बाल काण्ड अध्याय 3 | 30 श्लोक

राम की कहानी

बाल काण्ड का तीसरा सर्ग राम के जन्म से लेकर उनके विवाह तक की संक्षिप्त कथा प्रस्तुत करता है। इसमें राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ, राम आदि चारों पुत्रों के जन्म, उनकी बाल लीलाओं, गुरु वशिष्ठ द्वारा शिक्षा, ऋषि विश्वामित्र के आगमन और उनके साथ राम-लक्ष्मण के प्रस्थान की पृष्ठभूमि का वर्णन है।

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श्रुत्वा वस्तु समग्रं तद्धर्मार्थसहितं हितम् । व्यक्तमन्वेषते भूयो यद् वृत्तं तस्य धीमतः ॥

“धर्म और अर्थ से युक्त उस सम्पूर्ण हितकर वृत्तान्त को सुनकर, वे धीमान (वाल्मीकि) उसके (राम के) चरित्र के बारे में और अधिक स्पष्ट रूप से जानना चाहते हैं।”

अर्थ: यह श्लोक वाल्मीकि की जिज्ञासा को दर्शाता है, जो नारद से रामकथा का संक्षेप सुनने के बाद उसके विस्तार को जानने की इच्छा रखते हैं।

टिप्पणी: प्रथम श्लोक में वाल्मीकि की मानसिक स्थिति का वर्णन है। वे नारद से राम के चरित्र का संक्षिप्त विवरण सुन चुके हैं और अब उसी का विस्तार से जानने के लिए उत्सुक हैं। यह जिज्ञासा ही आगे चलकर रामायण के महाकाव्य के रचना का कारण बनती है।

उपस्पृश्योदकं सम्यङ्मुनिः स्थित्वा कृताञ्जलिः । प्राचीनाग्रेषु दर्भेषु धर्मेणान्वेषते गतिम् ॥

“जल से स्पर्श (आचमन) करके, मुनि (वाल्मीकि) पूर्व की ओर अग्रभाग वाले दर्भों पर खड़े होकर हाथ जोड़कर धर्मपूर्वक (राम के चरित्र की) गति (प्रवृत्ति) का अन्वेषण करते हैं।”

अर्थ: यह श्लोक वाल्मीकि द्वारा रामकथा के दिव्य दर्शन के लिए किए गए आचमन, ध्यान और संकल्प का वर्णन करता है।

टिप्पणी: द्वितीय श्लोक में वाल्मीकि की तपस्या एवं योग साधना का वर्णन है। वे पवित्रता और धर्म के साथ राम के चरित्र का साक्षात्कार करने के लिए तैयार होते हैं।

रामलक्ष्मणसीताभी राज्ञा दशरथेन च । सभार्येण सराष्ट्रेण यत् प्राप्तं तत्र तत्त्वतः ॥

“राम, लक्ष्मण, सीता के साथ-साथ राजा दशरथ द्वारा, पत्नी (कौसल्या आदि) सहित और राष्ट्र सहित जो कुछ भी प्राप्त किया गया (अनुभव किया गया), उस सबको वहाँ (ध्यान में) तत्त्वतः देखते हैं।”

अर्थ: इस श्लोक में वाल्मीकि अपने ध्यान में राम, लक्ष्मण, सीता, दशरथ, उनकी पत्नियों और सम्पूर्ण राज्य के साथ घटित समस्त घटनाओं का यथार्थ दर्शन करते हैं।

टिप्पणी: तृतीय श्लोक में वाल्मीकि के योगजन्य दर्शन का विस्तार आरंभ होता है। वे केवल राम को ही नहीं, बल्कि लक्ष्मण, सीता, दशरथ, उनकी पत्नियाँ (सभार्येण) और सम्पूर्ण अयोध्या राज्य (सराष्ट्रेण) को भी उनके साथ देखते हैं।

हसितं भाषितं चैव गतिर्यावच्च चेष्टितम् । तत् सर्वं धर्मवीर्येण यथावत् संप्रपश्यति ॥

