अयोध्या के राजा और लोग – श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

तस्मिन् पुरवरे हृष्टा धर्मात्मानो बहुश्रुताः । नरास्तुष्टा धनैः स्वैः स्वैरलुब्धाः सत्यवादिनः ॥

हिंदी अनुवाद

उस श्रेष्ठ नगर में सभी नर प्रसन्न, धर्मात्मा, बहुश्रुत (विद्वान), अपने-अपने धन से संतुष्ट, अलोभी और सत्यवादी थे।

अर्थ / व्याख्या

यह श्लोक अयोध्या की प्रजा के गुणों का वर्णन करता है – वे सभी प्रसन्न, धर्मात्मा, विद्वान, संतुष्ट, अलोभी और सत्यवादी थे।

टिप्पणी

इस श्लोक से पता चलता है कि राजा दशरथ के शासन में प्रजा कितनी सुखी और सद्गुणी थी। यह एक आदर्श राज्य के लक्षण हैं।

॥ श्रीमद्वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ६ – श्लोक ६ ॥

तस्मिन् पुरवरे हृष्टा धर्मात्मानो बहुश्रुताः ।
नरास्तुष्टा धनैः स्वैः स्वैरलुब्धाः सत्यवादिनः ॥
tasmin puravare hṛṣṭā dharmātmāno bahuśrutāḥ |
narāstuṣṭā dhanaiḥ svaiḥ svairalubdhāḥ satyavādinaḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : उस श्रेष्ठ नगर में सभी नर प्रसन्न, धर्मात्मा, बहुश्रुत (विद्वान), अपने-अपने धन से संतुष्ट, अलोभी और सत्यवादी थे।

🔹 English Translation : In that excellent city, the people were joyful, righteous, well-learned, content with their own wealth, non-greedy, and truthful.

🔍 शब्दार्थ तालिका

संस्कृत पदव्याकरणहिन्दी अर्थ
तस्मिन्सर्वनाम, पुल्लिंग, सप्तमी एकवचनउस में
पुरवरेपुल्लिंग, सप्तमी एकवचनश्रेष्ठ नगर में
हृष्टाःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनप्रसन्न, हर्षित
धर्मात्मानःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनधर्मात्मा, धार्मिक प्रकृति वाले
बहुश्रुताःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनबहुत सुना हुआ = विद्वान, शास्त्रज्ञ
नराःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचननर, लोग
तुष्टाःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनसंतुष्ट
धनैःनपुंसक, तृतीया बहुवचनधन से
स्वैः स्वैःसर्वनाम, पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन (पुनरावृत्ति)अपने-अपने (धन से)
अलुब्धाःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनलोभ रहित, अलोभी
सत्यवादिनःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनसत्य बोलने वाले

📖 श्लोक की व्याख्या

अब राजा के गुणों के बाद प्रजा के गुणों का वर्णन शुरू होता है। एक आदर्श राज्य में प्रजा भी सद्गुणी होती है। अयोध्या की प्रजा में निम्न गुण थे:

हृष्टाः – वे सदा प्रसन्न रहते थे। प्रसन्नता का अर्थ है कि उन्हें किसी प्रकार का शोक या दुःख नहीं था। राजा के उत्तम शासन के कारण सब सुखी थे।

धर्मात्मानः – वे धर्मात्मा थे, अर्थात् उनका आचरण धर्म के अनुकूल था। धर्म का पालन करना ही मनुष्य का कर्तव्य है।

बहुश्रुताः – वे विद्वान थे, उन्होंने शास्त्रों को सुना और जाना था। शिक्षा का प्रचार-प्रसार उस राज्य की विशेषता थी।

तुष्टाः धनैः स्वैः स्वैः – वे अपने-अपने धन से संतुष्ट थे। इसका अर्थ है कि उनमें लालसा नहीं थी। वे दूसरों के धन को देखकर लालायित नहीं होते थे।

अलुब्धाः – वे लोभ रहित थे। लोभ सभी विकारों की जड़ है। लोभ के अभाव में समाज में शांति रहती है।

सत्यवादिनः – वे सत्य बोलने वाले थे। सत्यवादिता समाज में विश्वास और सद्भाव बनाए रखती है।

📚 सांस्कृतिक संदर्भ

भारतीय राजनीति में प्रजा के गुणों पर भी बल दिया गया है। राजा और प्रजा का परस्पर संबंध होता है। यदि राजा धर्मात्मा है तो प्रजा भी धर्मात्मा होगी। यहाँ अयोध्या की प्रजा के ये गुण बताते हैं कि दशरथ का शासन कितना उत्तम था।

'बहुश्रुत' का अर्थ केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि श्रवण परम्परा से ज्ञान प्राप्त करना है। उस समय शिक्षा मुख्यतः श्रवण और स्मरण पर आधारित थी।

✨ विशेष: 'स्वैः स्वैः धनैः तुष्टाः' का भाव यह है कि प्रजा में पर्याप्त धन था और वे दूसरों से ईर्ष्या नहीं करते थे। यह एक समृद्ध और संतुलित समाज का लक्षण है।

इस प्रकार यह श्लोक अयोध्या की प्रजा के उत्तम गुणों का वर्णन करता है, जो एक आदर्श राज्य के नागरिकों में होने चाहिए।

॥ जय श्री राम ॥