बाल काण्ड अध्याय 3

राम की कहानी

बाल काण्ड का तीसरा सर्ग राम के जन्म से लेकर उनके विवाह तक की संक्षिप्त कथा प्रस्तुत करता है। इसमें राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ, राम आदि चारों पुत्रों के जन्म, उनकी बाल लीलाओं, गुरु वशिष्ठ द्वारा शिक्षा, ऋषि विश्वामित्र के आगमन और उनके साथ राम-लक्ष्मण के प्रस्थान की पृष्ठभूमि का वर्णन है।

विवरण

यह सर्ग सम्पूर्ण रामायण के कथा-सूत्र का संक्षिप्त परिचय देता है। इसमें वर्णन है कि कैसे राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए ऋंगी ऋषि द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। यज्ञ की अग्नि से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए और उन्होंने राजा को खीर (पायस) प्रदान की, जिसे उन्होंने अपनी तीनों रानियों में बाँट दिया। इसके फलस्वरूप कौशल्या से राम, कैकेयी से भरत और सुमित्रा से लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न का जन्म हुआ। चारों पुत्रों का बाल्यकाल अयोध्या में व्यतीत हुआ। उन्होंने वेदों, धनुर्विद्या और राजनीति की शिक्षा गुरु वशिष्ठ से प्राप्त की। एक दिन महर्षि विश्वामित्र अयोध्या आए और राजा दशरथ से अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राम को माँगा। राजा दशरथ के विरोध के बावजूद, गुरु वशिष्ठ के परामर्श से राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेज दिया गया। इस प्रकार यह सर्ग राम के वन-गमन की आधारशिला रखता है, जो आगे चलकर महान घटनाओं का कारण बना।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ३

(राम की कहानी – जन्म से विश्वामित्र के आश्रम तक)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ तृतीयः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : द्वितीय सर्ग में हमने अयोध्या के वैभव और राजा दशरथ के शासन का वर्णन सुना। अब तृतीय सर्ग में हम राम के जन्म की दिव्य कथा सुनेंगे। यह सर्ग रामकथा का हृदय है, जहाँ से नायक का आविर्भाव होता है। राजा दशरथ की पुत्रेष्टि यज्ञ से लेकर राम-लक्ष्मण के विश्वामित्र के साथ वन-गमन तक की यह यात्रा अत्यन्त रोमांचक और आध्यात्मिक है।