“हँसना, बोलना, चाल और जितनी भी चेष्टाएँ थीं, उन सबको (वाल्मीकि) धर्म के प्रभाव से यथावत् (जैसे-का-तैसा) भलीभाँति देखते हैं।”

अर्थ: इस श्लोक में वाल्मीकि धर्मबल से राम एवं अन्य पात्रों के समस्त व्यवहार, हाव-भाव और क्रियाकलापों को यथारूप देखते हैं।

टिप्पणी: चतुर्थ श्लोक में वाल्मीकि के दर्शन का और विस्तार हुआ है। वे केवल घटनाओं को ही नहीं, बल्कि पात्रों के हाव-भाव, बोलने के ढंग, चाल-ढाल और समस्त चेष्टाओं को भी यथारूप देखते हैं। "धर्मवीर्येण" का अर्थ है धर्म के बल से, यह दर्शाता है कि यह दर्शन उनकी तपस्या एवं धर्मपरायणता का फल है।

स्त्रीतृतीयेन च तथा यत् प्राप्तं चरता वने । सत्यसन्धेन रामेण तत् सर्वं चान्ववैक्षत ॥

“और इसी प्रकार (उन्होंने) उस सत्यसन्ध राम के द्वारा, जो दो स्त्रियों (सीता और लक्ष्मण?) के साथ वन में विचरण करते हुए जो कुछ प्राप्त किया गया (अनुभव किया), उस सबका भी अनुवीक्षण किया (ध्यान से देखा)।”

अर्थ: इस श्लोक में वाल्मीकि वनवास के दौरान राम, सीता और लक्ष्मण द्वारा अनुभव की गई समस्त घटनाओं का साक्षात्कार करते हैं।

टिप्पणी: पाँचवें श्लोक में वाल्मीकि राम के वनगमन एवं वनवास के दृश्यों को देखते हैं। "स्त्रीतृतीयेन" का अर्थ है दो स्त्रियों के साथ? यहाँ संदर्भ है राम के साथ सीता और लक्ष्मण। लक्ष्मण को भी स्त्रीवाचक शब्द से क्यों संबोधित किया? वस्तुतः यहाँ "स्त्रीतृतीयेन" का तात्पर्य है "जिसके साथ दो स्त्रियाँ हैं" – सीता और लक्ष्मण (लक्ष्मण को स्त्रीवत् समझा गया है क्योंकि वे राम की सेवा में सदा साथ रहते थे? या यह एक विशेषण है जो बताता है कि राम के साथ तीन लोग थे – राम स्वयं और दो अन्य (सीता और लक्ष्मण)। कुछ टीकाओं में "स्त्रीतृतीय" का अर्थ "स्त्री के रूप में तीसरा" अर्थात् लक्ष्मण जो राम की पत्नी की भाँति सेवा में तत्पर थे, ऐसा भी व्याख्यायित किया गया है।

ततः पश्यति धर्मात्मा तत् सर्वं योगमास्थितः । पुरा यत् तत्र निर्वृत्तं पाणावामलकं यथा ॥

“तत्पश्चात् योग में स्थित हुए उस धर्मात्मा (वाल्मीकि) ने वह सब कुछ देखा, जो पूर्वकाल में वहाँ (राम के जीवन में) घटित हुआ था, जैसे हाथ की आँवले की भाँति स्पष्ट।”

अर्थ: इस श्लोक में वाल्मीकि की योगजन्य दिव्य दृष्टि का फल बताया गया है – उन्होंने सम्पूर्ण रामकथा को ऐसे स्पष्ट देखा जैसे हाथ में आँवला हो।

टिप्पणी: छठा श्लोक योग के माध्यम से दिव्य दर्शन की पराकाष्ठा को व्यक्त करता है। वाल्मीकि ने ध्यानयोग में स्थित होकर राम के सम्पूर्ण जीवन को, जो अतीत में घटित हुआ, वर्तमान की भाँति स्पष्ट देखा। "पाणावामलकं यथा" एक प्रसिद्ध उपमा है – जैसे हाथ में रखा आँवला स्पष्ट दिखता है, वैसे ही उन्हें सब कुछ स्पष्ट दिखा।

