अयोध्या के राजा और लोग – श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
तस्यां पुर्यामयोध्यायां वेदवित् सर्वसंग्रहः । दीर्घदर्शी महातेजाः पौरजानपदप्रियः ॥
हिंदी अनुवाद
उस अयोध्या नगरी में (राजा) वेदों के ज्ञाता, सर्वसंग्रह करने वाले, दूरदर्शी, महातेजस्वी और नागरिकों तथा जनपदवासियों को प्रिय (रहते थे)।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक अयोध्या नगरी के राजा दशरथ के गुणों का वर्णन करता है। वे वेदवेत्ता, करुणाशील, दूरदर्शी, तेजस्वी और जनता के प्रिय थे।
टिप्पणी
इस श्लोक में राजा के पाँच गुण बताए गए हैं। 'सर्वसंग्रहः' का अर्थ है करों का उचित संग्रह करने वाला या सबका पालन करने वाला। यह राजधर्म का सूचक है।
॥ श्रीमद्वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ६ – श्लोक १ ॥
दीर्घदर्शी महातेजाः पौरजानपदप्रियः ॥
dīrghadarśī mahātejāḥ paurajānapadapriyaḥ ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : उस अयोध्या नगरी में (राजा) वेदों के ज्ञाता, सर्वसंग्रह करने वाले, दूरदर्शी, महातेजस्वी और नागरिकों तथा जनपदवासियों को प्रिय (रहते थे)।
🔹 English Translation : In that city of Ayodhya, (the king) was a knower of the Vedas, a collector of all (taxes), far-sighted, greatly resplendent, and dear to the citizens and country folk.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत पद | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| तस्याम् | सर्वनाम, स्त्रीलिंग, सप्तमी एकवचन | उस (नगरी) में |
| पुर्याम् | स्त्रीलिंग, सप्तमी एकवचन | नगरी में |
| अयोध्यायाम् | स्त्रीलिंग, सप्तमी एकवचन | अयोध्या में |
| वेदवित् | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | वेदों का ज्ञाता |
| सर्वसंग्रहः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | सबका संग्रह करने वाला (कर संग्रहकर्ता, पालनकर्ता) |
| दीर्घदर्शी | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | दूरदर्शी, भविष्य को देखने वाला |
| महातेजाः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | महान तेज वाला, प्रतापी |
| पौरजानपदप्रियः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (बहुव्रीहि समास) | पौरों (नगरवासियों) और जानपदों (ग्रामीणों) को प्रिय |
📖 श्लोक का विस्तृत अर्थ एवं व्याख्या
यह श्लोक बालकाण्ड के छठे सर्ग का प्रथम श्लोक है। इस सर्ग में अयोध्या नगरी और वहाँ के राजा दशरथ के शासन एवं प्रजा के सुखद जीवन का वर्णन है। इस विशेष श्लोक में राजा के व्यक्तिगत गुणों का उल्लेख किया गया है।
वेदवित् – राजा वेदों का ज्ञाता था, जो उसकी विद्वत्ता और धार्मिक निष्ठा को दर्शाता है। एक राजा का वेदज्ञ होना आवश्यक माना जाता था ताकि वह धर्मानुसार शासन कर सके।
सर्वसंग्रहः – इस पद के दो अर्थ हो सकते हैं: (१) सभी वस्तुओं का संग्रह करने वाला, अर्थात् करों को उचित रूप से एकत्र करने वाला; (२) सबका पालन करने वाला। राजा का कर्तव्य था कि वह प्रजा से उचित कर ले और उनका सदुपयोग जनकल्याण में करे। यहाँ यह गुण उसकी प्रशासनिक क्षमता को दर्शाता है।
दीर्घदर्शी – राजा दूरदर्शी था, अर्थात् वह न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य के परिणामों को भी ध्यान में रखकर निर्णय लेता था। यह एक कुशल शासक का आवश्यक गुण है।
महातेजाः – वह महान तेज से युक्त था। तेज का अर्थ है प्रभाव, ओज, और आत्मबल। यह उसके व्यक्तित्व की चमक और शौर्य को दर्शाता है।
पौरजानपदप्रियः – राजा नगरवासियों (पौर) और ग्रामीणों (जानपद) दोनों को प्रिय था। यह दर्शाता है कि उसका शासन सर्वजनहिताय था और वह सभी वर्गों में लोकप्रिय था।
इस प्रकार यह श्लोक एक आदर्श राजा के गुणों का संकलन प्रस्तुत करता है। यही गुण आगे चलकर राजा दशरथ के चरित्र को स्थापित करते हैं और रामायण की कथा में उनकी भूमिका को रेखांकित करते हैं।
📜 ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ
वाल्मीकि रामायण में अयोध्या को एक आदर्श नगरी के रूप में चित्रित किया गया है। यहाँ वर्णित राजा के गुण प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र (जैसे कौटिल्य का अर्थशास्त्र) के अनुरूप हैं। राजा को प्रजा का पिता माना जाता था और उसके गुण ही राज्य की समृद्धि के सूचक थे। इस श्लोक में वर्णित गुण बताते हैं कि दशरथ न केवल एक योद्धा थे, बल्कि एक कुशल प्रशासक और लोकप्रिय शासक भी थे।
आगे के श्लोकों में अयोध्या की समृद्धि और प्रजा के सद्गुणों का वर्णन मिलेगा, जो इस श्लोक में बताए गए राजा के गुणों का ही परिणाम है।
📖 व्याकरणिक एवं साहित्यिक विश्लेषण
यह श्लोक अनुष्टुप् छंद में है। प्रथम पाद में ८ अक्षर – त स्यां पु र्या म यो ध्या – किंतु 'तस्यां' में दीर्घ 'या' मिलाकर अक्षर गणना की जाती है। द्वितीय पाद: यां वे द वित् स र्व सं ग्रहः। तृतीय: दीर्घ द र्शी म हा ते जाः। चतुर्थ: पौ र जा न प द प्रि यः। सभी पादों में ८-८ अक्षर।
'पौरजानपदप्रियः' में पौर (नगरवासी) और जानपद (ग्रामीण) का समाहार है। यह बहुव्रीहि समास है जिसका अर्थ है वह जो पौरों और जानपदों को प्रिय है।
॥ इस प्रकार राजा के गुणों का वर्णन आगे भी जारी रहेगा ॥
जय श्री राम 🙏