📜 पुत्रेष्टि यज्ञ और राम का जन्म (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १ ॥
पुत्रेष्टिं नाम यज्ञं तु राजा वै दशरथः तदा ।
चकार फलनिर्वृत्तिं पुत्रार्थं पुत्रवत्सलः ॥ १-३-१ ॥
🔹 पदच्छेद : पुत्रेष्टिम् = पुत्रेष्टि नामक; नाम = नाम से; यज्ञम् = यज्ञ; तु = तो; राजा = राजा; वै = निश्चय ही; दशरथः = दशरथ ने; तदा = तब; चकार = किया; फलनिर्वृत्तिम् = फल की प्राप्ति के लिए; पुत्रार्थम् = पुत्र की इच्छा से; पुत्रवत्सलः = पुत्र के स्नेही।
📖 भावार्थ : पुत्र के प्रति अत्यन्त स्नेह रखने वाले राजा दशरथ ने पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि नामक यज्ञ का अनुष्ठान किया।
🔍 व्याख्या : राजा दशरथ कोई साधारण राजा नहीं थे, वे अत्यन्त पुत्रवत्सल थे। उनकी यह तीव्र इच्छा ही यज्ञ का कारण बनी।
॥ श्लोक ६ ॥
ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋत्विजः समुपागताः ।
दिव्यं पुरुषमादाय राज्ञे दुःखापहं शुभम् ॥ १-३-६ ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; यज्ञे = यज्ञ के; समाप्ते = समाप्त होने पर; तु = ही; ऋत्विजः = ऋत्विज (याजक); समुपागताः = आए; दिव्यम् = दिव्य; पुरुषम् = पुरुष को; आदाय = लेकर; राज्ञे = राजा को; दुःखापहम् = दुःख दूर करने वाला; शुभम् = कल्याणकारी।
📖 भावार्थ : यज्ञ के समाप्त होने पर ऋत्विज एक दिव्य पुरुष को लेकर राजा के पास आए, जो अत्यन्त कल्याणकारी और दुःखों को दूर करने वाला था।
🔍 व्याख्या : यह दिव्य पुरुष स्वयं अग्निदेव के प्रतिनिधि के रूप में प्रकट हुए। उनके हाथ में पायस (खीर) से भरा स्वर्ण पात्र था, जो पुत्र प्राप्ति का वरदान था।
॥ श्लोक ७ ॥
राजन्निमं पुरस्कृत्य पायसं देवनिर्मितम् ।
प्रतीच्छ भद्रे भद्रं ते पत्नीनां विनियोजय ॥ १-३-७ ॥
📖 भावार्थ : "हे राजन्! देवताओं द्वारा निर्मित इस पायस (खीर) को ग्रहण कीजिए। यह आपके लिए कल्याणकारी है। इसे अपनी पत्नियों में वितरित कर दीजिए।"
॥ श्लोक १० ॥
कौशल्या जनयामास रामं सत्यपराक्रमम् ।
कैकेयी जनयामास भरतं शीलसंयुतम् ॥ १-३-१० ॥
📖 भावार्थ : कौशल्या ने सत्यपराक्रमी राम को जन्म दिया। कैकेयी ने शीलसंपन्न भरत को जन्म दिया।
॥ श्लोक ११ ॥
सुमित्रा जनयामास लक्ष्मणं शत्रुघ्नं तथा ।
चतुरो जनयामास पुत्रान् राजा स धार्मिकः ॥ १-३-११ ॥
📖 भावार्थ : सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया। इस प्रकार धार्मिक राजा दशरथ ने चार पुत्र प्राप्त किए।

🎓 बाल्यकाल और शिक्षा (श्लोक १३-१८)

॥ श्लोक १३ ॥
सर्वे वेदविदः शूराः सर्वे लोकहिते रताः ।
सर्वे ज्ञानोपसंपन्नाः सर्वे रूपगुणान्विताः ॥ १-३-१३ ॥
📖 भावार्थ : वे सभी (चारों पुत्र) वेदों के ज्ञाता, शूरवीर, लोकहित में रत, ज्ञान से संपन्न और रूप-गुणों से युक्त थे।
॥ श्लोक १५ ॥
वसिष्ठस्तु महातेजाः पुरोधा राजवल्लभः ।
उपादिशत् सुतान् राज्ञो धर्मकामार्थसाधकान् ॥ १-३-१५ ॥
📖 भावार्थ : राजा के परम प्रिय पुरोधा महातेजस्वी वशिष्ठ ने राजपुत्रों को धर्म, अर्थ और काम का साधक ज्ञान प्रदान किया।
🔍 व्याख्या : गुरु वशिष्ठ ने राजकुमारों को न केवल शास्त्रों की शिक्षा दी, वरन् धनुर्विद्या और राजधर्म का भी प्रशिक्षण दिया।

🕉️ ऋषि विश्वामित्र का आगमन (श्लोक १९-२४)