तत् सर्वं तत्त्वतो दृष्ट्वा धर्मेण स महामतिः । अभिरामस्य रामस्य तत् सर्वं कर्तुमुद्यतः ॥

“उस महामति (वाल्मीकि) ने धर्मपूर्वक उस सबको तत्त्वतः देखकर, उस अभिराम (सुन्दर) राम के सम्पूर्ण चरित्र को रचने के लिए उद्यत हो गए।”

अर्थ: इस श्लोक में वाल्मीकि के रामायण रचना के लिए उद्यत होने का वर्णन है। वे राम के सम्पूर्ण चरित्र का यथार्थ दर्शन कर चुके हैं और अब उसे काव्यबद्ध करने के लिए तैयार हैं।

टिप्पणी: सातवाँ श्लोक संकल्प का है। वाल्मीकि ने सम्पूर्ण रामकथा का यथार्थ दर्शन कर लिया है और अब वे उसे काव्य के रूप में प्रस्तुत करने के लिए उद्यत हैं। "अभिरामस्य रामस्य" – राम अभिराम हैं, अर्थात् अत्यन्त सुन्दर और मनोहर। उनके इस मनोहर चरित्र को वाल्मीकि काव्य में उतारना चाहते हैं।

कामार्थगुणसंयुक्तं धर्मार्थगुणविस्तरम् । समुद्रमिव रत्नाढ्यं सर्वश्रुतिमनोहरम् ॥

“(वह रामायण) काम, अर्थ और गुणों से युक्त, धर्म, अर्थ और गुणों का विस्तार करने वाली, रत्नों से भरे समुद्र के समान तथा सभी श्रोताओं के मन को हरने वाली है।”

अर्थ: इस श्लोक में रामायण की विशेषताओं का वर्णन है – यह चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) से युक्त, रत्नाकर समुद्र के समान अमूल्य तथा सबको मनोहर है।

टिप्पणी: आठवाँ श्लोक रामायण की महिमा का गान है। यह काव्य काम, अर्थ और गुणों से संयुक्त है, अर्थात् इसमें मानव जीवन के सभी पहलुओं का समावेश है। साथ ही यह धर्म, अर्थ और गुणों का विस्तार करता है। इसे सुनने से सभी को आनन्द प्राप्त होता है। इसे रत्नों से भरे समुद्र की उपमा दी गई है – जैसे समुद्र में असंख्य रत्न होते हैं, वैसे ही रामायण में ज्ञान, भक्ति, नीति आदि के असंख्य रत्न भरे हैं।

स यथा कथितं पूर्वं नारदेन महात्मना । रघुवंशस्य चरितं चकार भगवान् मुनिः ॥

“उस भगवान् मुनि (वाल्मीकि) ने उसी प्रकार रघुवंश के चरित्र की रचना की, जैसे पूर्व में महात्मा नारद ने (उसे) कहा था।”

अर्थ: यह श्लोक बताता है कि वाल्मीकि ने रामायण की रचना नारद द्वारा बताए गए संक्षिप्त वृत्तान्त के अनुरूप ही की।

टिप्पणी: नवम श्लोक में स्पष्ट किया गया है कि वाल्मीकि ने रामायण की रचना नारद द्वारा दिए गए सार के अनुरूप ही की। यहाँ "भगवान् मुनिः" से वाल्मीकि की महिमा का बोध होता है। उन्होंने रघुवंश के चरित्र को काव्यरूप दिया।

श्लोक 10

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जन्म रामस्य सुमहद्वीर्यं सर्वानुकूलताम् । लोकस्य प्रियतां क्षान्तिं सौम्यतां सत्यशीलताम् ॥

“राम का जन्म, महान वीरता, सबके अनुकूल होना, लोक में प्रियता, क्षमा, सौम्यता और सत्यशीलता (इन सबका वर्णन किया)।”

