्शन, सिंहिका का वध तथा लंका और मलय पर्वत का दर्शन।
अर्थ / व्याख्या
लंका पहुँचने पर हनुमान का सामना लंका की रक्षिका राक्षसी लंकिनी से हुआ, जिसने उन्हें रोका। हनुमान ने उसे मारा। आगे बढ़ने पर उन्हें छायाग्राही राक्षसी सिंहिका दिखी, जिसका उन्होंने वध किया। अंत में उन्होंने लंका और मलय पर्वत का दर्शन किया।
टिप्पणी
यह श्लोक लंका में प्रवेश से पूर्व हनुमान की अंतिम बाधाओं और उनकी विजय का वर्णन करता है। लंकिनी का दमन लंका की सुरक्षा व्यवस्था के भेदन का प्रतीक है। सिंहिका का वध उनके ज्ञान और सतर्कता को दर्शाता है। अंत में लंका का दर्शन उनके मिशन के सफलतापूर्वक लक्ष्य तक पहुँचने का सूचक है।
॥ श्री रामायण – बाल काण्ड – अध्याय ३ – श्लोक २८ ॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : राक्षसियों (लंकिनी) की धमकी, छायाग्राह (सिंहिका) का दर्शन, सिंहिका का वध तथा लंका और मलय पर्वत का दर्शन।
🔹 English Translation : The threatening of the demoness (Lankini), the sight of the shadow-catcher (Simhika), the killing of Simhika, and the sight of Lanka and the Malaya mountain.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| राक्षसीतर्जनम् | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | राक्षसी (लंकिनी) की तर्जना (धमकी या उसका डाँटना) |
| चैव | अव्यय | और भी |
| च्छायाग्राहस्य | पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | छायाग्राह (सिंहिका) का |
| दर्शनम् | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | दर्शन |
| सिंहिकायाः | स्त्रीलिंग, षष्ठी एकवचन | सिंहिका का |
| च | अव्यय | और |
| निधनम् | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | निधन, वध, मृत्यु |
| लङ्कामलयदर्शनम् | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | लंका और मलय पर्वत का दर्शन |
📖 व्याख्या एवं महत्व
जैसे ही हनुमान ने लंका की सीमा में प्रवेश किया, उनका सामना लंकिनी नामक राक्षसी से हुआ, जो लंका की अधिष्ठात्री देवी थी। उसने हनुमान को रोका और उनसे युद्ध किया। हनुमान ने उसे एक मुष्टिका प्रहार से मार गिराया, जिसके बाद उसने भविष्यवाणी की कि अब लंका का विनाश निश्चित है। यह घटना अधर्म के पतन की सूचक है। आगे बढ़ने पर, समुद्र में यात्रा के दौरान ही, एक और भयानक राक्षसी सिंहिका ने उनकी छाया पकड़ ली। सिंहिका अपनी छाया से ग्रसित वस्तुओं को अपनी ओर खींच लेती थी। हनुमान ने तुरंत अपने ज्ञान का परिचय देते हुए उसके मुख के अंदर प्रवेश किया और अपने शरीर को इतना बढ़ा लिया कि उसके प्राण निकल गए। यह वध उनकी बुद्धि और बल का अद्भुत संगम था। इन बाधाओं को पार करते हुए, हनुमान अंततः लंका नगरी और उसके समीप स्थित मलय पर्वत पर पहुँच गए। लंका का यह दर्शन उनके लिए अपने मिशन के सबसे महत्वपूर्ण भाग की शुरुआत थी - सीता की खोज।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि लक्ष्य की प्राप्ति में कई बाधाएँ आती हैं, लेकिन बुद्धि, बल और धैर्य से उन्हें पार किया जा सकता है। लंकिनी और सिंहिका का वध अधर्म पर धर्म की विजय का पूर्वाभास देता है।