॥ श्लोक १९ ॥
तत ऋषिर्महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः ।
राजानं दशरथं प्राप्तो वनवासादिहागतः ॥ १-३-१९ ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र वनवास से लौटकर यहाँ राजा दशरथ के पास आए।
॥ श्लोक २१ ॥
इमौ तु पुत्रौ सहितौ रामलक्ष्मणौ उत्तमौ ।
ददस्व मे नरश्रेष्ठ यज्ञरक्षणकारणात् ॥ १-३-२१ ॥
📖 भावार्थ : (विश्वामित्र ने कहा) "हे नरश्रेष्ठ! यज्ञ की रक्षा के लिए मुझे अपने इन उत्तम पुत्रों राम और लक्ष्मण को सौंप दीजिए।"
॥ श्लोक २३ ॥
राजा तु वचनं श्रुत्वा मुनेः परमधार्मिकः ।
हर्षव्याकुलितात्माऽभूत् पुत्रस्नेहसमन्वितः ॥ १-३-२३ ॥
📖 भावार्थ : परम धार्मिक राजा दशरथ मुनि का वचन सुनकर हर्ष और पुत्र-स्नेह से व्याकुल हो गए।

🚩 राम-लक्ष्मण का प्रस्थान (श्लोक २५-२८)

॥ श्लोक २६ ॥
वसिष्ठस्तु तदा वाक्यमुवाच परमार्थवित् ।
रक्षितव्यौ च भवता राजपुत्रौ महाबलौ ॥ १-३-२६ ॥
📖 भावार्थ : परमार्थ के ज्ञाता वशिष्ठ ने तब (विश्वामित्र से) कहा – "आपको इन महाबली राजपुत्रों की रक्षा करनी चाहिए।"
॥ श्लोक २८ ॥
तौ गच्छन्तौ महात्मानौ मुनिणा सहितौ तदा ।
अयोध्यां प्रस्थितौ वीरौ यत्र रामः सहानुजः ॥ १-३-२८ ॥
🔹 पदच्छेद : तौ = वे दोनों; गच्छन्तौ = जाते हुए; महात्मानौ = महात्मा; मुनिणा = मुनि के साथ; सहितौ = संयुक्त; तदा = तब; अयोध्याम् = अयोध्या से; प्रस्थितौ = प्रस्थान किया; वीरौ = वीरों ने; यत्र = जहाँ; रामः = राम; सह = सहित; अनुजः = अनुज (लक्ष्मण)।
📖 भावार्थ : तब वे दोनों महात्मा वीर, मुनि के साथ अयोध्या से प्रस्थान कर गए। इस प्रकार राम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ चले गए।
🔍 व्याख्या : यह अयोध्या से राम का पहला प्रस्थान था, जो आगे चलकर वनवास और महान कार्यों का सूत्रपात सिद्ध हुआ।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

✨ पुत्रेष्टि यज्ञ का महत्त्व

यह यज्ञ केवल पुत्र प्राप्ति का साधन नहीं, वरन् धर्म की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करता है। राम का जन्म अधर्म के नाश के लिए हुआ था।

🤝 गुरु-शिष्य परम्परा

राम ने गुरु वशिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की और फिर गुरु विश्वामित्र की आज्ञा का पालन किया। यह भारतीय गुरु-शिष्य परम्परा का उत्कृष्ट उदाहरण है।

🌳 वन-गमन का प्रारम्भ

यह सर्ग राम के वन-गमन का प्रथम चरण है। यहाँ वन जाना कोई निर्वासन नहीं, वरन् ऋषि की रक्षा और धर्म की रक्षा का कार्य है।

🙏 राजा दशरथ का त्याग

पुत्रों के प्रति अगाध स्नेह के बावजूद राजा दशरथ ने धर्म और ऋषि के वचन को प्राथमिकता दी। यह त्याग उनके महान राजा होने का प्रमाण है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीख मिलती है कि संतान के जन्म से पहले उसके उद्देश्य का निर्धारण हो जाता है। राम का जन्म धर्म की रक्षा के लिए हुआ था, और उन्होंने बाल्यकाल से ही उस मार्ग पर चलना प्रारम्भ कर दिया। माता-पिता और गुरु की आज्ञा का पालन ही सच्चा धर्म है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

इस अध्याय के लोकप्रिय श्लोक

श्लोक 28

280

राक्षसीतर्जनं चैव च्छायाग्राहस्य दर्शनम् । सिंहिकायाश्च निधनं लङ्कामलयदर्शनम् ॥…

“राक्षसियों (लंकिनी) की धमकी, छायाग्राह (सिंहिका) का दर्शन, सिंहिका का वध तथा लंक…”

