राम की कहानी – श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

ततः पश्यति धर्मात्मा तत् सर्वं योगमास्थितः । पुरा यत् तत्र निर्वृत्तं पाणावामलकं यथा ॥

हिंदी अनुवाद

तत्पश्चात् योग में स्थित हुए उस धर्मात्मा (वाल्मीकि) ने वह सब कुछ देखा, जो पूर्वकाल में वहाँ (राम के जीवन में) घटित हुआ था, जैसे हाथ की आँवले की भाँति स्पष्ट।

अर्थ / व्याख्या

इस श्लोक में वाल्मीकि की योगजन्य दिव्य दृष्टि का फल बताया गया है – उन्होंने सम्पूर्ण रामकथा को ऐसे स्पष्ट देखा जैसे हाथ में आँवला हो।

टिप्पणी

छठा श्लोक योग के माध्यम से दिव्य दर्शन की पराकाष्ठा को व्यक्त करता है। वाल्मीकि ने ध्यानयोग में स्थित होकर राम के सम्पूर्ण जीवन को, जो अतीत में घटित हुआ, वर्तमान की भाँति स्पष्ट देखा। "पाणावामलकं यथा" एक प्रसिद्ध उपमा है – जैसे हाथ में रखा आँवला स्पष्ट दिखता है, वैसे ही उन्हें सब कुछ स्पष्ट दिखा।

॥ श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे बालकाण्डे तृतीयः सर्गः श्लोक ६ ॥

ततः पश्यति धर्मात्मा तत् सर्वं योगमास्थितः ।
पुरा यत् तत्र निर्वृत्तं पाणावामलकं यथा ॥
tataḥ paśyati dharmātmā tat sarvaṃ yogamāsthitaḥ |
purā yat tatra nirvṛttaṃ pāṇāv āmalakaṃ yathā ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : तत्पश्चात् योग में स्थित हुए उस धर्मात्मा (वाल्मीकि) ने वह सब कुछ देखा, जो पूर्वकाल में वहाँ (राम के जीवन में) घटित हुआ था, जैसे हाथ की आँवले की भाँति स्पष्ट।

🔹 English Translation : Then, that righteous Valmiki, established in yoga, saw all that happened there in the past (in Rama's life), as clearly as an āmalaka fruit in the palm of the hand.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
ततःअव्ययतब, उसके बाद
पश्यतिक्रिया, प्रथमपुरुष एकवचनदेखता है
धर्मात्माविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनधर्मात्मा (वाल्मीकि)
तत्सर्वनाम, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनउस सबको
सर्वम्विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनसम्पूर्ण
योगमास्थितःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (योग+आस्थित)योग में स्थित
पुराअव्ययपूर्वकाल में
यत्सर्वनाम, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनजो
तत्रअव्ययवहाँ (राम के जीवन में)
निर्वृत्तम्क्रिया (भूतकालिक कृदंत)घटित हुआ
पाणौपुल्लिंग, सप्तमी एकवचनहाथ में
आमलकम्नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचनआँवला
यथाअव्ययजैसे

📜 श्लोक का सन्दर्भ एवं व्याख्या

यह श्लोक वाल्मीकि के योग-साधना के फल को दर्शाता है। "योगमास्थितः" का अर्थ है समाधि में स्थित, जहाँ भूत, भविष्य और वर्तमान का भेद मिट जाता है। वाल्मीकि ने उस अवस्था में राम के सम्पूर्ण जीवन को, जो कई वर्ष पूर्व घटित हुआ था, प्रत्यक्ष देखा। "पाणावामलकं यथा" अत्यन्त स्पष्टता का द्योतक है। आँवला हाथ में रखने पर उसके रंग-रूप, आकार-प्रकार सभी कुछ स्पष्ट दिखते हैं; ठीक वैसे ही वाल्मीकि को राम के चरित्र का प्रत्येक अंश स्पष्ट दिखा।

इस प्रकार वाल्मीकि ने न तो किसी से सुना, न कल्पना की, बल्कि प्रत्यक्ष दर्शन के आधार पर रामायण की रचना की। इसीलिए उनका काव्य "आदिकाव्य" और वे "आदिकवि" कहलाते हैं।

✨ विशेष तथ्य: "पाणावामलकम्" उपमा संस्कृत साहित्य में बहुत प्रसिद्ध है। यहाँ यह बताता है कि योगी की दिव्य दृष्टि के समक्ष काल और दूरी का कोई बन्धन नहीं रहता।

📖 आध्यात्मिक संदेश

इस श्लोक से हमें योग के महत्व का पता चलता है। योग के द्वारा व्यक्ति सूक्ष्मतम सत्य को भी प्रत्यक्ष कर सकता है। वाल्मीकि का यह दर्शन हमें प्रेरित करता है कि हम भी ध्यान और साधना द्वारा सत्य के निकट पहुँच सकते हैं। सत्य को जानने के लिए बाह्य स्रोत ही नहीं, आंतरिक चक्षु भी खोलने होंगे।

॥ योगेन पश्यति धर्मात्मा ॥

जय श्री राम 🙏