अर्थ: दसवाँ श्लोक उन विषयों का उल्लेख करता है जिनका वर्णन रामायण में किया जाएगा – राम का जन्म, वीरता, सर्वानुकूलता, प्रियता, क्षमा, सौम्यता और सत्यशीलता।

टिप्पणी: दसवाँ श्लोक उन गुणों की सूची देता है जो राम में थे और जिनका वर्णन रामायण में किया जाएगा। यह श्लोक अगले सर्गों के लिए भूमिका का कार्य करता है। राम के चरित्र के ये गुण ही उन्हें मर्यादापुरुषोत्तम बनाते हैं।

श्लोक 11

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नाना चित्राः कथाश्चान्या विश्वामित्रसहायने । जानक्याश्च विवाहं च धनुषश्च विभेदनम् ॥

“विश्वामित्र की सहायता में अनेक प्रकार की विचित्र कथाएँ, जानकी का विवाह और धनुष का तोड़ना।”

अर्थ: यह श्लोक बालकाण्ड के तीसरे सर्ग (संक्षेप रामायण) का ग्यारहवाँ श्लोक है। इसमें उन घटनाओं का संकेत है जो विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के दौरान घटित हुईं – अनेक विचित्र कथाएँ (जैसे गंगा का प्राकट्य, इत्यादि), फिर जानकी (सीता) का स्वयंवर और शिव-धनुष का भंग। ये सभी घटनाएँ राम के बाल-चरित्र के प्रमुख अंश हैं।

टिप्पणी: इस श्लोक में वर्णित "विश्वामित्रसहायने" का तात्पर्य है – जब विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को अपने आश्रम ले गए, वहाँ उन्होंने यज्ञ की रक्षा की, राक्षसों का वध किया, और मार्ग में अनेक आख्यान सुनाए। "जानक्याश्च विवाह" एवं "धनुषो विभेदन" सीता-स्वयंवर की ओर संकेत करते हैं, जहाँ राम ने शिव-धनुष को तोड़ा था।

श्लोक 12

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रामरामविवादं च गुणान् दाशरथेस्तथा । तथाभिषेकं रामस्य कैकेय्या दुष्टभावताम् ॥

“राम-राम (परशुराम) का विवाद, दशरथपुत्र राम के गुण, राम का अभिषेक और कैकेयी की दुष्टभावना।”

अर्थ: यह श्लोक राम के जीवन की अगली महत्वपूर्ण घटनाओं को संक्षेप में बताता है: परशुराम से विवाद (सीता-स्वयंवर के बाद), राम के गुणों का वर्णन, अयोध्या में राम के राज्याभिषेक की तैयारी, और कैकेयी द्वारा उसमें बाधा डालने की दुष्टता।

टिप्पणी: इस श्लोक में "रामरामविवाद" से तात्पर्य है – सीता-स्वयंवर के बाद जब परशुराम जी क्रोधित होकर आए, तो श्रीराम ने उनका गर्व भंग किया। "गुणान् दाशरथेः" राम के सभी सद्गुणों की ओर संकेत करता है। "अभिषेकं रामस्य" वह अवसर है जब दशरथ ने राम को युवराज बनाने का निश्चय किया, और "कैकेय्या दुष्टभावता" कैकेयी द्वारा मंथरा के बहकावे में आकर राम के वनवास की माँग करना।

श्लोक 13

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विघातं चाभिषेकस्य रामस्य च विवासनम् । राज्ञः शोकं विलापं च परलोकस्य चाश्रयम् ॥

“अभिषेक का विघ्न, राम का वनवास, राजा (दशरथ) का शोक और विलाप, तथा उनका परलोकगमन।”

अर्थ: इस श्लोक में अयोध्या-काण्ड की प्रमुख घटनाएँ सूचीबद्ध हैं: राम के अभिषेक में बाधा, उनका वनवास, राजा दशरथ का शोक और विलाप, तथा अंततः उनका स्वर्गवास। यह श्लोक करुण रस को उद्बुद्ध करता है।