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श्लोक 24

94

वालिप्रमथनं चैव सुग्रीवप्रतिपादनम् । ताराविलापं समयं वर्षरात्रनिवासनम् ॥…

“वालि का वध, सुग्रीव को राज्य सौंपना, तारा का विलाप, ऋतु (वर्षा) की रातों में निव…”

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श्लोक 26

87

अङ्गुलीयकदानं च ऋक्षस्य बिलदर्शनम् । प्रायोपवेशनं चैव संपातेश्चापि दर्शनम् ॥…

“अंगूठी का दान, ऋक्ष (भालू) की गुफा का दर्शन, प्रायोपवेशन (भूख पर आसन) और संपाति …”

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श्लोक 27

82

पर्वतारोहणं चैव सागरस्यापि लङ्घनम् । समुद्रवचनाच्चैव मैनाकस्य च दर्शनम् ॥…

“पर्वत पर चढ़ना, सागर का लंघन करना, समुद्र के वचन से मैनाक पर्वत का दर्शन।…”

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श्लोक 23

67

ऋष्यमूकस्य गमनं सुग्रीवेण समागमम् । प्रत्ययोत्पादनं सख्यं वालिसुग्रीवविग्रहम् ॥…

“ऋष्यमूक पर्वत पर जाना, सुग्रीव से मिलना, विश्वास उत्पन्न करना, मित्रता करना और व…”

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अध्याय के श्लोक

श्लोक 1

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श्रुत्वा वस्तु समग्रं तद्धर्मार्थसहितं हितम् । व्यक्तमन्वेषते भूयो यद् वृत्तं तस्य धीमतः ॥
हिंदी अर्थ: धर्म और अर्थ से युक्त उस सम्पूर्ण हितकर वृत्तान्त को सुनकर, वे धीमान (वाल्मीकि) उसके (राम के) चरित्र के बारे में और अधिक स्पष्ट रूप से जानना चाहते हैं।
यह श्लोक वाल्मीकि की जिज्ञासा को दर्शाता है, जो नारद से रामकथा का संक्षेप सुनने के बाद उसके विस्तार को जानने की इच्छा रखते हैं।

श्लोक 2

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उपस्पृश्योदकं सम्यङ्मुनिः स्थित्वा कृताञ्जलिः । प्राचीनाग्रेषु दर्भेषु धर्मेणान्वेषते गतिम् ॥
हिंदी अर्थ: जल से स्पर्श (आचमन) करके, मुनि (वाल्मीकि) पूर्व की ओर अग्रभाग वाले दर्भों पर खड़े होकर हाथ जोड़कर धर्मपूर्वक (राम के चरित्र की) गति (प्रवृत्ति) का अन्वेषण करते हैं।
यह श्लोक वाल्मीकि द्वारा रामकथा के दिव्य दर्शन के लिए किए गए आचमन, ध्यान और संकल्प का वर्णन करता है।

श्लोक 3

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रामलक्ष्मणसीताभी राज्ञा दशरथेन च । सभार्येण सराष्ट्रेण यत् प्राप्तं तत्र तत्त्वतः ॥
हिंदी अर्थ: राम, लक्ष्मण, सीता के साथ-साथ राजा दशरथ द्वारा, पत्नी (कौसल्या आदि) सहित और राष्ट्र सहित जो कुछ भी प्राप्त किया गया (अनुभव किया गया), उस सबको वहाँ (ध्यान में) तत्त्वतः देखते हैं।
इस श्लोक में वाल्मीकि अपने ध्यान में राम, लक्ष्मण, सीता, दशरथ, उनकी पत्नियों और सम्पूर्ण राज्य के साथ घटित समस्त घटनाओं का यथार्थ दर्शन करते हैं।

