अयोध्या के राजा और लोग – श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
बलवान् निहतामित्रो मित्रवान् विजितेन्द्रियः । धनैश्च संचयैश्चान्यैः शक्रवैश्रवणोपमः ॥
हिंदी अनुवाद
बलवान्, शत्रुओं का नाश करने वाला, मित्रों से युक्त, जितेन्द्रिय, धन और संचय (कोष) तथा अन्य वैभवों में इन्द्र और कुबेर के समान था।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक राजा दशरथ के शारीरिक बल, शत्रु-विजय, मित्र-बल, इंद्रिय-संयम और ऐश्वर्य का वर्णन करता है। वे इन्द्र और कुबेर के समान धनवान थे।
टिप्पणी
'शक्र' इन्द्र और 'वैश्रवण' कुबेर के नाम हैं। इन दोनों की तुलना से यह दर्शाया गया है कि राजा के पास अपार धन और संपदा थी, साथ ही उसका यश भी इन देवों के समान था।
॥ श्रीमद्वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ६ – श्लोक ३ ॥
धनैश्च संचयैश्चान्यैः शक्रवैश्रवणोपमः ॥
dhanaiśca saṃcayaiścānyaiḥ śakravaiśravaṇopamaḥ ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : बलवान्, शत्रुओं का नाश करने वाला, मित्रों से युक्त, जितेन्द्रिय, धन और संचय (कोष) तथा अन्य वैभवों में इन्द्र और कुबेर के समान था।
🔹 English Translation : Powerful, having slain enemies, having friends, with senses subdued, comparable to Indra and Kubera in wealth and treasures and other possessions.
🔍 शब्दार्थ तालिका
| संस्कृत पद | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| बलवान् | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | बलवान, शक्तिशाली |
| निहतामित्रः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (बहुव्रीहि) | शत्रुओं का नाश करने वाला (निहत + अमित्र) |
| मित्रवान् | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | मित्रों से युक्त |
| विजितेन्द्रियः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (बहुव्रीहि) | जितेन्द्रिय, वशीभूत इन्द्रियों वाला |
| धनैः | नपुंसक, तृतीया बहुवचन | धन से |
| च | अव्यय | और |
| संचयैः | पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन | संचय (कोष) से |
| च | अव्यय | और |
| अन्यैः | विशेषण, पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन | दूसरे (पदार्थों) से |
| शक्रवैश्रवणोपमः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (उपमा समास) | शक्र (इन्द्र) और वैश्रवण (कुबेर) के समान |
📖 श्लोक की व्याख्या
यह श्लोक राजा दशरथ के भौतिक और आध्यात्मिक गुणों का वर्णन करता है।
बलवान् – वे शारीरिक बल से संपन्न थे। राजा का बलवान होना आवश्यक है ताकि वह शत्रुओं का सामना कर सके और प्रजा की रक्षा कर सके।
निहतामित्रः – उन्होंने शत्रुओं का नाश किया था। यह उनकी वीरता और युद्ध कौशल को दर्शाता है। एक विजयी राजा ही अपने राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है।
मित्रवान् – वे मित्रों से युक्त थे। राजनीति में मित्रों का होना बहुत महत्वपूर्ण है। मित्र राजा को संकट में सहायता प्रदान करते हैं।
विजितेन्द्रियः – उन्होंने अपनी इंद्रियों को जीत लिया था। यह आत्मसंयम का परम गुण है। इंद्रियों को वश में किए बिना राजा न्यायपूर्वक शासन नहीं कर सकता।
धनैः संचयैः च अन्यैः शक्रवैश्रवणोपमः – वे धन, संचय (कोष) और अन्य वैभवों में इन्द्र और कुबेर के समान थे। इन्द्र देवराज हैं और कुबेर धन के देवता। इन दोनों की उपमा देकर राजा के अपार ऐश्वर्य और संपदा को दर्शाया गया है। राज्य के पास धन और कोष होना आवश्यक है, ताकि वह आपदा का सामना कर सके और प्रजा के कल्याण के कार्य कर सके।
📚 सांस्कृतिक संदर्भ
प्राचीन भारतीय राजनीति में राजा के लिए इन सभी गुणों का होना अनिवार्य माना जाता था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी राजा के गुणों का विस्तार से वर्णन है। यहाँ वाल्मीकि ने राजा दशरथ को एक आदर्श राजा के रूप में चित्रित किया है, जो सभी प्रकार से संपन्न है।
'शक्र' और 'वैश्रवण' की उपमा देकर यह भी संकेत किया गया है कि राजा की संपदा लौकिक और अलौकिक दोनों प्रकार की थी। उसके कोष में धन, रत्न, अन्न आदि सभी कुछ पर्याप्त मात्रा में थे।
इस प्रकार यह श्लोक राजा दशरथ के वैभव और उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं का वर्णन करता है।
॥ जय श्री राम ॥