बाल काण्ड का षष्ठ सर्ग अयोध्या के राजा दशरथ की प्रजा, उनके मंत्रीगण, राजपुरोहित, सेना, कोष और राजा की दिनचर्या का विस्तृत वर्णन करता है। इस सर्ग में अयोध्या के निवासियों के गुण, राजसभा की गरिमा, और राजा के न्यायप्रिय शासन का सजीव चित्रण है।
“उस अयोध्या नगरी में (राजा) वेदों के ज्ञाता, सर्वसंग्रह करने वाले, दूरदर्शी, महातेजस्वी और नागरिकों तथा जनपदवासियों को प्रिय (रहते थे)।”
अर्थ: यह श्लोक अयोध्या नगरी के राजा दशरथ के गुणों का वर्णन करता है। वे वेदवेत्ता, करुणाशील, दूरदर्शी, तेजस्वी और जनता के प्रिय थे।
टिप्पणी: इस श्लोक में राजा के पाँच गुण बताए गए हैं। 'सर्वसंग्रहः' का अर्थ है करों का उचित संग्रह करने वाला या सबका पालन करने वाला। यह राजधर्म का सूचक है।
“इक्ष्वाकु वंशियों में अतिरथ (महारथी), यज्ञ करने वाले, धर्मपरायण, संयमी, महर्षि के समान राजर्षि, तीनों लोकों में विख्यात थे।”
अर्थ: यह श्लोक राजा दशरथ के वंश, वीरता, धार्मिकता एवं लोकप्रियता का वर्णन करता है। वे इक्ष्वाकु वंश में अतिरथ, यज्ञ करने वाले, धर्मपरायण, जितेन्द्रिय, महर्षि तुल्य राजर्षि थे और तीनों लोकों में विख्यात थे।
टिप्पणी: इस श्लोक में 'अतिरथ' शब्द का प्रयोग हुआ है, जो युद्ध में अकेले ही अनेक रथों का सामना करने की क्षमता रखने वाले योद्धा को कहते हैं। 'महर्षिकल्प' का अर्थ है महर्षि के समान तपस्वी और ज्ञानी, जो राजा होते हुए भी ऋषि जैसा आचरण रखता हो।
“बलवान्, शत्रुओं का नाश करने वाला, मित्रों से युक्त, जितेन्द्रिय, धन और संचय (कोष) तथा अन्य वैभवों में इन्द्र और कुबेर के समान था।”
अर्थ: यह श्लोक राजा दशरथ के शारीरिक बल, शत्रु-विजय, मित्र-बल, इंद्रिय-संयम और ऐश्वर्य का वर्णन करता है। वे इन्द्र और कुबेर के समान धनवान थे।
टिप्पणी: 'शक्र' इन्द्र और 'वैश्रवण' कुबेर के नाम हैं। इन दोनों की तुलना से यह दर्शाया गया है कि राजा के पास अपार धन और संपदा थी, साथ ही उसका यश भी इन देवों के समान था।
यथा मनुर्महातेजा लोकस्य परिरक्षिता । तथा दशरथो राजा लोकस्य परिरक्षिता ॥
“जैसे महातेजस्वी मनु प्रजा के रक्षक थे, वैसे ही राजा दशरथ प्रजा के रक्षक थे।”
अर्थ: यह श्लोक राजा दशरथ की तुलना मनु से करता है। मनु आदि राजा और धर्मशास्त्र के प्रवर्तक थे। दशरथ भी उसी प्रकार प्रजा के रक्षक थे।
टिप्पणी: मनु का नाम यहाँ आदर्श राजा के रूप में लिया गया है। वे सप्तर्षियों में से एक और धर्मशास्त्र (मनुस्मृति) के रचयिता माने जाते हैं। उनके समान प्रजापालन करना राजा का परम कर्तव्य है।
“उस सत्यप्रतिज्ञ राजा द्वारा, जो धर्म, अर्थ, काम का पालन करता था, वह श्रेष्ठ नगरी ऐसे पालित की गई जैसे इन्द्र द्वारा अमरावती।”