श्लोक 4

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हसितं भाषितं चैव गतिर्यावच्च चेष्टितम् । तत् सर्वं धर्मवीर्येण यथावत् संप्रपश्यति ॥
हिंदी अर्थ: हँसना, बोलना, चाल और जितनी भी चेष्टाएँ थीं, उन सबको (वाल्मीकि) धर्म के प्रभाव से यथावत् (जैसे-का-तैसा) भलीभाँति देखते हैं।
इस श्लोक में वाल्मीकि धर्मबल से राम एवं अन्य पात्रों के समस्त व्यवहार, हाव-भाव और क्रियाकलापों को यथारूप देखते हैं।

श्लोक 5

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स्त्रीतृतीयेन च तथा यत् प्राप्तं चरता वने । सत्यसन्धेन रामेण तत् सर्वं चान्ववैक्षत ॥
हिंदी अर्थ: और इसी प्रकार (उन्होंने) उस सत्यसन्ध राम के द्वारा, जो दो स्त्रियों (सीता और लक्ष्मण?) के साथ वन में विचरण करते हुए जो कुछ प्राप्त किया गया (अनुभव किया), उस सबका भी अनुवीक्षण किया (ध्यान से देखा)।
इस श्लोक में वाल्मीकि वनवास के दौरान राम, सीता और लक्ष्मण द्वारा अनुभव की गई समस्त घटनाओं का साक्षात्कार करते हैं।

श्लोक 6

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ततः पश्यति धर्मात्मा तत् सर्वं योगमास्थितः । पुरा यत् तत्र निर्वृत्तं पाणावामलकं यथा ॥
हिंदी अर्थ: तत्पश्चात् योग में स्थित हुए उस धर्मात्मा (वाल्मीकि) ने वह सब कुछ देखा, जो पूर्वकाल में वहाँ (राम के जीवन में) घटित हुआ था, जैसे हाथ की आँवले की भाँति स्पष्ट।
इस श्लोक में वाल्मीकि की योगजन्य दिव्य दृष्टि का फल बताया गया है – उन्होंने सम्पूर्ण रामकथा को ऐसे स्पष्ट देखा जैसे हाथ में आँवला हो।

श्लोक 7

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तत् सर्वं तत्त्वतो दृष्ट्वा धर्मेण स महामतिः । अभिरामस्य रामस्य तत् सर्वं कर्तुमुद्यतः ॥
हिंदी अर्थ: उस महामति (वाल्मीकि) ने धर्मपूर्वक उस सबको तत्त्वतः देखकर, उस अभिराम (सुन्दर) राम के सम्पूर्ण चरित्र को रचने के लिए उद्यत हो गए।
इस श्लोक में वाल्मीकि के रामायण रचना के लिए उद्यत होने का वर्णन है। वे राम के सम्पूर्ण चरित्र का यथार्थ दर्शन कर चुके हैं और अब उसे काव्यबद्ध करने के लिए तैयार हैं।

श्लोक 8

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कामार्थगुणसंयुक्तं धर्मार्थगुणविस्तरम् । समुद्रमिव रत्नाढ्यं सर्वश्रुतिमनोहरम् ॥
हिंदी अर्थ: (वह रामायण) काम, अर्थ और गुणों से युक्त, धर्म, अर्थ और गुणों का विस्तार करने वाली, रत्नों से भरे समुद्र के समान तथा सभी श्रोताओं के मन को हरने वाली है।
इस श्लोक में रामायण की विशेषताओं का वर्णन है – यह चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) से युक्त, रत्नाकर समुद्र के समान अमूल्य तथा सबको मनोहर है।

श्लोक 9

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स यथा कथितं पूर्वं नारदेन महात्मना । रघुवंशस्य चरितं चकार भगवान् मुनिः ॥
हिंदी अर्थ: उस भगवान् मुनि (वाल्मीकि) ने उसी प्रकार रघुवंश के चरित्र की रचना की, जैसे पूर्व में महात्मा नारद ने (उसे) कहा था।
यह श्लोक बताता है कि वाल्मीकि ने रामायण की रचना नारद द्वारा बताए गए संक्षिप्त वृत्तान्त के अनुरूप ही की।

