अयोध्या के राजा और लोग – श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

नाल्पसंनिचयः कश्चिदासीत् तस्मिन् पुरोत्तमे । कुटुम्बी यो ह्यसिद्धार्थोऽगवाश्वधनधान्यवान् ॥

हिंदी अनुवाद

उस उत्तम नगर में कोई भी ऐसा कुटुम्बी (गृहस्थ) नहीं था जिसके पास थोड़ा संचय हो या जो धन, गौ, अश्व, धान्य से युक्त न हो (सब सम्पन्न थे)।

अर्थ / व्याख्या

इस श्लोक में अयोध्या के निवासियों की आर्थिक समृद्धि का वर्णन है। कोई भी गृहस्थ ऐसा नहीं था जिसके पास पर्याप्त संचय, गाय, घोड़े, धन और अनाज न हो।

टिप्पणी

यह श्लोक दर्शाता है कि अयोध्या में कोई गरीब या असहाय नहीं था। सभी के पास गौ, अश्व, धन और धान्य था। यह राज्य की समृद्धि का परिचायक है।

॥ श्रीमद्वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ६ – श्लोक ७ ॥

नाल्पसंनिचयः कश्चिदासीत् तस्मिन् पुरोत्तमे ।
कुटुम्बी यो ह्यसिद्धार्थोऽगवाश्वधनधान्यवान् ॥
nālpasaṃnicayaḥ kaścidāsīt tasmin purottame |
kuṭumbī yo hyasiddhārtho gavāśvadhanadhānyavān ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : उस उत्तम नगर में कोई भी ऐसा कुटुम्बी (गृहस्थ) नहीं था जिसके पास थोड़ा संचय हो या जो धन, गौ, अश्व, धान्य से युक्त न हो (सब सम्पन्न थे)।

🔹 English Translation : In that best of cities, there was no householder who had little accumulation or who was unsuccessful (in acquiring) cows, horses, wealth, and grain.

🔍 शब्दार्थ तालिका

संस्कृत पदव्याकरणहिन्दी अर्थ
अव्ययनहीं
अल्पसंनिचयःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (बहुव्रीहि)अल्प संचय वाला, जिसके पास थोड़ा धन हो
कश्चित्सर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनकोई भी
आसीत्क्रिया, अनद्यतन भूत, प्रथमपुरुष एकवचन (अस् धातु)था
तस्मिन्सर्वनाम, पुल्लिंग, सप्तमी एकवचनउस में
पुरोत्तमेपुल्लिंग, सप्तमी एकवचनउत्तम नगर में
कुटुम्बीपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनगृहस्थ, परिवार का पालन करने वाला
यःसर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनजो
हिअव्ययनिश्चय ही
असिद्धार्थःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (बहुव्रीहि)असिद्ध अर्थ वाला, जिसके प्रयोजन सिद्ध न हुए हों
गवाश्वधनधान्यवान्पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (मतुप् प्रत्यय)गाय, घोड़े, धन और धान्य से युक्त

📖 श्लोक की व्याख्या

यह श्लोक अयोध्या की आर्थिक समृद्धि और सामाजिक सुरक्षा का वर्णन करता है।

नाल्पसंनिचयः कश्चिदासीत् – कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जिसके पास थोड़ा संचय (धन) हो। अर्थात् सभी के पास पर्याप्त धन था। 'संनिचय' का अर्थ संग्रह या पूँजी है।

कुटुम्बी यो ह्यसिद्धार्थः – जो गृहस्थ था, वह असिद्धार्थ (असफल) नहीं था। उसके सभी प्रयोजन सिद्ध होते थे। वह अपने परिवार का पालन सफलतापूर्वक करता था।

अगवाश्वधनधान्यवान् – वह गाय, घोड़े, धन और धान्य से युक्त था। गाय और घोड़े पशुधन की समृद्धि के सूचक हैं, धन (मुद्रा, रत्न आदि) और धान्य (अन्न) से युक्त होना खाद्य सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि को दर्शाता है।

इस प्रकार अयोध्या में कोई निर्धन या असहाय नहीं था। यह राजा दशरथ के कुशल प्रशासन का परिणाम था।

📚 सांस्कृतिक संदर्भ

प्राचीन भारतीय राज्यों में गौ, अश्व, धन और धान्य को समृद्धि का मापदंड माना जाता था। गौ को विशेष पवित्र और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है। अश्व (घोड़े) सेना और परिवहन के लिए आवश्यक थे। धन और धान्य सामान्य समृद्धि के सूचक हैं।

'असिद्धार्थ' का अर्थ है जिसके कार्य सिद्ध न हुए हों। यहाँ निषेध किया गया है कि कोई भी गृहस्थ अपने जीवन में असफल नहीं था। सबके कार्य सफल होते थे।

✨ विशेष: इस श्लोक में दोहरा निषेध है – न अल्पसंनिचयः, न असिद्धार्थः। इसका प्रभाव यह है कि अयोध्या में सभी सम्पन्न और सफल थे।

यह श्लोक अयोध्या की आर्थिक स्थिति का सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है।

॥ जय श्री राम ॥