अर्थ: इस श्लोक में राजा दशरथ की सत्यप्रतिज्ञता और त्रिवर्ग के पालन का वर्णन है। उन्होंने अयोध्या की रक्षा उसी प्रकार की जैसे इन्द्र अमरावती की।
टिप्पणी: त्रिवर्ग – धर्म, अर्थ और काम। ये तीन पुरुषार्थ कहे जाते हैं। राजा का कर्तव्य है कि वह इन तीनों का संतुलन बनाए रखे। अर्थ और काम का साधन धर्म से होना चाहिए।
कामी वा न कदर्यो वा नृशंसः पुरुषः क्वचित् । द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नाविद्वान् न च नास्तिकः ॥
“अयोध्या में कहीं भी कोई पुरुष कामी, कृपण, क्रूर, अविद्वान् या नास्तिक देखने को नहीं मिलता था।”
अर्थ: इस श्लोक में अयोध्या के निवासियों के नैतिक और बौद्धिक स्तर का वर्णन है। वहाँ कोई कामी, कृपण, क्रूर, अविद्वान या नास्तिक नहीं था।
टिप्पणी: यह श्लोक बताता है कि अयोध्या की प्रजा न केवल आर्थिक रूप से सम्पन्न थी, बल्कि चारित्रिक और बौद्धिक रूप से भी उच्च कोटि की थी। दोषों का अभाव और गुणों की उपस्थिति।
“(वहाँ) कोई बिना कुण्डल का, बिना मुकुट का, बिना माला का, अल्पभोगी, बिना स्नान किया हुआ, लिप्त अंगों वाला (बिना उबटन लगाए), या सुगन्ध से रहित नहीं था।”
अर्थ: यह श्लोक अयोध्या के निवासियों के बाहरी ठाठ-बाठ, साज-श्रृंगार और भोग-विलास का वर्णन करता है। सभी आभूषण, वस्त्र, सुगंध आदि से सुसज्जित थे।
टिप्पणी: इस श्लोक में सात प्रकार के निषेध हैं, जिनका तात्पर्य है कि अयोध्या में सभी सुखी, सम्पन्न और सुसज्जित थे। यह राजा के उत्तम शासन का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
“अयोध्या में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं देखा जाता था जो बिना हाथ-मुँह धोए भोजन करता हो, जो दान न देता हो, जो आभूषण (अंगद और निष्क) धारण न करता हो, जो हाथों में अंगूठी न पहनता हो, या जो आत्मसंयम से रहित हो।”
अर्थ: यह श्लोक अयोध्या के निवासियों के उच्च चरित्र और संस्कार को दर्शाता है। प्रत्येक नागरिक शारीरिक स्वच्छता, दानशीलता, श्रृंगार और आत्मसंयम में संपन्न था।
टिप्पणी: इस श्लोक में अयोध्या के लोगों के सात्विक गुणों का उल्लेख है। "अमृष्टभोजी" का अर्थ है बिना हाथ-मुँह धोए भोजन न करना – यह स्वच्छता का प्रतीक है। "अदाता" दान न देने वाला – अयोध्या में कोई कंजूस नहीं था। "अनङ्गदनिष्कधृक्" आभूषण धारण करने वाला – यह समृद्धि और सौंदर्यबोध दर्शाता है। "अहस्ताभरण" बिना हाथों के आभूषण – सभी सजे-धजे रहते थे। "अनात्मवान्" आत्मसंयम रहित – प्रत्येक व्यक्ति इंद्रियों पर नियंत्रण रखता था। यह श्लोक एक आदर्श समाज का चित्र प्रस्तुत करता है।
नानाहिताग्निर्नायज्वा न क्षुद्रो वा न तस्करः । कश्चिदासीदयोध्यायां न चार्वृत्तो न संकरः ॥
“अयोध्या में कोई भी ऐसा नहीं था जिसने अग्निहोत्र (अग्नि) स्थापित न की हो, जो यज्ञ न करता हो, जो क्षुद्र (नीच) हो, जो चोर हो, जो दुराचारी हो, या जो वर्णसंकर (मिश्रित जाति) का हो।”