श्लोक 10

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जन्म रामस्य सुमहद्वीर्यं सर्वानुकूलताम् । लोकस्य प्रियतां क्षान्तिं सौम्यतां सत्यशीलताम् ॥
हिंदी अर्थ: राम का जन्म, महान वीरता, सबके अनुकूल होना, लोक में प्रियता, क्षमा, सौम्यता और सत्यशीलता (इन सबका वर्णन किया)।
दसवाँ श्लोक उन विषयों का उल्लेख करता है जिनका वर्णन रामायण में किया जाएगा – राम का जन्म, वीरता, सर्वानुकूलता, प्रियता, क्षमा, सौम्यता और सत्यशीलता।

श्लोक 11

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नाना चित्राः कथाश्चान्या विश्वामित्रसहायने । जानक्याश्च विवाहं च धनुषश्च विभेदनम् ॥
हिंदी अर्थ: विश्वामित्र की सहायता में अनेक प्रकार की विचित्र कथाएँ, जानकी का विवाह और धनुष का तोड़ना।
यह श्लोक बालकाण्ड के तीसरे सर्ग (संक्षेप रामायण) का ग्यारहवाँ श्लोक है। इसमें उन घटनाओं का संकेत है जो विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के दौरान घटित हुईं – अनेक विचित्र कथाएँ (जैसे गंगा का प्राकट्य, इत्यादि), फिर जानकी (सीता) का स्वयंवर और शिव-धनुष का भंग। ये सभी घटनाएँ राम के बाल-चरित्र के प्रमुख अंश हैं।

श्लोक 12

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रामरामविवादं च गुणान् दाशरथेस्तथा । तथाभिषेकं रामस्य कैकेय्या दुष्टभावताम् ॥
हिंदी अर्थ: राम-राम (परशुराम) का विवाद, दशरथपुत्र राम के गुण, राम का अभिषेक और कैकेयी की दुष्टभावना।
यह श्लोक राम के जीवन की अगली महत्वपूर्ण घटनाओं को संक्षेप में बताता है: परशुराम से विवाद (सीता-स्वयंवर के बाद), राम के गुणों का वर्णन, अयोध्या में राम के राज्याभिषेक की तैयारी, और कैकेयी द्वारा उसमें बाधा डालने की दुष्टता।

श्लोक 13

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विघातं चाभिषेकस्य रामस्य च विवासनम् । राज्ञः शोकं विलापं च परलोकस्य चाश्रयम् ॥
हिंदी अर्थ: अभिषेक का विघ्न, राम का वनवास, राजा (दशरथ) का शोक और विलाप, तथा उनका परलोकगमन।
इस श्लोक में अयोध्या-काण्ड की प्रमुख घटनाएँ सूचीबद्ध हैं: राम के अभिषेक में बाधा, उनका वनवास, राजा दशरथ का शोक और विलाप, तथा अंततः उनका स्वर्गवास। यह श्लोक करुण रस को उद्बुद्ध करता है।

श्लोक 14

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प्रकृतीनां विषादं च प्रकृतीनां विसर्जनम् । निषादाधिपसंवादं सूतोपावर्तनं तथा ॥
हिंदी अर्थ: प्रजाओं का विषाद और उनका विसर्जन (लौट जाना), निषादराज (गुह) से संवाद, तथा सूत (सुमन्त्र) का लौट आना।
यह श्लोक राम के वनगमन के बाद की घटनाओं का वर्णन करता है: अयोध्या की प्रजा राम के पीछे वन तक आ गई थी, पर राम ने उन्हें लौटा दिया (प्रकृतीनां विसर्जनम्)। गंगा तट पर निषादराज गुह से भेंट और संवाद हुआ। तत्पश्चात् सुमन्त्र अयोध्या लौटे।