टिप्पणी: यहाँ "विघातं चाभिषेकस्य" कैकेयी के वरदानों के कारण अभिषेक रुकने की ओर संकेत है। "रामस्य च विवासनम्" चौदह वर्ष के वनवास को कहता है। "राज्ञः शोकं विलापं च" में दशरथ की पुत्र-वियोग में व्याकुलता दिखाई गई है, और "परलोकस्य चाश्रयम्" उनकी मृत्यु (पुत्र के वियोग में ही) को इंगित करता है।

श्लोक 14

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प्रकृतीनां विषादं च प्रकृतीनां विसर्जनम् । निषादाधिपसंवादं सूतोपावर्तनं तथा ॥

“प्रजाओं का विषाद और उनका विसर्जन (लौट जाना), निषादराज (गुह) से संवाद, तथा सूत (सुमन्त्र) का लौट आना।”

अर्थ: यह श्लोक राम के वनगमन के बाद की घटनाओं का वर्णन करता है: अयोध्या की प्रजा राम के पीछे वन तक आ गई थी, पर राम ने उन्हें लौटा दिया (प्रकृतीनां विसर्जनम्)। गंगा तट पर निषादराज गुह से भेंट और संवाद हुआ। तत्पश्चात् सुमन्त्र अयोध्या लौटे।

टिप्पणी: राम के वन जाने पर अयोध्या की प्रजा (प्रकृतयः) अत्यंत दुःखी हुई और उनके पीछे चल पड़ी। राम ने उन्हें समझा-बुझाकर अयोध्या लौटने को कहा। यह "प्रकृतीनां विसर्जनम्" है। गंगा पार करते समय गुह से राम की मित्रता और संवाद हुआ। सुमन्त्र रथ लेकर अयोध्या लौटे और दशरथ को समाचार दिया।

श्लोक 15

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गङ्गायाश्चापि संतारं भरद्वाजस्य दर्शनम् । भरद्वाजाभ्यनुज्ञानाच्चित्रकूटस्य दर्शनम् ॥

“गंगा को पार करना, भरद्वाज ऋषि का दर्शन, भरद्वाज की आज्ञा से चित्रकूट का दर्शन।”

अर्थ: इस श्लोक में राम के वनगमन मार्ग का वर्णन है: गंगा पार करना, प्रयाग में भरद्वाज ऋषि से भेंट, और उनकी अनुमति से चित्रकूट पर्वत पर जाकर निवास करना।

टिप्पणी: राम, सीता और लक्ष्मण ने गंगा को पार किया और प्रयाग पहुँचे, जहाँ भरद्वाज ऋषि के आश्रम में उनसे भेंट की। ऋषि ने उन्हें चित्रकूट जाने का सुझाव दिया, जहाँ राम ने कुछ समय निवास किया।

श्लोक 16

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वास्तुकर्म निवेशं च भरतागमनं तथा । प्रसादनं च रामस्य पितुश्च सलिलक्रियाम् ॥

“चित्रकूट में कुटी बनाना और निवास, भरत का आगमन, राम का प्रसादन (मनाना), तथा पिता (दशरथ) का जल-तर्पण।”

अर्थ: यह श्लोक चित्रकूट में राम के निवास, भरत के वहाँ आने, राम को मनाने के प्रयास, और दशरथ के निधन पर जलांजलि देने का वर्णन करता है।

टिप्पणी: राम ने चित्रकूट में एक कुटी बनाई। भरत माता-पिता की आज्ञा से राम को वापस लेने आए, लेकिन राम ने वनवास पूरा करने का निश्चय किया। भरत ने राम की पादुकाएँ लेकर राज्य संभाला। पिता दशरथ के निधन पर राम ने जलांजलि दी।

श्लोक 17

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पादुकाग्र्याभिषेकं च नन्दिग्रामनिवासनम् । दण्डकारण्यगमनं विराधस्य वधं तथा ॥

“पादुकाओं का अभिषेक, नन्दिग्राम में निवास, दण्डकारण्य जाना और विराध का वध।”