अर्थ: इस श्लोक में अयोध्या के निवासियों की धार्मिक निष्ठा और नैतिकता का वर्णन है। सभी अग्निहोत्री और यज्ञ करने वाले थे, कोई क्षुद्र या चोर नहीं था, और वर्णव्यवस्था का पालन होता था।
टिप्पणी: यह श्लोक अयोध्या की सामाजिक एवं धार्मिक उन्नति को रेखांकित करता है। "अनाहिताग्नि" उन लोगों को कहते हैं जिन्होंने वैदिक अग्नि (गृह्य अग्नि) स्थापित नहीं की। अयोध्या में ऐसा कोई न था, अर्थात सभी गृहस्थ अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन करते थे। "अयज्वा" वह है जो यज्ञ नहीं करता; यहाँ सभी यज्ञानुष्ठान में रत थे। "क्षुद्र" का अर्थ है नीच प्रवृत्ति का; कोई भी नीच न था। "तस्कर" चोर; अयोध्या में चोरी अज्ञात थी। "अर्वृत्त" बुरे आचरण वाला; सबका आचरण उत्तम था। "संकर" वर्णसंकर, अर्थात मिश्रित जाति के लोग (अनुलोम-प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न); वर्णव्यवस्था शुद्ध थी। यह श्लोक बताता है कि अयोध्या में धर्म, नीति और सामाजिक व्यवस्था पूर्ण रूप से विद्यमान थी।
“ब्राह्मण सदा अपने-अपने कर्मों में लगे रहते थे, इंद्रियों पर विजय प्राप्त किए हुए थे, दान और अध्ययन में तत्पर थे, और प्रतिग्रह (दान लेने) में संयम रखते थे।”
अर्थ: यह श्लोक अयोध्या के ब्राह्मणों के आदर्श चरित्र का वर्णन करता है। वे स्वधर्मपरायण, जितेन्द्रिय, दानशील, अध्ययनशील और प्रतिग्रह में संयमी थे।
टिप्पणी: इस श्लोक में ब्राह्मणों के चार प्रमुख गुण बताए गए हैं: 1. स्वकर्मनिरता – अपने वैदिक कर्तव्यों (यजन, याजन, अध्यापन, अध्ययन, दान, प्रतिग्रह) का पालन। 2. विजितेन्द्रियाः – इंद्रियों पर नियंत्रण, जो ब्राह्मण के लिए अनिवार्य है। 3. दानाध्ययनशीलाः – वे दान देना और वेदों का अध्ययन-अध्यापन करना अपना स्वभाव बनाए हुए थे। 4. प्रतिग्रहे संयताः – दान लेते समय वे अत्यंत संयम बरतते थे, अर्थात अनुचित या अधिक दान नहीं लेते थे। यह ब्राह्मणों की उच्च कोटि की सात्विकता को दर्शाता है।
नास्तिको नानृती वापि न कश्चिदबहुश्रुतः । नासूयको न चाशक्तो नाविद्वान् विद्यते क्वचित् ॥
“अयोध्या में कहीं भी कोई नास्तिक, झूठ बोलने वाला, अल्पश्रुत (कम पढ़ा-लिखा), ईर्ष्यालु, असमर्थ या अज्ञानी नहीं था।”
अर्थ: यह श्लोक अयोध्या के नागरिकों के ज्ञान, सामर्थ्य और सद्गुणों की पराकाष्ठा दर्शाता है।
टिप्पणी: इस श्लोक में अयोध्यावासियों के छः दोषों का अभाव बताया गया है: 1. नास्तिक (आस्तिकता का अभाव), 2. अनृती (झूठ न बोलने वाला), 3. अबहुश्रुत (बहुश्रुत न होना, अर्थात सभी बहुश्रुत थे), 4. असूयक (ईर्ष्या न करने वाला), 5. अशक्त (असमर्थ नहीं, सभी समर्थ), 6. अविद्वान् (विद्वान न होना, अर्थात सभी विद्वान)। यह वर्णन अयोध्या के नागरिकों की उच्चतम शिक्षा, नैतिकता और योग्यता को उजागर करता है।