श्लोक 15

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गङ्गायाश्चापि संतारं भरद्वाजस्य दर्शनम् । भरद्वाजाभ्यनुज्ञानाच्चित्रकूटस्य दर्शनम् ॥
हिंदी अर्थ: गंगा को पार करना, भरद्वाज ऋषि का दर्शन, भरद्वाज की आज्ञा से चित्रकूट का दर्शन।
इस श्लोक में राम के वनगमन मार्ग का वर्णन है: गंगा पार करना, प्रयाग में भरद्वाज ऋषि से भेंट, और उनकी अनुमति से चित्रकूट पर्वत पर जाकर निवास करना।

श्लोक 16

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वास्तुकर्म निवेशं च भरतागमनं तथा । प्रसादनं च रामस्य पितुश्च सलिलक्रियाम् ॥
हिंदी अर्थ: चित्रकूट में कुटी बनाना और निवास, भरत का आगमन, राम का प्रसादन (मनाना), तथा पिता (दशरथ) का जल-तर्पण।
यह श्लोक चित्रकूट में राम के निवास, भरत के वहाँ आने, राम को मनाने के प्रयास, और दशरथ के निधन पर जलांजलि देने का वर्णन करता है।

श्लोक 17

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पादुकाग्र्याभिषेकं च नन्दिग्रामनिवासनम् । दण्डकारण्यगमनं विराधस्य वधं तथा ॥
हिंदी अर्थ: पादुकाओं का अभिषेक, नन्दिग्राम में निवास, दण्डकारण्य जाना और विराध का वध।
इस श्लोक में भरत द्वारा राम की पादुकाओं का राज्याभिषेक कर नन्दिग्राम में निवास, तत्पश्चात् राम का दण्डकारण्य प्रवेश और वहाँ विराध राक्षस के वध का उल्लेख है।

श्लोक 18

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दर्शनं शरभङ्गस्य सुतीक्ष्णेन समागमम् । अनसूयासमाख्यां च अङ्गरागस्य चार्पणम् ॥
हिंदी अर्थ: शरभंग ऋषि का दर्शन, सुतीक्ष्ण ऋषि से समागम, अनसूया की कथा और अंगराग (काजल) का दान।
इस श्लोक में दण्डकारण्य में राम के विभिन्न ऋषियों से मिलने का उल्लेख है: शरभंग का दर्शन, सुतीक्ष्ण से भेंट, अनसूया (अत्रि की पत्नी) की कथा और उनके द्वारा सीता को अंगराग (प्रसाधन सामग्री) प्रदान करना।

श्लोक 19

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दर्शनं चाप्यगस्त्यस्य धनुषो ग्रहणं तथा । शूर्पणख्याश्च संवादं विरूपकरणं तथा ॥
हिंदी अर्थ: अगस्त्य ऋषि का दर्शन, धनुष (दिव्य धनुष) का ग्रहण, शूर्पणखा से संवाद और उसका विरूपण (नाक-कान काटना)।
इस श्लोक में अगस्त्य ऋषि से भेंट, उनसे दिव्य धनुष प्राप्त करना, फिर पंचवटी में शूर्पणखा का आगमन, उससे संवाद, और लक्ष्मण द्वारा उसकी नाक-कान काटने की घटना का संकेत है।

श्लोक 20

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वधं खरत्रिशिरसोरुत्थानं रावणस्य च । मारीचस्य वधं चैव वैदेह्या हरणं तथा ॥
हिंदी अर्थ: खर और त्रिशिरा का वध, रावण का उद्योग (प्रतिशोध के लिए उठना), मारीच का वध, और वैदेही (सीता) का हरण।
यह श्लोक शूर्पणखा के प्रतिशोध में खर-दूषण आदि राक्षसों के वध, रावण का क्रोधित होना, फिर मारीच की सहायता से सीता-हरण की घटना का संकेत करता है।