अयोध्या के राजा और लोग – श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
इक्ष्वाकूणामतिरथो यज्वा धर्मपरो वशी । महर्षिकल्पो राजर्षिस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥
हिंदी अनुवाद
इक्ष्वाकु वंशियों में अतिरथ (महारथी), यज्ञ करने वाले, धर्मपरायण, संयमी, महर्षि के समान राजर्षि, तीनों लोकों में विख्यात थे।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक राजा दशरथ के वंश, वीरता, धार्मिकता एवं लोकप्रियता का वर्णन करता है। वे इक्ष्वाकु वंश में अतिरथ, यज्ञ करने वाले, धर्मपरायण, जितेन्द्रिय, महर्षि तुल्य राजर्षि थे और तीनों लोकों में विख्यात थे।
टिप्पणी
इस श्लोक में 'अतिरथ' शब्द का प्रयोग हुआ है, जो युद्ध में अकेले ही अनेक रथों का सामना करने की क्षमता रखने वाले योद्धा को कहते हैं। 'महर्षिकल्प' का अर्थ है महर्षि के समान तपस्वी और ज्ञानी, जो राजा होते हुए भी ऋषि जैसा आचरण रखता हो।
॥ श्रीमद्वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ६ – श्लोक २ ॥
महर्षिकल्पो राजर्षिस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥
maharṣikalpo rājarṣistriṣu lokeṣu viśrutaḥ ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : इक्ष्वाकु वंशियों में अतिरथ (महारथी), यज्ञ करने वाले, धर्मपरायण, संयमी, महर्षि के समान राजर्षि, तीनों लोकों में विख्यात थे।
🔹 English Translation : He was the foremost among chariot-warriors of the Ikshvakus, a performer of sacrifices, devoted to righteousness, self-controlled, a royal sage equal to a great sage, renowned in the three worlds.
🔍 शब्दार्थ तालिका
| संस्कृत पद | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| इक्ष्वाकूणाम् | पुल्लिंग, षष्ठी बहुवचन | इक्ष्वाकु वंशियों में |
| अतिरथः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | महारथी (अतिशय रथ कौशल वाला) |
| यज्वा | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (यज् धातु से) | यज्ञ करने वाला, याज्ञिक |
| धर्मपरः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | धर्म में तत्पर, धर्मनिष्ठ |
| वशी | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | वश में रखने वाला (जितेन्द्रिय) |
| महर्षिकल्पः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | महर्षि के समान (कल्प = सदृश) |
| राजर्षिः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | राजा और ऋषि के गुणों से युक्त |
| त्रिषु | विशेषण, पुल्लिंग, सप्तमी बहुवचन | तीनों (लोकों) में |
| लोकेषु | पुल्लिंग, सप्तमी बहुवचन | लोकों में |
| विश्रुतः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | विशेष रूप से श्रुत = प्रसिद्ध |
📖 श्लोक की व्याख्या
इस श्लोक में राजा दशरथ के और भी गुणों का वर्णन किया गया है। वे इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए थे, जो सूर्यवंश के नाम से भी जाना जाता है।
अतिरथः – रथों की गणना में अतिरथ वह योद्धा होता है जो एक साथ अनेक रथियों का सामना कर सकता है। यह उनकी अद्वितीय युद्ध कला को दर्शाता है।
यज्वा – वे यज्ञ करने वाले थे। राजा का यज्ञ करना उसकी धार्मिकता और प्रजा के कल्याण के लिए देवताओं को प्रसन्न करने की भावना को दर्शाता है। उन्होंने अश्वमेध आदि यज्ञ किए, जैसा कि आगे चलकर वर्णित है।
धर्मपरः – वे धर्म में तत्पर थे, अर्थात् उनका जीवन धर्म के अनुरूप था।
वशी – उन्होंने अपनी इंद्रियों को वश में कर रखा था। यह आत्मसंयम का गुण है, जो एक राजा के लिए अति आवश्यक है।
महर्षिकल्पः राजर्षिः – वे राजा होते हुए भी ऋषि के समान थे। 'राजर्षि' उन राजाओं को कहा जाता है जो ऋषियों के समान तपस्वी, ज्ञानी और धर्मात्मा हों। दशरथ ऐसे ही राजर्षि थे, महर्षियों के सदृश।
त्रिषु लोकेषु विश्रुतः – उनकी कीर्ति तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) में फैली हुई थी। यह उनकी अद्वितीय ख्याति का सूचक है।
📚 ऐतिहासिक संदर्भ
इक्ष्वाकु वंश सूर्यवंश के नाम से प्रसिद्ध है। इस वंश में भगवान राम का जन्म हुआ। राजा दशरथ इसी वंश की शोभा बढ़ाने वाले थे। 'अतिरथ' पद का उल्लेख प्राचीन युद्धकला में मिलता है। यहाँ यह बताता है कि दशरथ केवल एक प्रशासक ही नहीं, बल्कि महान योद्धा भी थे।
'यज्वा' का गुण उनके द्वारा किए गए पुत्रेष्टि यज्ञ की ओर संकेत करता है, जिससे उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई।
इस प्रकार यह श्लोक राजा दशरथ की बहुमुखी प्रतिभा एवं सद्गुणों को उजागर करता है।
॥ जय श्री राम ॥