नाषडङ्गविदत्रास्ति नाव्रतो नासहस्रदः । न दीनः क्षिप्तचित्तो वा व्यथितो वापि कश्चन ॥
“यहाँ (अयोध्या में) कोई भी षडंग (वेद के छः अंग) न जानने वाला, व्रतहीन, सहस्र (बहुत) दान न देने वाला, दीन, व्यग्रचित्त या पीड़ित नहीं था।”
अर्थ: यह श्लोक अयोध्यावासियों की वैदिक शिक्षा, व्रतपरायणता, दानशीलता और मानसिक शांति को दर्शाता है।
टिप्पणी: इस श्लोक में अयोध्या के नागरिकों की वैदिक विद्या, धार्मिक अनुष्ठान, दान और मानसिक स्थिति का वर्णन है। "षडङ्गवित्" – वेद के छः अंगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष) का ज्ञाता। अयोध्या में प्रत्येक व्यक्ति इनमें पारंगत था। "अव्रतः" – व्रत न करने वाला; सभी व्रतपरायण थे। "असहस्रदः" – हजारों का दान न देने वाला; अर्थात सभी बहुत दान देते थे। "दीनः" – दीन, गरीब; अयोध्या में कोई दरिद्र न था। "क्षिप्तचित्तः" – व्यग्र मन वाला; सभी का मन शांत था। "व्यथितः" – पीड़ित; कोई दुःखी न था। यह आदर्श समाज का चित्रण है।
कश्चिन्नरो वा नारी वा नाश्रीमान् नाप्यरूपवान् । द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नापि राजन्यभक्तिमान् ॥
“अयोध्या में कोई भी पुरुष या स्त्री ऐसा नहीं देखा जा सकता था जो श्रीहीन (धनहीन) हो, रूपहीन हो, या राजा के प्रति भक्तिहीन हो।”
अर्थ: इस श्लोक में अयोध्या के नर-नारियों की संपन्नता, सौंदर्य और राजभक्ति का वर्णन है।
टिप्पणी: यह श्लोक अयोध्या के निवासियों की भौतिक और मानसिक समृद्धि को रेखांकित करता है। "अश्रीमान्" का अर्थ है जिसमें श्री (लक्ष्मी, संपत्ति, तेज) न हो; अयोध्या में ऐसा कोई न था। "अरूपवान्" – रूपहीन; सभी रूपवान थे। "राजन्यभक्तिमान्" – राजा के प्रति भक्ति रखने वाला; यहाँ निषेध का अर्थ है कि कोई राजभक्तिहीन न था। यह वर्णन अयोध्या के आदर्श समाज की पूर्णता को दर्शाता है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति त्रिविध संपन्नता – धन, रूप, और राजभक्ति – से युक्त था।
“अग्र्य (श्रेष्ठ) और चतुर्थ (अंतिम) वर्णों (ब्राह्मण और शूद्र) सहित सभी वर्णों के लोग देवता और अतिथियों की पूजा करने वाले, कृतज्ञ, दानी, और पराक्रम से युक्त वीर थे।”
अर्थ: यह श्लोक सभी वर्णों के लोगों के सार्वभौम सद्गुणों का वर्णन करता है।
टिप्पणी: इस श्लोक में वाल्मीकि ने अयोध्या के सभी वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) के समान गुणों का उल्लेख किया है। "अग्र्यचतुर्थेषु" का अर्थ है प्रथम (ब्राह्मण) और चतुर्थ (शूद्र) सहित, अर्थात सभी वर्ण। उनमें सामान्य गुण थे: 1. देवता और अतिथियों की पूजा करना, 2. कृतज्ञता, 3. दानशीलता, 4. वीरता और पराक्रम। यह बताता है कि अयोध्या में वर्ण-व्यवस्था के बावजूद सभी में सद्गुण विद्यमान थे और वे परस्पर सहयोग से रहते थे।