अर्थ: इस श्लोक में भरत द्वारा राम की पादुकाओं का राज्याभिषेक कर नन्दिग्राम में निवास, तत्पश्चात् राम का दण्डकारण्य प्रवेश और वहाँ विराध राक्षस के वध का उल्लेख है।

टिप्पणी: भरत राम की पादुकाएँ लेकर अयोध्या लौटे और उन्हें राजसिंहासन पर स्थापित कर स्वयं नन्दिग्राम में रहे। राम, सीता और लक्ष्मण दण्डकारण्य वन में गए, जहाँ उन्होंने विराध नामक राक्षस का वध किया।

श्लोक 18

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दर्शनं शरभङ्गस्य सुतीक्ष्णेन समागमम् । अनसूयासमाख्यां च अङ्गरागस्य चार्पणम् ॥

“शरभंग ऋषि का दर्शन, सुतीक्ष्ण ऋषि से समागम, अनसूया की कथा और अंगराग (काजल) का दान।”

अर्थ: इस श्लोक में दण्डकारण्य में राम के विभिन्न ऋषियों से मिलने का उल्लेख है: शरभंग का दर्शन, सुतीक्ष्ण से भेंट, अनसूया (अत्रि की पत्नी) की कथा और उनके द्वारा सीता को अंगराग (प्रसाधन सामग्री) प्रदान करना।

टिप्पणी: राम ने दण्डकारण्य में कई ऋषियों के आश्रमों का भ्रमण किया। शरभंग ऋषि ने राम को देखकर स्वर्गारोहण किया। सुतीक्ष्ण ऋषि ने उनका सत्कार किया। अत्रि ऋषि के आश्रम में अनसूया ने सीता को सुहाग की वस्तुएँ (अंगराग) दीं और उन्हें पतिव्रता धर्म की शिक्षा दी।

श्लोक 19

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दर्शनं चाप्यगस्त्यस्य धनुषो ग्रहणं तथा । शूर्पणख्याश्च संवादं विरूपकरणं तथा ॥

“अगस्त्य ऋषि का दर्शन, धनुष (दिव्य धनुष) का ग्रहण, शूर्पणखा से संवाद और उसका विरूपण (नाक-कान काटना)।”

अर्थ: इस श्लोक में अगस्त्य ऋषि से भेंट, उनसे दिव्य धनुष प्राप्त करना, फिर पंचवटी में शूर्पणखा का आगमन, उससे संवाद, और लक्ष्मण द्वारा उसकी नाक-कान काटने की घटना का संकेत है।

टिप्पणी: राम ने अगस्त्य ऋषि से भेंट की और उनसे दिव्य धनुष-बाण प्राप्त किए। ऋषि के कहने पर उन्होंने पंचवटी में निवास किया। वहाँ शूर्पणखा नामक राक्षसी ने राम पर काममोहित होकर आक्रमण किया। लक्ष्मण ने उसकी नाक और कान काट दिए।

श्लोक 20

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वधं खरत्रिशिरसोरुत्थानं रावणस्य च । मारीचस्य वधं चैव वैदेह्या हरणं तथा ॥

“खर और त्रिशिरा का वध, रावण का उद्योग (प्रतिशोध के लिए उठना), मारीच का वध, और वैदेही (सीता) का हरण।”

अर्थ: यह श्लोक शूर्पणखा के प्रतिशोध में खर-दूषण आदि राक्षसों के वध, रावण का क्रोधित होना, फिर मारीच की सहायता से सीता-हरण की घटना का संकेत करता है।

टिप्पणी: शूर्पणखा के विरूपण के बाद उसने अपने भाइयों खर, दूषण, त्रिशिरा आदि से शिकायत की। उन्होंने राम पर आक्रमण किया और राम ने चौदह हजार राक्षसों सहित उन सबका वध कर दिया। इससे रावण क्रोधित हुआ और उसने मारीच की सहायता से सीता का हरण करने की योजना बनाई। मारीच ने स्वर्णमृग का रूप धारण किया और राम के भेजे जाने पर लक्ष्मण द्वारा मारा गया। रावण ने उस अवसर पर सीता का हरण किया।