“उस उत्तम नगर (अयोध्या) में सभी पुरुष दीर्घायु थे, धर्म और सत्य का आश्रय लिए हुए थे, तथा पुत्र-पौत्रों और स्त्रियों के साथ सदा सहित (युक्त) थे।”
अर्थ: इस श्लोक में अयोध्या के पुरुषों की दीर्घायु, धर्म-सत्य में आस्था और पारिवारिक सुख का वर्णन है।
टिप्पणी: यह श्लोक अयोध्या के नागरिकों के जीवन की चार विशेषताएँ बताता है: 1. दीर्घायुषः – सभी दीर्घायु थे, जो स्वास्थ्य और संतोष का सूचक है। 2. धर्मं सत्यं च संश्रिताः – धर्म और सत्य का आश्रय लेना, अर्थात सन्मार्ग पर चलना। 3. पुत्रपौत्रैः सहिताः – पुत्र-पौत्रों से युक्त, यह वंशवृद्धि और पारिवारिक सुख को दर्शाता है। 4. नित्यं स्त्रीभिः – सदा पत्नियों के साथ, यह दांपत्य सुख का प्रतीक है। इस प्रकार अयोध्या के नागरिक शारीरिक, नैतिक, पारिवारिक और सामाजिक रूप से संपन्न थे।
“क्षत्रिय ब्राह्मणों के मुख से निर्देशित होते थे, वैश्य क्षत्रियों के अनुवर्ती थे, और शूद्र अपने धर्म में निरत रहकर तीनों वर्णों की सेवा करते थे।”
अर्थ: यह श्लोक चारों वर्णों के पारस्परिक संबंधों और कर्तव्यों का वर्णन करता है।
टिप्पणी: इस श्लोक में वर्णों के बीच सहयोग और उनके कर्तव्यों का वर्णन है। "क्षत्रं ब्रह्ममुखम्" – क्षत्रिय ब्राह्मणों के मुख से निर्देशित होते थे, अर्थात ब्राह्मणों के परामर्श और आशीर्वाद से राज्य चलता था। "वैश्याः क्षत्रमनुव्रताः" – वैश्य क्षत्रियों के अनुशासन में रहते थे, उनके संरक्षण में व्यापार-वाणिज्य करते थे। "शूद्राः स्वधर्मनिरतास्त्रीन् वर्णानुपचारिणः" – शूद्र अपने धर्म (सेवा) में निरत होकर तीनों वर्णों की सेवा करते थे। यह एक आदर्श वर्णाश्रम व्यवस्था का चित्र है जहाँ सभी अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए परस्पर सहयोग से रहते हैं।
“उस नगरी (अयोध्या) की रक्षा इक्ष्वाकुवंशी राजा (दशरथ) ने उसी प्रकार की थी, जैसे पूर्वकाल में धीमान् मनु (प्रजापति) ने की थी।”
अर्थ: यह श्लोक राजा दशरथ की प्रशंसा करता है कि उन्होंने अयोध्या की वैसे ही रक्षा की जैसे मनु ने की थी।
टिप्पणी: इस श्लोक में अयोध्या के राजा दशरथ की तुलना प्रथम राजा मनु से की गई है। "इक्ष्वाकुनाथेन" – इक्ष्वाकुवंश के स्वामी दशरथ। "सुपरिरक्षिता" – अच्छी तरह से रक्षित। "यथा पुरस्तान्मनुना" – जैसे पूर्वकाल में मनु ने। मनु को मानवेन्द्र (मनुष्यों के इंद्र) और धीमान् (बुद्धिमान) कहा गया है। इस प्रकार दशरथ ने अयोध्या की उत्कृष्ट रक्षा की, जिससे वह पूर्ववत् समृद्ध और सुरक्षित रही। यह श्लोक अयोध्या के वर्णन का समापन करता है।